भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६१ स्वप्रभावगुणाधिक्यात्। तत्रसङ्कल्पपादलेपविशिष्टकान्तास्पर्शादयः स्वप्रभावाधिक्यात् शुक्रं विरेचयन्ति। घृतक्षीरादयः स्वगुणाधिक्यात्=स्निग्धत्वाधिक्यात्, माषादयः स्वप्रभावस्निग्धत्वादिगुणाधिक्यात्। वाजीकरिण्य इति बहुवचनमाद्यर्थानुवर्त्तनम्। बल्यबृंहणजीवनीयगणादयः, तद्वद्बोद्धव्याः। विरेचयन्ति=स्वप्रभावगुणा- धिक्याच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयित्वा प्रवर्त्तयन्ति ।।१९१।। 'वाजीकरण ओषधियाँ' अर्थात् जिन ओषधियों से पुरुष शुक्र की अधिकता होने से स्त्रियों के साथ रमण करने में घोड़े की भाँति सामर्थ्य प्राप्त करता है वे वाजीकरण ओषधियाँ कहलाती हैं। 'वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं' इसका अर्थ यह है कि वाजीकरण ओषधियों में से कोई अपने प्रभाव की अधिकता से, कोई अपने गुण की अधिकता से तथा कोई अपने प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। उनमें से सङ्कल्प (किसी स्त्री के विषय में चिन्ता आदि करना), पैर में विशेष औषध का लेप करना और विशिष्ट (सुन्दरी) स्त्रियों का स्पर्श करना आदि जितने हैं वे सब केवल अपने प्रभाव की अधिकता से ही शुक्र का विरेचन करती हैं। घी, दूध आदि अपने स्निग्धत्व रूप गुण की अधिकता से तथा माष (उड़द) आदि अपने प्रभाव और अपने स्निग्धत्व गुण आदि की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। यहाँ 'वाजीकरिण्यः' इस बहुवचनान्त पद के प्रयोग करने से यह समझना चाहिये कि- 'आदि' इस अर्थ का अनुवर्त्तन हो, अर्थात्-केवल वाजीकरण ओषधियों का ही बोध न हो किन्तु 'वाजीकरण आदि' अर्थात् वाजीकरण से भिन्न चरकोक्त बल्य, बृंहण तथा जीवनीय गुणादि ओषधियों का भी वाजीकरण ओषधियों की भाँति ही बोध हो। 'वाजीकरण आदि ओषधियाँ अपने प्रभाव तथा गुण की अधिकता से शीघ्र हैं विरेचन करती है' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शीघ्र ही रस रक्तादि धातुओं को उत्पन्न करने के अनन्तर शुक्र को भी उत्पन्न करके प्रवर्त्तन (विरेचन) करती हैं ।।१९१।। यत आह१- दुग्धं माषाश्च भल्लात२ फलमज्जाऽऽमलानि च। जनकानि निगद्यन्ते रेचनानि च रेतसः ।।१९२।। शुक्रवर्धक पदार्थ-दूध, उड़द, भिलावा का फल मींगी और आँवला ये सब ओषधियाँ शुक्र को उत्पन्न करनेवाली तथा विरेचन करनेवाली हैं ।।१९२।। ननु बालानां कथं शुक्रं न दृश्यत इत्याह- बालानां शुक्रमस्त्येव किन्तु सौक्ष्म्यान्न दृश्यते। पुष्पाणां मुकुले गन्धो यथा सन्नपि नाप्यते ।।१९३।। तेषां तदेव तारुण्ये पुष्टत्वाद्यक्तिमेति हि। कुसुमानां प्रफुल्लानां गन्धः प्रादुर्भवेद्यथा ।।१९४।। बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण-बालकों के भी शुक्र होता है किन्तु सूक्ष्म होने से नहीं दिखाई पड़ता जैसे कि पुष्पों की कच्ची कलियों में गन्ध होते हुए भी उसका घ्राणेन्द्रिय से कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। बालकों की तरुण अवस्था होने पर वही शुक्र पुष्ट हो जाने से दिखाई पड़ने लगता है, जैसे कि कलियों के खिलने पर पुष्पों की गन्ध मालूम पड़ने लगती है ।।१९३-१९४।। रोमराज्यादयः पुंसां नारीणामपि यौवने। जायतेऽत्र च यो भेदो ज्ञेयो व्याख्यानतः स च ।।१९५।। युवा अवस्था में पुरुषों के जैसे स्त्रियों के भी रोमावली आदि उत्पन्न होती हैं; किन्तु स्त्री और पुरुषों के रोमराजी आदि में भेद है, उसे निम्नलिखित व्याख्यान से जानना चाहिये ।।१९५।। ❖ व्याख्यानं यथा-पुंसां रोमराजीश्मश्रुप्रभृतयः। नारीणान्तु रोमराजीस्तनस्तन्यार्त्तवप्रभृतयः ।। १. अतः परं क्वचित् 'उत्तरत्रे'त्यधिकः पाठोऽपि दृश्यते। २. 'भल्लातः'इति पाठान्तरमसमीचीनम्।
६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे व्याख्यान यह है कि पुरुषों के रोमराजी-दाढ़ी, मूँछ आदि-हैं और स्त्रियों के रोमराजी-स्तन, दुग्ध, आर्तव (रज) आदि-हैं ॥१९५॥ ननु अन्नरसो वृद्धस्य धातुवृद्धिं कथं न करोतीत्याह- वार्द्धके वर्द्धमानेन वायुना रसशोषणात् । न तथा धातुवृद्धिः स्यात्ततस्तत्रानिलं जयेत् ।।१९६।। वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास—वृद्धा अवस्था में वृद्धि को प्राप्त हुये वायु के द्वारा रस के सूख जाने से युवावस्था की भाँति धातु की वृद्धि नहीं होती इसलिये उस अवस्था में वायु को जीतना चाहिये अर्थात्—जिस प्रकार के आहार-विहार करने से वायु वृद्धि को न प्राप्त होकर शान्त रहे वही करें ।।१९६।। शुक्लं सौम्यं सितं स्निग्धं बलपुष्टिकंर स्मृतम् । गर्भबीजं वपुःसारो जीवस्याश्रय उत्तमः ।।१९७।। शुक्र के स्वरूप—शुक्र सौम्य (सोमात्मक), श्वेतवर्ण, स्निग्ध, बल और पुष्टि करनेवाला, गर्भ का बीज, शरीर का सार पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय है ।।१९७।। जीवस्याश्रय उत्तम इत्यत१ आह- जीवो वसति सर्वस्मिन्देहे तत्र विशेषतः । वीर्ये रक्ते मले यस्मिन् क्षीणे याति क्षयं क्षणात् ।।१९८।। जीव का आश्रय—यद्यपि जीव सम्पूर्ण शरीर में रहता है तथापि सम्पूर्ण शरीर की अपेक्षा विशेष रूप से वीर्य रक्त तथा मल में ही रहता है । क्योंकि इनमें से चाहे जिस किसी के नाश हो जाने पर तत्काल ही जीव का भी नाश हो जाता है ।।१९८।। अथ गर्भसञ्जननशुक्रस्य लक्षणमाह- स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभञ्च तत् ।।१९९।। गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण—गर्भ को उत्पन्न करनेवाला शुक्र-स्फटिक मणि के तुल्य निर्मल, द्रव, स्निग्ध, मधुर और शहद के समान गन्धवाला होता है, कोई-कोई गर्भोत्पादक शुक्र को तैल तथा शहद के सदृश वर्ण का मानते हैं ।।१९९।। अथ शुक्रस्य स्थानमाह- यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चेक्षौ२ रसो यथा । एवं हि सकले काये शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ।।२००।। शुक्र के स्थान—जिस प्रकार से दूध में घी, इक्षु (ऊख) में रस छिपा रहता है उसी भाँति प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर के अन्दर शुक्र भी छिपा रहता है ।।२००।। ❖ अत्र सर्पिर्दृष्टान्तो बहुशुक्रेऽल्पमथनेन सर्पिःशुक्रयोर्लाभात् । इक्षुरसदृष्टान्तस्तु स्वल्पशुक्रे पुंसि अतिपीडनेनेक्षुरसशुक्रयोर्लाभात् ।।२००।। यहाँ पर घृत का दृष्टान्त जिसके शरीर में अधिक शुक्र है उसके विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जैसे थोड़ा मथने से ही दुग्ध से घृत निकल आता है वैसे ही थोड़े मैथुन करने से अधिक शुक्रवाले पुरुष का भी शुक्र शरीर से बाहर निकल जाता है और जो इक्षु-रस का दृष्टान्त है उसे अल्प शुक्रवाले पुरुष के विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार ईख को अत्यन्त पेरने से उससे रस निकलता है; उसी प्रकार अधिक मैथुन करने से अल्प शुक्रवाले पुरुष का शुक्र निकलता है ।।२००।। १. 'इत्याहे'ति पाठान्तरम् । २. 'चेक्षो'रिति पाठान्तरम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६३ अथ शुक्रस्य क्षरणमार्गमाह- द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः । मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं¹ पुरुषस्य प्रवर्त्तते ।।२०१।। शुक्र के निकलने के मार्ग—बस्ति द्वार के नीचे भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की तरफ मूत्रवाही शिरा के मार्ग से पुरुष का शुक्र प्रवृत्त होता है अर्थात् निकलता है ।।२०१।। ❖ वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘सप्तमी शुक्रधरा द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्त्तयती'ति सप्तमी कला ।।