भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मांसान्मेदः प्रजायत इति । मांसादनन्तरं मेदः प्रजायते रसादेवेत्यर्थः । मेदसोऽस्थि जायते, रसादेवेत्यर्थः । एवं ततो मज्जा (जायते१, रसादेवेत्यर्थः ।) ततः२ शुद्धं शुक्रं (रसादेव३) सम्भवतीत्यर्थः ।। १८९ ।। इस प्रकार से आहार रस ही 'केदारकुल्या' न्याय से अर्थात् कुल्या (थोड़े जलवाली मनुष्यों द्वारा बनाई हुई नदी (नहर) जिस प्रकार केदार (खेत) स्थित धान्यादिकों का पोषण करती है, उसी प्रकार रस भी सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता हुआ एक मास और नौ दण्ड में शुक्र और आर्तव होता है, ऐसा सर्वसम्मत सिद्धान्त होने पर 'रस से रक्त' इत्यादि जो अभी ऊपर श्लोक में कह आये हैं वह सङ्गत ही है, अब उसी श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि— 'रक्त से मांस' अर्थात् रक्तोत्पत्ति होने के बाद मांस उत्पन्न होता है वह भी वस्तुतः रस से ही उत्पन्न होता है तथा 'मांस से मेद उत्पन्न होता है' अर्थात् मांस के बाद रस से ही मेद उत्पन्न होता है, एवम् 'मेद से अस्थि उत्पन्न होता है' अर्थात् मेद के बाद रस से ही अस्थि उत्पन्न होती है। इसी प्रकार से 'अस्थि से मज्जा' अर्थात् अस्थि के बाद रस से ही मज्जा उत्पन्न होता है तथा 'मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है' अर्थात् मज्जा के बाद रस से ही शुद्ध शुक्र की उत्पत्ति होती है ।।१८९।। रसः शरीर त्रिधा सञ्चरतीत्याह- रसः शरीरे शब्दार्च्चिर्ज्वलसन्तानवत् त्रिधा । सञ्चरत्यनुरूपोऽयं नित्यमेव हि देहिनाम् ।। १९० ।। शरीर में आहार-रस का सञ्चार—प्राणियों के शरीर के अनुरूप रस शब्द, अर्चि (ज्योति) और जल के सन्तान (प्रवाह) की तरह तीन प्रकार से नित्य ही संचार करता रहता है ।।१९०।। ❖ अस्यायसभिप्रायः । पुरुषास्तीक्ष्णाग्नयो मध्यमाग्नयो मन्दाग्नयश्च भवन्ति, तत्र तीक्ष्णाग्नीनां स रसः शब्दसन्तानवच्छीघ्रं सञ्चरति, मध्यमाग्नीनामर्चिःसन्तानवन्मध्यवेगेन चरति, मन्दाग्नीनां जलसन्तानवन्मन्दं चरति । तेन मासेन रसाच्छुक्रं भवतीति, यदुक्तं तन्मध्यमाग्नीनधिकृत्योक्तम्, दीप्ताग्नीनान्तु रसः किञ्चिन्न्यूनेन मासेन शुक्रं भवति, मन्दाग्नेः किञ्चिदधिकेन मासेनेति सिद्धान्तः ।।१९०।। इसका अभिप्राय यह है कि पुरुष तीन प्रकार के होते हैं—(१) तीक्ष्णाग्निपुरुष, (२) मध्यमाग्निपुरुष और (३) मन्दाग्निपुरुष । उनमें तीक्ष्ण अग्निवाले पुरुषों के शरीर में वह रस शब्द प्रवाह की भाँति शीघ्रता से सञ्चार करता है, मध्यम अग्निवाले पुरुषों के शरीर में अर्चिः प्रवाह (ज्योतिः प्रवाह) की भाँति मध्यवेग से सञ्चार करता है और मन्द अग्नि वाले पुरुषों के शरीर में जल-प्रवाह की भाँति मन्दवेग से सञ्चार करता है, इससे 'एक मास में रस से शुक्र होता है' ऐसा जो कहा गया है वह मध्यम अग्निवाले पुरुषों के ही विषय में कहा गया है, दीप्त (तीक्ष्ण) अग्नि वाले पुरुषों का तो रस कुछ कम एक मास में ही वीर्य हो जाता है तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों का रस कुछ अधिक एक मास में वीर्य हो जाता है यह सिद्धान्त है ।।१९०।। तर्हि बाजीकरिणीनामोषधीनां किं प्रयोजनमित्याह- बाजीकरण ओषध्यः स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् । विरेचयन्ति ताः शुक्लं विरेकिद्रव्यवन्नृणाम् ।। १९१ ।। बाजीकरण ओषधियों का प्रयोजन—वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव की अधिकता से अथवा गुण की अधिकता से अथवा प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से विरेचन (दस्त कराने वाली) ओषधियों की भाँति शुक्र का विरेचन करती हैं ।।१९१।। ❖ वाजीकरिण्यः = याभिरोषधीभिः पुरुषः शुक्राधिक्यात् स्त्रीषु वाजिवत् सामर्थ्यं प्राप्नोति ता वाजीकरिण्यः, स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् = तत्र काश्चिदोषध्यः स्वभावाधिक्यात्, काश्चित् स्वगुणाधिक्यात्, काश्चित् १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'अग्रे' इति पाठ । ३. कोष्ठस्थः पाठः क्वचित्कः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA