भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६१ स्वप्रभावगुणाधिक्यात्। तत्रसङ्कल्पपादलेपविशिष्टकान्तास्पर्शादयः स्वप्रभावाधिक्यात् शुक्रं विरेचयन्ति। घृतक्षीरादयः स्वगुणाधिक्यात्=स्निग्धत्वाधिक्यात्, माषादयः स्वप्रभावस्निग्धत्वादिगुणाधिक्यात्। वाजीकरिण्य इति बहुवचनमाद्यर्थानुवर्त्तनम्। बल्यबृंहणजीवनीयगणादयः, तद्वद्बोद्धव्याः। विरेचयन्ति=स्वप्रभावगुणा- धिक्याच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयित्वा प्रवर्त्तयन्ति ।।१९१।। 'वाजीकरण ओषधियाँ' अर्थात् जिन ओषधियों से पुरुष शुक्र की अधिकता होने से स्त्रियों के साथ रमण करने में घोड़े की भाँति सामर्थ्य प्राप्त करता है वे वाजीकरण ओषधियाँ कहलाती हैं। 'वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं' इसका अर्थ यह है कि वाजीकरण ओषधियों में से कोई अपने प्रभाव की अधिकता से, कोई अपने गुण की अधिकता से तथा कोई अपने प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। उनमें से सङ्कल्प (किसी स्त्री के विषय में चिन्ता आदि करना), पैर में विशेष औषध का लेप करना और विशिष्ट (सुन्दरी) स्त्रियों का स्पर्श करना आदि जितने हैं वे सब केवल अपने प्रभाव की अधिकता से ही शुक्र का विरेचन करती हैं। घी, दूध आदि अपने स्निग्धत्व रूप गुण की अधिकता से तथा माष (उड़द) आदि अपने प्रभाव और अपने स्निग्धत्व गुण आदि की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। यहाँ 'वाजीकरिण्यः' इस बहुवचनान्त पद के प्रयोग करने से यह समझना चाहिये कि- 'आदि' इस अर्थ का अनुवर्त्तन हो, अर्थात्-केवल वाजीकरण ओषधियों का ही बोध न हो किन्तु 'वाजीकरण आदि' अर्थात् वाजीकरण से भिन्न चरकोक्त बल्य, बृंहण तथा जीवनीय गुणादि ओषधियों का भी वाजीकरण ओषधियों की भाँति ही बोध हो। 'वाजीकरण आदि ओषधियाँ अपने प्रभाव तथा गुण की अधिकता से शीघ्र हैं विरेचन करती है' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शीघ्र ही रस रक्तादि धातुओं को उत्पन्न करने के अनन्तर शुक्र को भी उत्पन्न करके प्रवर्त्तन (विरेचन) करती हैं ।।१९१।। यत आह१- दुग्धं माषाश्च भल्लात२ फलमज्जाऽऽमलानि च। जनकानि निगद्यन्ते रेचनानि च रेतसः ।।१९२।। शुक्रवर्धक पदार्थ-दूध, उड़द, भिलावा का फल मींगी और आँवला ये सब ओषधियाँ शुक्र को उत्पन्न करनेवाली तथा विरेचन करनेवाली हैं ।।१९२।। ननु बालानां कथं शुक्रं न दृश्यत इत्याह- बालानां शुक्रमस्त्येव किन्तु सौक्ष्म्यान्न दृश्यते। पुष्पाणां मुकुले गन्धो यथा सन्नपि नाप्यते ।।१९३।। तेषां तदेव तारुण्ये पुष्टत्वाद्यक्तिमेति हि। कुसुमानां प्रफुल्लानां गन्धः प्रादुर्भवेद्यथा ।।१९४।। बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण-बालकों के भी शुक्र होता है किन्तु सूक्ष्म होने से नहीं दिखाई पड़ता जैसे कि पुष्पों की कच्ची कलियों में गन्ध होते हुए भी उसका घ्राणेन्द्रिय से कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। बालकों की तरुण अवस्था होने पर वही शुक्र पुष्ट हो जाने से दिखाई पड़ने लगता है, जैसे कि कलियों के खिलने पर पुष्पों की गन्ध मालूम पड़ने लगती है ।।१९३-१९४।। रोमराज्यादयः पुंसां नारीणामपि यौवने। जायतेऽत्र च यो भेदो ज्ञेयो व्याख्यानतः स च ।।१९५।। युवा अवस्था में पुरुषों के जैसे स्त्रियों के भी रोमावली आदि उत्पन्न होती हैं; किन्तु स्त्री और पुरुषों के रोमराजी आदि में भेद है, उसे निम्नलिखित व्याख्यान से जानना चाहिये ।।१९५।। ❖ व्याख्यानं यथा-पुंसां रोमराजीश्मश्रुप्रभृतयः। नारीणान्तु रोमराजीस्तनस्तन्यार्त्तवप्रभृतयः ।। १. अतः परं क्वचित् 'उत्तरत्रे'त्यधिकः पाठोऽपि दृश्यते। २. 'भल्लातः'इति पाठान्तरमसमीचीनम्।