२०१।। इसी विषय में 'वृद्ध वाग्भट' भी कहते हैं कि—बस्तिद्वार के नीचे के भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की ओर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहनेवाली, शुक्रधरा (शुक्र को धारण करनेवाली) जो सातवीं कला मूत्र के मार्ग का आश्रय लेकर स्थित है, वही शुक्र को प्रवृत्त कराती है अर्थात् उसी से शुक्र का क्षरण होता है ।।२०१।। अथ शुक्रक्षरणकारणमाह- कृत्स्नदेहस्थितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा । स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्त्तते ।।२०२।। शुक्र के क्षरण होने में कारण—प्रसन्न मन होकर स्त्री के साथ मैथुन रूप व्यायाम करते हुए पुरुष के हर्ष के वश होने से; सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त शुक्र का क्षरण होता है; अर्थात् मैथुन के समय चित्त की प्रसन्नता तथा हर्ष होना यही शुक्रक्षरण के कारण हैं ।।२०२।। ❖ स्त्रीषु व्यायच्छतः=स्त्रीसुरतरूपं व्यायामं कुर्वतः ।।२०२।। 'स्त्रीषु व्यायच्छतः' इसका स्त्रीके साथ मैथुनरूप व्यायाम को करते हुए पुरुष के यह अर्थ हैं ।।२०२।। अन्यञ्च- शुक्रं कामेन कामिन्या दर्शनात् स्पर्शनादपि । शब्दसंश्रवणाद् ध्यानात् संयोगाश्च प्रवर्त्तते ।।२०३।। कामभाव से स्त्रियों के देखने, स्पर्श करने, शब्द सुनने, ध्यान करने तथा संयोग से शुक्र प्रवृत्त (स्खलित) होतां है ।।२०३।। अथार्त्तवस्य स्वरूपमाह- स्त्रीणां रस एव मासेनार्त्तवं भवतीत्युक्त्वा पुनराह सुश्रुत² एव- रसादेव रजः स्त्रीणां मासि मासि त्र्यहं स्रवेत् । तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ।।२०४।। मासेनोपचितं काले धमनीभ्यस्तदार्त्तवम् । ईषद्विवर्णं कृष्णाञ्च वायुर्योनिमुखं³ नयेत् ।।२०५।। आर्तव के स्वरूप—रस से ही स्त्रियों के रज उत्पन्न होकर प्रतिमास में तीन दिन तक निकलता रहता है और वह रज बारह वर्ष की अवस्था के बाद निकलता है और पचास वर्ष की अवस्था के बाद बन्द हो जाता है तथा प्रतिदिन एक मास तक थोड़ा-थोड़ा करके सञ्चित होता रहता है बाद एक मास के स्राव का समय होने पर वायु उसे धमनियों के द्वारा योनि के मुख की तरफ ले आता है और उस समय वह देखने में कुछ विवर्ण तथा काले रङ्ग का मालूम पड़ता है ।।२०४-२०५।। गर्भग्रहणयोग्यस्यार्त्तवस्य लक्षणमाह- शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् । तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ।।२०६।। १. 'पथे' इति पाठान्तरम् । २. 'शुक्रत' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'योनेरि'ति पाठान्तरम् ।
६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे गर्भ ग्रहण के योग्य आर्त्तव—जिस आर्तव का वर्ण खरगोश के रक्त के सदृश अथवा लाख के रस के सदृश हो तथा लगने पर जिससे कपड़े में दाग न पड़ सके ऐसे आर्तव की पण्डित लोग प्रशंसा करते हैं अर्थात् गर्भ ग्रहण के योग्य बतलाते हैं ॥२०६॥ ❖ आर्त्तवस्य वर्णद्वयाभिधानम् । वातादिप्रकृतिभेदेन वर्णभेदात् । 'यद्वासो विरञ्जयेत्' । यद्वासोलग्नं प्रक्षालितं तद्द्वासस्त्यजति न तु विकृतरक्तं कुर्यात् । ऋतुः=स्त्रीणां रजोदर्शनात् षोडशनिशाः, तत्र भव- मार्त्तवम्, गृहीतगर्भाणां स्त्रीणामात्तर्ववहानां स्रोतसां गर्भेणावरोधादार्त्तवं न स्रवति । किन्तु तदेवाधःप्रतिहतमूर्ध्वमागतमुपचीयमानमपरा भवति । अपरा तु श्रीवर१ इति लोके । शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरौ याति, तस्माद्गर्भिण्यः पीवरपयोधरा भवन्ति ।। २०६ ।। आर्तव का वर्ण जो दो प्रकार का कहा है वह वातादि प्रकृति भेद से वर्ण का भेद होने से, क्योंकि वातादि द्वारा वर्ण होता है । मूल में जो 'यद्वासो न विरञ्जयेत्' यह वाक्य है इसका अर्थ यह है कि जो आर्तव कपड़े में लगने पर धोने के बाद उस कपड़े को छोड़ देता है न कि विकृत रङ्ग का दाग से युक्त कर देता है । स्त्रियों के रजोदर्शन के दिन से लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है उसे ऋतुकाल कहते हैं, उस ऋतुकाल में जो रज और रक्त निकलता है उसी को 'आर्त्तव' कहते हैं । गर्भवती स्त्रियों के आर्तव वहन करने वाली नाड़ियों का गर्भ के द्वारा अवरोध (रुकावट) होने से आर्तव बाहर नहीं निकलता किन्तु वही आर्तव नीचे से (गर्भ के द्वारा) रोके जाने पर ऊपर आकर इकट्ठा होता हुआ कुछ अंशों से अपरा अर्थात् जेर बन जाता है । इसी को लोक में 'श्रीवर' भी कहते हैं । और बाकी कुछ अंशों से जेर बनने के बाद वहाँ से ऊपर आकर दोनों स्तनों में जाता है, इसी से गर्भिणी स्त्रियाँ मोटे स्तनों वाली हो जाती हैं ॥२०६॥ अथ धातुवतिरिक्तान् गुणानाह- अतिरिक्ता गुणा रक्ते वह्नेर्मांसे तु पार्थिवाः । मेदस्र्यापां २भुवश्चास्थ्नि पृथिव्यनिलतेजसाम् ।। २०७।। मज्ज्ञि शुक्रे च सोमस्य मूत्रे च शिखिनो गुणाः । भुवस्तथाऽऽर्त्तवे त्वग्ने रसे क्षीरे तथाऽम्भसः ।।२०८।। धातुगुण-वर्णन-रक्त में अग्नि के, मांस में पृथ्वी के, मेद में पृथ्वी और जल के, अस्थि में पृथ्वी, वायु और अग्नि के, मज्जा और शुक्र में चन्द्र के, मूत्र में अग्नि के, आर्तव में पृथ्वी तथा अग्नि के और रस तथा दूध में जल के गुण अधिक हैं ।।२०७-२०८।। कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखलोम च । नेत्रविट्त्वक्षु३ च स्नेहो धातूनां क्रमश्रो मलाः ।।२०९।। धातुओं के मल-कफ, पित्त, ख अर्थात् कर्णादिक स्रोतों के मल, पसीना, नख, लोम तथा नेत्र का मल तथा त्वचाओं के ऊपर के स्नेह, ये सब क्रम से रसादिक छः धातुओं के मल हैं ।।२०९।। ❖ 'नेत्रजिह्वाकपोलानां जलञ्च रसजं मलम्' इत्येके। खेषु मलः =कर्णादिस्रोतःसु मलः, 'रसनादन्तकक्षामेढ्रादिमलपि मेदोमलम्' इत्येके । नेत्रविट्त्वचां स्नेहश्च मज्जमलः, शुक्रस्य मलमेव नास्ति सहस्रधा ध्मातसुवर्णस्येव ।। २०९।। यहाँ कोई 'नेत्र, जिह्वा और कपोल के जल को रस का मल' बतलाते हैं । और 'खेषु मलः' इसका अर्थ 'कर्णादिक स्रोतों में स्थित मल' तथा कोई 'जिह्वा, दाँत, कक्षा (बगल) तथा लिङ्ग आदि के मल को भी मेद का मल' मानते हैं एवं नेत्रों के मल तथा त्वचाओं के ऊपर के स्नेह को मज्जा का मल तथा हजार बार तपाये हुये सुवर्ण में जैसे मल नहीं होता वैसे ही शुक्र में भी मल नहीं होता, ऐसा समझना चाहिये ।।२०९।। १. 'आवरणा जरायु'रिति पाठान्तरम् । २. 'रसे' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'च त्वचः' इति पाठान्तरम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६५ अथोपधातूनाह- वनितानां प्रसूतानां धमनीभ्यां स्तनौ गतात् । रसादेव हि जायेत स्तन्यं स्तनयुगाशयम् ।।२१०।। शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्त्तिता । मेदस्तस्ताप्यमानस्य१ स्नेहो वा कथिता वसा ।।२११।। उपधातु का लक्षण—प्रसूता स्त्रियों के दोनों स्तनों में दो धमनियों के द्वारा प्राप्त हुये रस से ही दूध होता है और उसके आशय दोनों स्तन हैं अर्थात् वह दूध दोनों स्तनों में रहता है । और शुद्ध मांस का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है । अथवा तपाये जाते हुये मेद का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है ।।२१०-२११।। शार्ङ्गधरे तु- स्तन्यं रजो वसा स्वेदो दन्ताः केशास्तथैव च । ओजश्च सप्तधातूनां क्रमात् सप्तोपधातवः ।।२१२।। 'शार्ङ्गधर' में दूध, रज, वसा, पसीना, दाँत, केश और ओज, ये रसादिक सात धातुओं के क्रम से सात उपधातु हैं ।।२१२।। उरोरक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमाशयस्तु तदधस्तल्लिङ्गं चरकोऽवदत् ।।२१३।। आशय के लक्षण—वक्षःस्थल ही रक्ताशय है, उसके नीचे श्लेष्माशय (कफाशय) और उसके नीचे आमाशय है, ऐसा चरकने कहा है ।।२१३।। तद्यथा—❖ 'नाभिस्तनान्तरं जन्तोराहुरामाशयं बुधाः' इति ।।२१३।। 'नाभि और स्तन के बीच के भाग को पण्डितों ने आमाशय बतलाया है' ।।२१३।। आमाशयादधः पक्वाशायादूर्ध्वन्तु या कला । ग्रहणी नामिका सैव कथितः पाचकाशयः ।।२१४।। ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेर्मध्यभागे व्यवस्थितः । तस्योपरि तिलं ज्ञेयं तदधः पवनाशयः ।।२१५।। पक्वाशयस्तु तदधः स एव तु मलाशयः । तदधः कथितो बस्तिः स हि मूत्राशयो मतः ।।२१६।। आमाशय के नीचे तथा पक्वाशय के ऊपर जो 'कला' है उसी का नाम 'ग्रहणी' है और वह 'पाचकाशय' कहलाता है । नाभि के मध्य में ऊपर की ओर 'अग्न्याशय' है और उसके ऊपर तिल (पाचकाग्नि) और नीचे 'पवनाशय' है । पुनः उसके नीचे पक्वाशय जो 'मलाशय' नाम से भी प्रसिद्ध है और उसके नीचे 'बस्ति' है जो 'मूत्राशय' कहलाता है ।।२१४-२१६।। आशयानुक्रमस्तु वाग्भटेनोक्तः स यथा- कफाऽऽमपित्तवातामाशया मलमूत्रयोः । पुरुषेभ्योऽधिकाश्चान्ये नारीणामाशयास्त्रयः ।।२१७।। धरा गर्भाशयः प्रोक्तः पित्तपक्वाशयान्तरे । स्तनौ प्रवृद्धौ तावेव बुधैःस्तन्याशयौ मतौ ।।२१८।। वाग्भटोक्त आशयों का क्रम—कफाशय, आमाशय, पित्ताशय, पवनाशय, मलाशय और मूत्राशय ये पुरुषों के क्रम से आशय हैं । स्त्रियों के इससे भिन्न अन्य तीन आशय अधिक होते हैं, जैसे-पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में 'धरा' है जिसे पण्डितों ने गर्भाशय और स्तनों के वृद्ध होने पर उन्हीं को 'स्तन्याशय' कहा है ।।२१७-२१८।। अथ कलास्वरूपमाह- स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्तांश्च जरायुणा । श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान्विदुः ।।२१९।। धात्वाशयान्तरे धातोर्यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति । देहोष्मणाऽभिपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते ।।२२०।। १. 'स्रवमाणस्ये'ति पाठान्तरम् । ८ भाव.I
६६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कलाओं के स्वरूप—स्नायुओं से ढके हुये, जरायुओं से व्याप्त तथा कफ से वेष्टित धात्वाशयों के जो भाग हैं उन्हीं को कलाभाग समझना चाहिये। धात्वाशयों के मध्य में धातुओं का जो क्लेद (गीला) भाग है वह देह की ऊष्मा गर्मी से जब अत्यन्त परिपक्व हो जाता है तब उसे ही पण्डित लोग 'कला' कहते हैं ॥२१९-२२०॥ ताः सप्त- आद्या मांसधरा प्रोक्ता द्वितीया रक्तधारिणी । मेदोधरा तृतीया तु चतुर्थी श्लेष्मधारिणी ॥२२१॥ पञ्चमी तु मलं धत्ते षष्ठी पित्तधरा मता । रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः ॥२२२॥ वे कलायें संख्या में सात हैं, जैसे—(१) मांसधरा, (२) रक्तधारिणी (रक्तधरा), (३) मेदोधरा, (४) श्लेष्मधारिणी (श्लेमधरा), (५) मल को धारण करनेवाली मलधरा, (६) पित्तधरा और (७) शुक्रधरा ॥२२१-२२२॥ अथ मर्माण्याह- सन्निपातः शिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवः । मर्माणि तेषु तिष्ठन्ति प्राणाः खलु विशेषतः ॥२२३॥ मर्मस्थल के लक्षण—शिरा, स्नायु, सन्धि, मांस और अस्थि इन सबों में से जो जहाँ जहाँ परस्पर संयुक्त होते हैं वे ही मर्मस्थल कहलाते हैं, अर्थात् एक शिरा के साथ दूसरी शिराके, एक स्नायु के, एक सन्धि के साथ दूसरे सन्धि के, एक मांस के साथ दूसरे मांस के और एक अस्थि के साथ दूसरे अस्थि के संयोगस्थल को मर्मस्थल कहते हैं। इन्हीं मर्मस्थलों में विशेष करके प्राण रहते हैं ॥२२३॥ तेषां सङ्ख्याः स्थानं चाह- सप्तोत्तरशतं सन्ति देहे मर्माणि देहिनाम् । तान्येकादश मांसे स्युरष्टावस्थिषु सन्ति हि ॥२२४॥ सन्धीनां विंशतिस्तानि स्नायूनां सप्तविंशतिः । चत्वारिंशत्तथैकञ्च शिरामर्माणि तत्र तु ॥२२५॥ द्वाविंशतिः सक्थियुगे तावत्येव १भुजद्वये । द्वादशोरसि कुक्षौ च पृष्ठदेशे चतुर्दश ॥२२६॥ ग्रीवायामूर्ध्वभागे तु सप्तत्रिंशन्मतानि हि । मर्माणि तानि सन्तीह पञ्चधा च भवन्ति हि ॥२२७॥ मर्मों की संख्या तथा स्थान—मनुष्यों के शरीर में १०७ मर्मस्थल हैं। तथा—मांस में ११, अस्थि में आठ, सन्धियों में बीस, स्नायुओं में २७, शिराओं में ४१, दोनों पैरों में २२, दोनों बाहुओं में २२, वक्षः स्थल में नव, कुक्षि में तीन, पीठ में १४ और ग्रीवा तथा ऊर्ध्वभाग में ३७ मर्म हैं तथा वे मर्म पाँच प्रकार के होते हैं ॥२२४-२२७॥ तान्याह- सद्यःप्राणहराणि स्युर्मर्माण्येकोनविंशतिः । मर्मदेशास्त्रयस्त्रिंशत् स्युः कालान्तरमारकाः ॥२२८॥ चत्वारिंशच्च चत्वारि वैकल्यं जनयन्ति हि । मर्माष्टकं रुजाकारि विशल्यघ्नं त्रिकं मतम् ॥२२९॥ मर्मों के कार्य—१०७ मर्मों में से १९ मर्मस्थल तत्काल प्राण के हरण करनेवाले, ३३ कालान्तर में मारनेवाले, ४४ विकलता करनेवाले, आठ पीड़ा करनेवाले तथा तीन विशल्यघ्न मर्मस्थल हैं (जिस मर्मस्थल से बाण आदि निकाल लेने पर मृत्यु हो जाती है किन्तु मर्मस्थल में शल्य जितने क्षण रहता है उतने क्षण मृत्यु नहीं होती, उसे 'विशल्यघ्न' मर्मस्थल कहते हैं) इस प्रकार सद्यःप्राणहर एक, कालान्तरमारक दो, वैकल्यकर तीन, रुजाकर चार और विशल्यघ्न पाँच, ये पाँच प्रकार के मर्मस्थल हुये ॥२२८-२२९॥ तत्र सद्योमारकाणि मर्माण्याह- शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्खौ कण्ठशिरा गुदम् । हृदयं बस्तिनाभी च सद्यो घ्नन्ति हतानि चेत् ॥२३०॥
१. 'तावन्त्येव'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६७ उनमें से सद्यःप्राण हरण करनेवाले मर्मस्थल—शृङ्गाटक के .चार, अधिपति के एक, शङ्ख के दो, कण्ठ की शिरा के आठ, गुदा के एक, हृदय के एक, बस्ति के एक, और नाभि के एक, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने से शीघ्र प्राण नाश हो जाता है ॥२३०॥ ❖ शृङ्गाटकानि-घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वासन्तर्पकाणां शिरामुखानां शिरसो मध्ये संयोगस्थानम् तानि चत्वारि शिरामर्माणि चतुरङ्गुलप्रमाणानि हतानि घ्नन्ति=सद्योमारकाणि भवन्ति । शृङ्गाटक मर्म—मस्तक के मध्य में जिन चार स्थानों में नाक, कर्ण, नेत्र और जिह्वा का सन्तर्पण करनेवाली शिराओं का मुख एकत्र मिलता है, उन्हीं चारों स्थानों को शृङ्गाटक मर्म कहते हैं । ये शिरासम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण के चार हैं । चोट लगने पर ये सद्यः प्राणों के हरण करनेवाले होते हैं । ❖ अधिपतिः-मस्तकस्याभ्यन्तरे १शिरासन्धिसन्निपात उपरिष्टाद्रोमावर्त्तः, स-एकः, सन्धिमर्मेद- मर्द्धाङ्गुलप्रमाणं सद्योमारकम् । अधिपति मर्म—मस्तक के भीतर शिरा सम्बन्धी सन्धियों का जो संयोग स्थान है उसके ऊपर बाहर रोमावर्त्त (भौरी) है, उसी को अधिपति मर्म कहते हैं । यह सन्धिसम्बन्धी मर्म एक है, इसका प्रमाण आधा अङ्गुल है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राण का हरण करनेवाला होता है । ❖ शङ्खः-भ्रुवोरन्तोपरि कर्णललाटयोर्मध्ये२ तौ द्वौ, अस्थिमर्मणी सार्द्धाङ्गुले सद्योमारके । दोनों भौहों प्रान्तभाग के ऊपर कर्ण और लला
६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बस्तिमर्म—नाभि, पीठ, कटि, गुदा, वंक्षण (ऊरुसन्धि) और लिङ्ग इन सब के मध्य में बस्ति है । बस्ति का चमड़ा पतला होता है तथा इसका एक द्वार होता है और मुख नीचे की ओर रहता है ॥४१॥ ❖ स्नायुमर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् । स्नायुसम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण का होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है । ❖ नाभिमर्म-नाभिः प्रसिद्धा, शिरामर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् ।।२३०।। नाभिमर्म—यह नाभि नाम से प्रसिद्ध है । शिरासम्बन्धी यह मर्म चार अङ्गुल प्रमाण में होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है ॥२३०॥ कालान्तरहराणि मर्माण्याह- वक्षोमर्माणि सीमन्ततलक्षिप्रेन्द्रबस्तयः । बृहत्यौ पार्श्वयोः सन्धी कटीकतरुणे च ये । नितम्बाविति चैतानि कालान्तरहराणि तु ।।२३१।। कालान्तर (देर) में प्राणहरण करने वाले मर्म—वक्षो मर्म आठ, सीमन्त पाँच, तल चार, क्षिप्र, इन्द्रबस्ति चार, बृहती दो, पसलियों की सन्धि दो, कटीकतरुण दो, नितम्ब दो, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने पर कालान्तर में प्राणनाश होता है ॥२३१॥ ❖ वक्षोमर्माणि- (स्तनमूलं१ स्तनरोहितापलापापस्तम्बाः । तत्र स्तनमूले-) स्तनयोरधस्ताद् द्व्यङ्गुलं यावत् स्तनमूले नाम द्वे शिरामर्मणी, तत्र कफपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके । वक्षोमर्म—स्तनमूल दो, स्तनरोहित दो, अपलाप दो, और अपस्तम्भ नामक दो मर्म, इस प्रकार ये आठ वक्षोमर्म हैं, उनमें से दोनों स्तनों के नीचे दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनमूल नामक दो मर्म हैं, वे शिरा सम्बन्धी मर्म हैं, वहाँ चोट लगने पर कफ से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से वे कालान्तर में प्राणनाशक होता है । ❖ स्तनरोहिते-स्तनयोरुपरि द्व्यङ्गुलं यावत् । द्वे मांसमर्मणी रक्तपूरितकोष्ठतया कालान्तरमारके२ । स्तनरोहित मर्म—दोनों स्तनों के ऊपर दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनरोहित नामक ये मांस सम्बन्धी २ मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में प्राण के हरण करनेवाले होते हैं। ❖ अपलापौ-अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वयोरुपरि द्वे३ शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले रक्तेन पूयताङ्गतेन कालान्तरमारके । अपलाप मर्म—दोनों ओर के अंसकूटों (कन्धे के ऊपर की उभरी हुई हड्डी) के नीचे एवं दोनों ओर पंसुलियों के ऊपर आधा अंगुल परिमित अपलाप नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर वहाँ के रक्त पूय (पीब) हो जाने से ये कालान्तर में मारक होते हैं । ❖ अपस्तम्भौ-उरस उभयतो' नाड्यौ वातवहे शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च कालान्तरमारके । अपस्तम्भ मर्म—वक्षःस्थल के दोनों पार्श्व (बगल) में वायु को वहन करनेवाली दोनों नाड़ियों में आधे अंगुल १. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'मारकावि'ति पा. । ३. 'द्वावि'ति पा. ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६९ परिमित अपस्तम्भ नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर बात से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कास और श्वास उत्पन्न करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ सीमन्ताः-शिरसि पञ्च सन्धयः सन्धिमर्माणि चतुरङ्गुलानि, उन्मादभयचित्तविनाशैः कालान्तरमारकाणि२ । सीमन्त मर्म—मस्तक में जो पाँच सन्धियाँ हैं वे ही सीमन्तनामक मर्म है ये सन्धिसम्बन्धी पाँच मर्म चार अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर उन्माद (पागलपन), भय और चित्त का विनाश, इन सब उपद्रवों के द्वारा ये कालान्तर से प्राणनाशक होते हैं। ❖ तलानि-मध्याङ्गुलिमनुक्रम्य हस्तस्य मध्यन्तलमेवमपरस्य हस्तस्य, पादयोश्चैवं३ चत्वारि तलानि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि रुजाभिः कालान्तरमारकाणि । तलमर्म—दोनों हाथ पैर के बीचवाली अङ्गुली के सीध से लेकर हथेली तथा तलुओं के मध्य में दो अङ्गुल परिमित जो स्थान हैं वे ही तल नामक मर्म हैं, दोनों हथेलियों में दो और दोनों पैर के तलुओं में दो, इस प्रकार सब चार तल मर्म हैं। ये सब मांस सम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर पीड़ा पहुँचने से ये कालान्तर में प्राणनाशक हो जाते हैं। ❖ क्षिप्राणि-अङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्यं क्षिप्रम्। तच्च४ हस्तयोर्द्वे पादयोर्द्वे चैवं चत्वारि स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलान्याक्षेपेकण कालान्तरमारकाणि । क्षिप्रमर्म—अङ्गुष्ठ और तर्जनी अङ्गुली के मध्य में क्षिप्रनामक मर्म हैं, वे दोनों हाथों में दो और दोनों पैरों में दो होने से कुल मिल कर चार क्षिप्र मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म हैं, तथा आधे अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर आक्षेपक नामक वायु सम्बन्धी रोग के द्वारा ये कालान्तर में मारक होते हैं। ❖ इन्द्रबस्तयः-प्रकोष्ठयोर्मध्ये द्वौ जङ्घयोर्मध्ये द्वौ । एवं चत्वारि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि शोणितक्षयेण कालान्तरमारकाणि५ । इन्द्रबस्ति मर्म—दोनों प्रकोष्ठों (कलाई से ऊपर केहुनी के नीचे के भागों) के मध्य में दो और दोनों जङ्घाओं (जानु से नीचे और एड़ी से ऊपर के भागों) के मध्य में दो, सब मिल कर चार और दो अङ्गुल परिमित मांससम्बन्धी इन्द्रबस्ति मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ बृहत्यौ-स्तनमूलादुभयतः पृष्ठवंशं यावत् । शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले६ शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तरुपद्रवैः कालान्तरमारके७ । बृहती मर्म—दोनों स्तनों के मूल भाग से लेकर पृष्ठवंश (पीठ की डण्डे के समान हड्डी) तक जो स्थान हैं, उनमें आधे अङ्गुल परिमित बृहती नामक शिरासम्बन्धी दो मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर अत्यन्त रक्त निकलने से जो उपद्रव होते हैं उनके द्वारा ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ पार्श्वसन्धी-जघनपार्श्वयोः सन्धी८ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले९ शोणितपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके१० । पार्श्वसन्धि मर्म—जघन और दोनों पार्श्वभाग (काँख के नीचे का हिस्सा कमरतक) की जो दो सन्धियाँ हैं उन्हीं १. 'उभयोरि'ति पा.। २. 'मारका' इति पा.। ३. 'चैवमि'ति पा.। ४. 'तानि चे'ति पा.। ५. 'मारका' इति पा.। ६. 'अर्द्धाङ्गुलावृत्ते' इति पा.। ७. 'मारकाणी'ति पा.। ८. 'सन्धी प्रती'ति पा.। ९. 'अर्द्धाङ्गुला'विति पा.। १०. 'मारका' विति पा.।
७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे को पार्श्व सन्धिनामक मर्म कहते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ कटीकतरुणे—त्रिकसन्निधाने उभयतः श्रोणिकाण्डं १लक्ष्यीकृत्यास्थिस्थिते अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले शोणितक्षयात्पाण्डुविवर्णरूपं कृत्वा कालान्तरमारके। कटीकतरुण मर्म—त्रिक (पृष्ठवंश के नीचे की तीन हड्डी) के पास दोनों ओर दोनों श्रोणिकाण्डों को लक्ष्य करके जो दो हड्डियाँ हैं, उन्हीं में आधे अङ्गुल परिमित दो कटीकतरुण नामक अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से पाण्डु तथा विवर्ण रूप करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ नितम्बौ—प्रसिद्धौ। द्वे२ अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुलावधः कायशोषेण दौर्बल्येन च कालान्तर- मारके३ ॥२३१॥ नितम्बमर्म—नितम्ब नाम से प्रसिद्ध जो स्थान है, उसके दोनों भागों में आधे अङ्गुल परिमित दो अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर शरीर के नीचे भाग में शोष होने से तथा दुर्बलता होने से ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं ॥२३१॥ वैकल्यकराणि मर्माण्याह- लोहिताक्षाणिजानूर्वी४ कूर्चा विटपकूर्पराः। कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ॥२३२॥ अंसांसफलकापाङ्गा५ नीले मन्ये फणे तथा। वैकल्यकरणान्याहुरावत्तौ द्वौ तथैव च ॥२३३॥ विकलता करनेवाले मर्मस्थल—लोहिताक्ष चार, आणि चार, जानु दो, ऊर्वी चार, कूर्च चार, विटप दो, कूर्पर दो, कुकुन्दर दो, कक्षधर दो, विधुर दो, कृकाटिका दो, अंस दो, अंसफलक दो, अपाङ्ग दो, नीला दो, मन्या दो, फण दो, और आवर्त्त दो, ये सब मर्मस्थल चोट लगने पर अङ्ग में विकलता उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥२३२-२३३॥ ❖ लोहिताक्षाणि—ऊर्व्या६ ऊर्ध्वमधो वङ्क्षणसन्धेर्लोहिताक्षम्, ते च द्वे बाह्रोर्द्वे ऊर्वोरिवं तानि चत्वारि शिरामर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि। वैकल्यकराणि। तत्र शोणितक्षयेण पक्षाघातः सक्थिसादो वा। लोहिताक्ष मर्म—ऊर्वी नामक मर्म के ऊपर और वंक्षण नामक सन्धि के नीचे लोहिताक्ष नामक मर्म रहता है, वे दोनों बाहुओं में दो तथा दोनों ऊरुओं में दो इस प्रकार कुल चार हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म कहलाते हैं, चोट लगने पर ये विकलता करनेवाले होते हैं। इन मर्मस्थलों में चोट लगने पर जब रुधिर का क्षय होता है तब पक्षाघात (वायु सम्बन्धी रोग) अथवा सक्थिसाद होता है। ❖ आणयः-जानुन ऊर्ध्वमुभयोः पार्श्वयोस्त्र्यङ्गुला एकस्मिन् जानुनि द्वे अपरस्मिन् द्वे एवञ्चतस्रः, स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि वैकल्यकराणि, तत्र शोथाभिवृद्धिः सक्थिस्तम्भश्च। आणिमर्म—जानुओं के ऊपर दोनों ओर तीन अङ्गुल परिमिति जो स्थान है उसी को आणिमर्म कहते हैं। पैर में एक जानु के ऊपर दो और दूसरे पैर में जानु के ऊपर दो, इस प्रकार मिल कर चार आणिमर्म हैं। आधे अङ्गुल परिमित ये स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इन मर्मों में चोट लगने पर शोथ की अधिकता तथा सक्थिस्तम्भ रोग होता है। १. 'लक्ष्मी'ति पा.। २. 'द्वावि'ति पा.। ३. 'मारकावि'ति पा.। ४. 'जानूर्वोरि'ति पा.। ५. 'अंसांसफलकापाङ्गावि'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्। ६. 'ऊर्वोरि'ति पा.।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७१ ❖ जानुनी-जङ्घोर्वोः१ सन्धी सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुले वैकल्यकरे तत्र खञ्जता । जानुमर्म—जङ्घा और ऊरु की जो दो सन्धियाँ हैं वे ही जानु नामक मर्म कहलाती हैं, ये दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर खंजता (लङ्गड़ापन) रोग हो जाता है । २ऊर्व्यः—द्वे ऊर्वोर्मध्ये द्वे प्रगण्डयोर्मध्ये एवं चतस्रः, शिरामर्माणि एकाङ्गुल्यो वैकल्यकारिण्यस्तत्र३ शोणितक्षयात्सक्थिबाह्वोः४ शोषः । ऊर्वी मर्म—दोनों ऊरुओं के मध्य में दो और दोनों बाजुओं के मध्य में दो इस प्रकार मिल कर चार ऊर्वी मर्म हैं, ये एक अङ्गुल परिमित शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर रक्तक्षय होने से सक्थि शोष (पैर का सूखना) और बाहुशोष (बाहु का सूखना) रोग हो जाता है । कूर्चाः—पादयोरङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्ये तयोरूर्ध्वमधश्च, ५एवं चत्वारि स्नायुमर्माणि वैकल्यकराणि, तत्र पादयोर्भ्रमणवेपने भवतः । कूर्च मर्म—दोनों पैरों के अँगूठे और अङ्गुलियों के मध्य में ऊपर और नीचे दो दो करके कूर्चनामक चार स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर पैर का भ्रमण (घूमजाना) तथा कम्पन (काँपना) होता है । ❖ विटपे—द्वे वङ्क्षणवृषणयोर्मध्ये स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे च तत्र षाण्ड्यमल्पशुक्रता वा । विटपमर्म—वङ्क्षण और अण्डकोश के मध्य में विटप नामक दो मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर नपुंसकता अथवा शुक्र की अल्पता हो जाती है । ❖ कूर्परौ—कफोणिजौ द्वौ सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुलौ वैकल्यकरौ तत्र बाहुमध्ये सङ्कोचः । कूर्परमर्म—दोनों कफोणि (वेहुनी) कूर्परनामक मर्म कहलाते हैं, ये दोनों दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर बाहु के मध्य में सङ्कोच होता है । ❖ कुकुन्दरे—नितम्बकूपकौ६ द्वे७ सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र स्पर्शाज्ञानमधः—कायस्य चेष्टोपघातश्च । कुकुन्दर मर्म—दोनों नितम्बों के ऊपर जो दो गड्ढे से हैं, वे ही कुकुन्दर नामक मर्म कहलाते हैं । ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं । इनमें चोट लगने पर स्पर्शज्ञान का अभाव (सुन्न हो जाना) तथा शरीर के नीचे भाग की चेष्टाओं का नाश हो जाता है । ❖ कक्षधरे—वक्षःकक्षयोर्मध्ये द्वे स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र पक्षाघातः । कक्षधर मर्म—वक्षःस्थल तथा कक्ष (काँख) के मध्य में दोनों ओर दो कक्षधर नामक मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर पक्षाघात होता है । ❖ विधुरे—कर्णपृष्ठतोऽधःसंश्रिते८ किञ्चिन्निम्नाकारे द्वे स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाधिर्यम् । विधुरमर्म—दोनों कानों के पीछे नीच के भाग में कुछ दबे हुये जो स्थान हैं उन्हीं स्थानों में विधुर नामक मर्म होता १. 'जङ्घयो'रिति पा. । २. 'ऊर्वोरि'ति पा.। ३. 'वैकल्यकर्य' इति पा. । ४. 'सक्थिशोष' इति पा. । ५. 'हस्तयोरधश्चे'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ६. 'कूर्पराविति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ७. 'द्वावि'ति पा. । ८. 'पृष्ठाध' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA
है, ये दोनों आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं। इनमें चोट लगने पर बाधिर्य (बहरापन) रोग हो जाता है। ❖ कृकाटिके-शिरोग्रीवयोरुभयतः सन्धी द्वे सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र शिरःकम्पः । कृकाटिका मर्म—शिर और ग्रीवा के दोनों भाग में जो दो सन्धियाँ हैं, वे ही कृकाटिका नामक मर्म हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर शिरःकम्प रोग होता है। ❖ अंसौ-स्कन्धौ स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र बाहुस्तम्भः । अंसमर्म—दोनों अंस (कन्धे) ही अंस नामक मर्म कहलाते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुस्तम्भ (बाहुओं का जकड़ जाना) रोग होता है। ❖ अंसफलके-पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसम्बद्धे, (ग्रीवायमंसद्वयस्य च संयोगो यत्र तन्त्रिकम् ।) अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाह्वोः शून्यता शोषश्च । अंसफलक मर्म—पीठ के ऊपर पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों ओर त्रिक से सम्बन्ध रखे हुये जो दो मर्म हैं वे ही अंसफलक नामक मर्म कहलाते हैं, (यहाँ पर 'त्रिक' पद से 'ग्रीवा में दोनों कन्धों का जहाँ पर संयोग होता है' उस स्थान को समझना चाहिये) ये आधे अङ्गुल परिमित अस्थिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुओं की शून्यता (सुन्न हो जाना) तथा शोष (सूख जाना) रोग होता है। ❖ अपाङ्गौ=नेत्रयोरन्तौ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुलौ वैकल्यकरौ, तत्रान्ध्यं दृष्ट्युपघातो वा । अपाङ्गमर्म—दोनों नेत्रों के जो दोनों प्रान्त भाग हैं वे ही अपाङ्ग मर्म कहलाते हैं। दोनों आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर आन्ध्य (अन्धा हो जाना) अथवा दर्शन शक्ति का ह्रास हो जाता है। नीले मन्ये च-कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यः, द्वे नीले द्वे मन्ये । तत्र एका मन्या एका लीना एकस्मिन् पार्श्वे, एव¹ अन्या मन्या नीला च अपरस्मिन् पार्श्वे द्वे द्वे शिरा मर्मणी द्व्यङ्गुले द्व्यङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र मूकता ²विकृतस्वरताऽरसग्राहिता च । नीला और मन्या मर्म—कण्ठ-नली के दोनों ओर नीला और मन्या नामक चार धमनियाँ हैं। उनमें से एक पार्श्व में एक नीला, एक मन्या और दूसरे पार्श्व में एक नीला तथा एक मन्या नामक धमनियाँ रहती हैं। इन्हीं मन्या नामक धमनियों में मन्या मर्म और नीला नामक धमनियों में नीला मर्म रहता है। दो दो अङ्गुल परिमित ये दोनों शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं। इनमें चोट लगने पर मूकता (गूँगा हो जाना) या विकृतस्वरता (स्वर का विकृत हो जाना) अथवा अरसग्राहिता (किसी रस के भी स्वाद लेने की शक्ति का न रहना) हो जाता है। ❖ फणे-घ्राणमार्गमुभयतः (³स्रोतोमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः) मांसमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र गन्धाज्ञानम् । फणमर्म—नासामार्ग के दोनों ओर (नासिका के भीतर स्रो
ौ द्वौ मणिबन्धौ द्वौ-> could line 7 have footnote 3? Or line 14:❖ मणिबन्धि द्वौ-> variant:'द्वौ मणिबन्धावि'ति पाठान्तरम्! Yes! Look at line 14: ❖ मणिबन्धि द्वौ-> someone wroteमणिबन्धि द्वौ, but variant is 'द्वौ मणिबन्धावि'ति! And look at the number in line 14: before द्वौor aboveमणिबन्धि? There is a superscript ३! Wait, let's look at line 14: ❖ मणिबन्धि ३द्वौor❖ मणिबन्धौ ३द्वौ? Wait, look at the digit before द्वौin line 14: It looks like a Devanagari३or४? In Devanagari, ३ has two curves (like a 3). In line 14, it has a loop: wait, is it ३or४? Let's look at line 10: सन्धिमर्म्मणी २द्वयङ्गुले- wait, the digit in line 10 has a loop at the bottom? In Devanagari, २ is a curve with a tail or loop: २. In line 7:रुजाकराणि जानीयादष्टावैता
दो मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म आधे अङ्गुल परिमित हैं, इन मर्मों में जब शल्य (बाणादि) बिंध जाते हैं, तब जितने काल तक शल्य उनमें बिंधे (पड़े) रहते हैं उतने काल तक मनुष्य जीवित रहता है, और यदि बिंधे हुये स्थान के पक जाने पर उसमें से शल्य आप ही आप बाहर निकल आवे तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है, किन्तु यदि बिंधे हुये शल्य को स्वयं निकाला जाय तो मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। ये विशल्यघ्न (बिंधे हुये शल्य के निकालने पर) प्राणियों के मारनेवाले हैं।
❖ स्थपनी-एका भ्रुवोर्मध्ये शिरामर्मेदमर्द्धाङ्गुलं विशल्यघ्नम् ।। २३५ ।। स्थपनी मर्म—दोनों भौहों के मध्यस्थल में एक स्थपनी नामक मर्म है। यह आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विशल्यघ्न है ॥२३५॥
सप्तरात्रान्तरे हन्युः सद्यः प्राणहराणि हि । कालान्तरप्राणहरं पक्षे मासे च मारकम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब सात रात्रि के अन्दर प्राण ले लेते हैं और कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब पक्ष में या एक मास के अन्दर प्राण हरण करते हैं ॥२३६॥
सद्यः प्राणहरस्यान्ते विद्धं कालेन मारयेत् । कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्धन्तु दुःखदम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त जितने मर्मस्थल हैं उनके समीप में शस्त्रादि से यदि चोट लग जाय तो कालान्तर में प्राणनाश होता है। और यदि कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त मर्मस्थलों के समीप में चोट लग जाय तो केवल दुःख देनेवाला (रुजा करनेवाला) ही होता है ।। २३६ ।।
अन्ते=मर्मसमीपे ।। २३७ ।। 'अन्ते' इस पदका 'समीप में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२३७॥
मर्माप्यधिष्ठाय हि ये विकारा मूर्च्छन्ति काये विविधा नराणाम् । प्रायेण ते कृच्छ्रतमा भवन्ति वैद्येन यत्नेरपि साध्यमानाः ।। २३८ ।। मनुष्यों के शरीर में मर्मस्थलों का आश्रय लेकर चाहे जिस प्रकार के रोग उत्पन्न हों तथा वैद्य लोग यत्नपूर्वक चाहे जितनी चिकित्सा करें तो भी प्रायः करके देखा जाता है कि वे कष्टसाध्य ही होते हैं ॥२३८॥
अथ सन्धयः ते द्विविधाश्चेष्टावन्तः स्थिराश्च - शाखासु हन्वोः कट्याञ्च चेष्टावन्तो भवन्ति हि । शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः ।। २३९ ।। सन्धियों के लक्षण—सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं—चेष्टावाली और स्थिर। उनमें से दोनों हाथों, दोनों पैरो, दोनों हनुओं (कपोलों के नीचे की हड्डियों) और कटि (कमर) में जो सन्धियाँ हैं, वे चेष्टावाली हैं और शेष सब सन्धियाँ स्थिर (चेष्टाशून्य) हैं ॥२३९॥
अथ सन्धिसंख्या आह- कथिता देहिनां देहे सन्धयो द्वे शते दश । शाखासु तेऽष्टषष्ठिश्च कोष्ठे त्वेकोनषष्टिका ।। २४० ।। ग्रीवाया ऊर्ध्वदेशे तुल्यशीतिस्ते प्रकीर्तिताः । प्रथमं परिगण्यन्ते तेषु शाखागता इह ।। २४१ ।। सन्धियों की संख्या—देहधारी मनुष्यों के शरीर में २१० सन्धियाँ हैं। उनमें से ६८ सन्धियाँ चारो शाखाओं में, ५९ कोष्ठ (ग्रीवा से नीचे पैर के ऊपर) में और ८३ ग्रीवा से लेकर उसके ऊपर भाग में कही हुई हैं। उन पूर्वोक्त सन्धियों में से जितनी चारों शाखाओं में हैं, इस समय उन्हीं का सर्व प्रथम परिगणन किया जा रहा है ॥२४०-२४१ ।।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७५ ❖ एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां१ त्रयस्त्रयो द्वावङ्गुष्ठे ते चतुर्दश । गुल्फजानुवङ्क्षणेष्वेकैकमेवं सप्तदश एकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । एवमष्टषष्टिःशाखासु । दोनों पैरों की चार-चार अङ्गुलियों में तीन-तीन और अंगूठे में दो-दो इस प्रकार एक पैर की पाँचों अङ्गुलियों में चौदह सन्धियाँ हैं और गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना) और वङ्क्षण (ऊरु सन्धि) में एक-एक सन्धियाँ हैं, इस प्रकार एक पैर में सब मिल कर सत्रह सन्धियाँ हैं। इसी तरह दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं की भी सन्धियाँ कही हुई हैं। इस प्रकार अड़सठ सन्धियाँ चार शाखाओं में होती हैं। अथ कोष्ठगतानाह- ❖ त्रयः २कटीकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवंशे, तावन्त एव पार्श्वयोरष्टावुरसि, एवमेकोन षष्टिः कोष्ठे । कोष्ठगत सन्धियाँ—कमर और कपाला
७६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवापृष्ठवंशयोस्तु प्रतराः । शिरःकटीकपालेषु १तूणसेवन्यः । हन्वोरुभयतः काकतुण्डाख्याः । कण्ठहृदयव्लोमनाडीषु मण्डलाख्याः । २श्रोत्रशृङ्गाटकेषु शङ्खावर्त्ताः ।।२४२।। (१) कोर सन्धि को कोई 'गड्ढे' और कोई 'नली' के सदृश बतलाते हैं। (२) उदूखल सन्धि ओखली (धानकूटने का काष्ठपात्र विशेष) के सदृश होती है। (३) सामुद्ग सन्धि यहाँ समुद्र पद से 'सम्पुट' समझना चाहिये। समुद्र ही 'सामुद्ग' कहलाता है, यहाँ पर स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने पर आदि पदकी वृद्धि होने से 'सामुद्ग' पद की सिद्धि होती है, यह 'सामुद्ग' सन्धि सम्पुट के आकार की होती है। (४) प्रतर सन्धि—जिससे जल में तैरा जा सके उसे प्रतर अर्थात् बेलन कहते हैं, 'प्रतर' सन्धि बेलन के आकार की होती है। (५) तूणसेवनी सन्धि-तूण अर्थात् बाण रखने के तरकश की भाँति सेवनी (सिली हुई) के समान होने से तूणसेवनी सन्धि कहते हैं। (६) काकतुण्ड सन्धि—कौवे के मुख के समान होने से इसे काकतुण्ड सन्धि कहते हैं। (७) मण्डल सन्धि-लोक प्रसिद्ध मण्डल की भाँति आकार होने से इसे मण्डलसन्धि कहते हैं। (८) शङ्खावर्त्त सन्धि-शङ्ख के आवर्त्त (नाभिचक्र) की भाँति आवर्त्त होने से इसे शङ्खावर्त्त सन्धि कहते हैं। इन पूर्वोक्त सन्धियों के नाम आकृति के अनुसार रखे गये हैं। इन सन्धियों के मध्य में कोर नामक सन्धि अङ्गुलि, मणिबन्ध (कलाई), गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना), कूर्पर (केहुनी), इन स्थानों में होती है। काँख, वङ्क्षण (ऊरुसन्धि) और दाँतों में उदूखलनामक सन्धि होती है। कन्धा, पीठ, गुदा, भग और नितम्ब में सामुद्गनामक सन्धि होती है। गर्दन और मेरुदण्ड में प्रतर नामक सन्धि होती है। शिर, कमर और कपाल में तूणसेवनी नामक सन्धि होती है। दोनों हनुओं के दोनों तरफ काकतुण्ड नामक सन्धि होती है। कण्ठ, हृदय, क्लोम और नाड़ी में मण्डलनामक सन्धि होती है। कान और शृङ्गाटक में शङ्खावर्त्त नामक सन्धि होती है ॥२४२॥ अस्थ्नां तु सन्धयो ह्येते केवलाः समुदाहृताः । पेशीस्नायु शिराणान्तु सन्धिसंख्या न विद्यते ।। २४३ ।। ऊपर जिन सन्धियों का उल्लेख किया गया है, वे केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु तथा शिराओं के सन्धियों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है क्योंकि वे असङ्ख्य हैं ॥२४३॥ अथ शिरामाह- सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुहाः शिराः। नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। २४४ ।। शिराओं का वर्णन—सन्धियों को बाँधने वाली तथा दोष (वात, पित्त, कफ) और धातु (रस, रक्तादि) को वहन करने वाली शरीर में जितनी शिरायें हैं वे सभी नाभि में बँधी हुई हैं और वहाँ ही से निकल कर चारों तरफ शाखा प्रशाखा द्वारा शरीर में फैली हुई हैं ॥२४४॥ शरीरं सकलञ्चैतच्छिराभिः पोष्यते सदा। प्रणालीभिरिवारामाः कुल्याभिः क्षेत्रधान्यवत् ।। २४५ ।। जैसे जल की नाली द्वारा बगीचा आदि का तथा कुल्या (नहर) द्वारा खेत में धानों का पोषण हुआ करता है, उसी भाँति शिराओं द्वारा समस्त शरीर का भी पोषण हुआ करता है ॥२४५॥ ❖ अत्र प्रणालीभिः कुल्याभिरिति दृष्टान्तद्वयं स्थूलसूक्ष्मशिराभेदात् ।। २४५ ।। यहाँ प्रणाली और कुल्या जो दो दृष्टान्त दिये गये हैं वे स्थूल और सूक्ष्म इन दो प्रकार की शिराओं के भेद से हैं ॥२४५॥ प्रसारणाकुञ्चनादिक्रियाभिः सततं तनौ। शिरा एवोपकुर्वन्ति ताः स्युः सप्तशतानि तु ।। २४६ ।। १. 'तूनसेविन्य' इति पा. । २. 'शिर' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७७ यथा द्रुमदले साक्षाद् दृश्यन्ते प्रतताः शिराः । तथैव देहिनो देहे वर्त्तन्ते सकले शिराः ।। २४७ ।। नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणात्राभिरुपाश्रिता । शिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ।। २४८ ।। अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना आदि क्रियाओं द्वारा जो शिरायें शरीर का उपकार करती हैं, वे संख्या में ७०० हैं । जिस प्रकार वृक्षों के पत्तों में फैली हुई शिरायें (नसें) प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ती हैं, उसी प्रकार देहधारी मनुष्यादि के सम्पूर्ण शरीर में भी फैली हुई शिरायें (नसें) रहती हैं । प्राणियों प्राणवाहक शिरासमूह नाभि में स्थित रहता है, और नाभि भी प्राणबाहक शिरासमूहों के आश्रित रहती है । जैसे चक्र की नाभि (पहिये की मध्यका गोलाकार काष्ठ) अरक (काष्ठ के लम्बे-लम्बे टुकड़ों) के द्वारा घिरी हुई रहती हैं, वैसे ही शिराओं से नाभि आवृत (लिपटी) हुई रहती हैं ।।२४६-२४८।। ❖ ता १यथा-तासां खलु मूलशिराश्चत्वारिंशत् । तासां दश वातवहाः, दश पित्तवहाः, दश श्लेष्मवहाः, दश रक्तवहाः, तासां खलु वातवहानां वातस्थानगतानां सपञ्चसप्तति शतं भवति२ । तावत्य३ एव पित्तवहाः पित्तस्थानगताः श्लेष्मवहास्ताः श्लेष्मस्थानगताः, रक्तवहा यकृत्प्लीहगताः । एवं शिराः सप्त शतानि भवन्ति । तत्र वातवहा एकस्मिन् सक्थिनि पञ्चविंशतिः, एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । विशेषतः कोष्ठे चतुस्त्रिंशत्, तासां श्रोण्यां गुदमेढ्रादिसंश्रिता४ अष्टौ । द्वे द्वे पार्श्वयोः । षट् ६ पृष्ठे । तावत्य एवोदरे ६ । दश वक्षसि १० । एकश्चत्वारिंशद् ४१ जत्रुणि ऊर्ध्वम् । तासां चतुर्दश १४ ग्रीवायाम् । ४ चतस्रः कर्णयोः । ९ नव जिह्वायाम् । ६ षट् नासिकायाम् । ८ अष्टौ नेत्रयोः । एवं वातवहानां सपञ्चसप्तति शतं भवति५ । एवं विभागः पित्तवहानामपि विशेषस्तु पित्तावहा नेत्रयोर्दश १० । कर्णयोर्द्वे दो । एवं रक्तवहाः । श्लेष्मवहास्तु षोडश १६ ग्रीवायाम् कर्णयोर्द्वे २ । एवं शिराणां सप्तशतानि व्याख्यातानि ।। २४६-२४८ ।। शिराओं के भेद—पूर्वोक्त ७०० शिराओं में से मुख्य शिरायें ४० हैं, उनमें १० वायु को १० पित्त को, १० कफ को और १० रक्त को वहन करने वाली हैं । उनमें से पूर्वोक्त वायु के स्थान में स्थित वायु को वहन करनेवाली जो मूल १० शिरायें हैं, वे ही शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ हो जाती हैं । इसी प्रकार पित्त के स्थान में स्थित पित्त को वहन करनेवाली, कफ के स्थान में स्थित कफ को वहन करनेवाली और यकृत् तथा प्लीहा जो रक्त के स्थान हैं उनमें स्थित रक्त को बहन करनेवाली जो मुख्य दस-दस शिरायें हैं उनमें से प्रत्येक शाखा प्रशाखा द्वारा वायु की भाँति १७५ हो जाती हैं । उनमें से वायु को वहन करनेवाली शिरायें एक पैर में २५ और दूसरे पैर में भी २५ हैं तथा दोनों बाहुओं में भी २५- २५ मिल कर ५० हैं, ऐसा समझना चाहिये । विशेषतः कोष्ठस्थान में वायु को वहन करने वाली ३४ शिरायें इस तरह से हैं—श्रोणि (कटि) गुदा और लिङ्ग आदि के आश्रित ८ दोनों पंसुलियों में दो-दो इस प्रकार चार, पीठ में छः, उदर में भी छः और वक्षःस्थल में दस । जत्रु (ग्रीवा) के मूल भाग के ऊपर ४१ वात को वहन करनेवाली शिरायें इस तरह से हैं—ग्रीवा में १४, दोनों कानों में दो-दो करके चार, जिह्वा में नौ, नासिका में छः, दोनों नेत्रों में चार-चार करके आठ । इस प्रकार वात को वहन करनेवाली मुख्य १० शिरायें शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ होती हैं । इसी प्रकार पित्त को वहन करनेवाली १६५ शिराओं का भी विभाग होता है, किन्तु विशेष यह है कि पित्त को वहन करनेवाली शिरायें नेत्रों में १० और कानों में दो होती है । इस प्रकार अर्थात् ठीक पित्तवहा शिराओं की भाँति ही १७५ रक्तवहा शिराओं का भी विभाग समझना चाहिये । कफ वहन करनेवाली १७५ शिराओं का भी विभाग इसी भाँति होता है, किन्तु भेद इतना ही है कि
१. 'तद्यथे'ति पा. । २. 'भवन्ती'ति पा. । ३. अत्र सर्वत्र 'तावन्त्य' इति पा. 'तावत्य' इत्यत्र पदे बोध्यम् । ४. 'श्रिते'ति पा. । ५. 'अज्ञानं ने'ति पा. । ६. 'चरन्त्रि'ति पाठः प्रामादिकः ।
७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवा में १६ और कानों में दो ही कफ वहन करनेवाली शिरायें होती हैं। इस प्रकार ७०० शिरायें मुनियों ने कही हैं ॥२४६-२४८॥ क्रियाणामप्रतीघातममोहं बुद्धिकर्मणाम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाःशिराः पवनश्चरन् ।।२४९।। वायु अपनी शिराओं में विचरण करता हुआ क्रियाओं का अप्रतिघात करता है, अर्थात् शरीर की प्रसारणादि क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आने देता और बुद्धिकर्मों का अमोह करता है अर्थात् बुद्धीन्द्रियों को मोह नहीं होने देता तथा अन्य गुणों को भी करता है ॥२४९॥ ❖ क्रियाणां = प्रसारणाकुञ्चनादीनाम् । अमोहं बुद्धिकर्मणाम् = बुद्धीन्द्रियाणां मनसो बुद्धेश्च स्वे स्वे विषये ज्ञानं करोतीत्यर्थः । अन्यान् गुणान् = रसादिव्यापनद्वारा शरीरपोषणादीन् ।।२४९।। ‘क्रियाओं का अप्रतीघात करता है' इसका अर्थ यह है कि फैलाना, सिकोड़ना आदि जितनी शरीर की क्रियायें हैं उन सबों का ठीक-ठीक सम्पादन करता है तथा 'बुद्धिकर्मों का अमोह करता है' अर्थात् बुद्धीन्द्रिय जो आँख, नाक, कान आदि हैं उनको तथा मन और बुद्धि को, अपने-अपने विषयों में ज्ञान प्रदान करता है। 'अन्य गुणों को करता है' अर्थात् रसादिकों को सर्वत्र व्याप्त करने के द्वारा शरीर का पोषण करता है, ऐसा समझना चाहिये ॥२४९॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः शिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसम्भवाः ।।२५०।। जिस समय वायु कुपित होकर अपनी सिराओं में विचरण करता है उस समय प्राणियों के शरीर में वायु से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५०॥ भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि पित्तमात्मशिराश्चरद् १ ।।२५१।। पित्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में भ्राजिष्णुता (शरीर में कान्ति होना), अन्न में रुचि, जठराग्नि की दीप्ति, अरोगता (रोग का न होना) तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५१॥ ❖ अरोगतां = पैत्तिकरोगानुत्पत्तिं करोति । अन्यान् गुणान् = मेधाबुद्धिदर्शनशक्त्यादीन् ।।२५१।। ‘अरोगतां' से 'पित्तसम्बन्धी रोग का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य भी गुणों को' इससे 'मेधा (धारणशक्ति), बुद्धि और देखने की शक्ति को' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२५१॥ यदा तु कुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः शिराः । यदाऽस्यविविधारोगाजायन्ते पित्त सम्भवाः ।।२५२।। किन्तु वही पित्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में पित्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५२॥ स्नेहमङ्गेषु सन्धीनां स्थैर्यं बलमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि बलासःस्वाःशिराश्चरन् ।।२५३।। कफ जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब अङ्गों में स्निग्धता अर्थात् अङ्गों का रूक्ष न होना, सन्धियों की स्थिरता, बल, अरोगता आदि अन्य गुणों को भी करता है ॥२५३॥ ❖ अरोगतां = श्लैष्मिकरोगानुत्पत्तिम् । अन्यान् गुणान् = बलपुष्ट्यादीन् ।।२५३।। 'आरोगतां' पद से 'कफ सम्बन्धी रोगों का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य गुणों को' इससे 'बल तथा पुष्टि आदि को' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२५३॥ यदा तु कुपितःश्लेष्मा स्वाःशिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसम्भवाः ।।२५४।। १. 'चरन्नि'ति पाठः प्रामादिकः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७९ किन्तु वही कफ जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के कफ से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५४॥ धातूनां पूरणं१ वर्णं स्पर्शज्ञानमसंशयम् । स्वशिरासु चरद्रक्तं कुर्याच्चान्यान् गुणानपि ॥२५५॥ रक्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के सम्पूर्ण धातुओं का पूरण करता है अर्थात् सब धातुओं की मात्रा पूर्ण रूप से बनाये रहता है और वर्ण अर्थात् शरीर के गौरादि वर्ण, जैसा चाहिये वैसा निश्चितरूप से स्पर्श का ज्ञान तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५५॥ ❖ अन्यान् गुणान्=बलपुष्ट्यादीन् ॥२५५॥ ‘अन्यान् गुणान्’ अर्थात् ‘बल तथा पुष्टि आदि गुणों को ऐसा समझना चाहिये ॥२५५॥ यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः शिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसम्भवाः ॥२५६॥ किन्तु वही रक्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के रक्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५६॥ तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना शिराः । पित्तादुष्णाश्च२ नीलाश्च शीता गौर्यः स्थिराः कफात् । असृग्धरास्तु ता रक्ताः स्युश्च नात्युष्णशीतलाः ॥२५७॥ पूर्वोक्त शिराओं में से वायु को वहन करनेवाली शिरायें जब वायु से भरी रहती हैं तब देखने में अरुण वर्ण की मालूम पड़ती हैं । इसी भाँति पित्तवहन करनेवाली शिरायें पित्त से नील वर्ण की तथा गरम और कफ वहन करनेवाली शिरायें कफ से शीतल; स्थिर तथा गौर वर्ण की मालूम पड़ती हैं और जो रक्त वहन करनेवाली शिरायें हैं वे रक्त से न अत्यन्त गरम और न अत्यन्त शीतल तथा रक्त वर्ण की मालूम पड़ती हैं ॥२५७॥ अथ स्नायुः- तत्र स्नायोः स्वरूपमाह- मेदसः स्नेहमादाय शिरा स्नायुत्वमाप्नुयात् । शिराणां हि मृदुः पाकः स्नायूनान्तु ततः खरः ॥२५८॥ स्नायवो बन्धनानि स्युर्देहमांसास्थिमेदसाम् । सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ॥२५९॥ स्नायु के स्वरूप—जो शिरायें मेद के स्नेह भाग को ग्रहण कर लेती हैं वे ही पक कर स्नायु के रूप को प्राप्त कर लेती हैं, क्योंकि शिरा तथा स्नायु में इतना ही अन्तर है कि शिराओं का पाक मृदु होता है तथा स्नायुओं का पाक उसकी अपेक्षा खर होता है । सम्पूर्ण स्नायु देह में मांस, अस्थि, मेद और सन्धियों के बन्धन हैं अर्थात् इन्हीं से वे सब बँधे हुए हैं अत एव शिराओं की अपेक्षा ये सुदृढ़ कहे गये हैं ॥२५८-२५९॥ नौर्यथा फलकास्तीर्णा बन्धनैर्बहुभिर्युता । नियुक्ताऽगाधसलिले भवेद्भारसहा भृशम् ॥२६०॥ जिस प्रकार फलकों (पटरों) से आस्तीर्ण तथा बहुत से रस्सी आदि से बँधी हुई नौका अगाध जल (समुद्रादिकों) में डाल देने पर अत्यन्त भार सँभालने में समर्थ होती है ॥२६०॥ ❖ फलकैः=काष्ठपट्टैः । आस्तीर्णा=व्याप्ता ।।२६०।। ‘फलकैः’ अर्थात् काठ की पटरियों से, ‘आस्तीर्णाः’ अर्थात् व्याप्त ॥२६०॥ एवमेव शरीरेस्मिन्यावन्तः सन्थयः स्मृताः । स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२६१॥ १. ‘सम्यगि’ति पा. । २. ‘पित्तदुष्टाश्चे’ति पा. ।
८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उसी प्रकार इस शरीर में जितनी सन्धियाँ हैं वे सब बहुत से स्नायुओं द्वारा बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्यादि भार वहन करने में समर्थ होते हैं ॥२६१॥ अथ स्नायुसंख्या आह- शतानि नव जायन्ते शरीरे स्नायवो नृणाम्। तासां विवरणं ब्रूमः शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ॥२६२॥ शाखासु षट्शतानि स्युः कोष्ठे त्रिंशच्छतद्वयम्। ग्रीवाया १ऊर्ध्वदेशे तु स्नायूनां सप्ततिः स्मृता ॥२६३॥ स्नायुओं की संख्या—मनुष्यों के शरीर में जो ९०० स्नायु हैं, उन सबों का विवरण हम कह रहे हैं, हे शिष्यों ! तुम लोग यत्नपूर्वक सुनो। चारो शाखाओं में अर्थात् दोनों हाथों और दोनों पैरों में ६००, कोष्ठ में २३०, ग्रीवा से ऊपर भाग में ७० स्नायुयें हैं ॥२६२-२६३॥ तत्र शाखागताः प्राह- एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां षट् षट् तास्त्रिंशत्। तावत्य एव तलकूर्चगुल्फेषु। तावत्य एव जङ्घायां, दश जानुनि। चत्वारिंशदूरौ। दश वङ्क्षणे। एवं सार्द्धशतमेकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहु च व्याख्यातौ। उनमें से शाखागत स्नायु—प्रत्येक पैर की अंगुलियों में ६-६६ मिलकर ३०, पैर के तलुये, कूर्च तथा गुल्फ में ३०, जङ्घा में ३०, जानु में १०, उरु में ४० और वङ्क्षण में १०, इस प्रकार से सब मिलकर १५० स्नायु एक पैर में होते हैं। इसी प्रकार दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं में भी स्नायु की संख्या कही हुई है। इस भाँति शाखाओं में ६०० स्नायु होते हैं। अथ कोष्ठगताः प्राह- ❖ षष्टिः कट्यां, तावत्य एव पार्श्वयोः, अशीतिः पृष्ठे, त्रिंशदुरसि। कोष्ठगत स्नायुओं की संख्या—कमर में ६०, दोनों पसुलियों में ६०, पीठ में ८० और वक्षः स्थल में ३०, इस प्रकार सब २३० स्नायु कोष्ठ में होते हैं। अथ ग्रीवोर्ध्वगताः प्राह- ❖ षट्त्रिंशद् ग्रीवायाम्। चतुस्त्रिंशन्मूर्ध्नि। एवं स्नायूनां नवशतानि भवन्ति ॥२६२-२६३॥ ग्रीवा से ऊपर भाग में स्थित स्नायुओं की संख्या—३६ ग्रीवा (गर्दन) में, और ३४ स्नायु मूर्धा में हैं। इस भाँति सब ७० स्नायु ग्रीवा से ऊपरी भाग में होते हैं। इस प्रकार सब मिल कर ९०० स्नायु होते हैं ॥२६२-२६३॥ अथ धमन्यः । धमन्यो नाभितो जाताश्चतुर्विंशतिसंख्यया। दशोर्ध्वग दशाधोगाः शेषास्तिर्यग्गताः स्मृताः ।। धमनियों की संख्या—जितनी धमनियां हैं वे सब नाभि से उत्पन्न हुई हैं तथा गिनती में २४ हैं जिनमें से १० धमनियां नाभि से निकल कर ऊपर को गई हैं और १० नीचे को तथा शेष चार धमनियां तिरछी गई हैं ॥२६४॥ ❖ तत्रोर्ध्वगाः-शब्दस्पर्शरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजृम्भितक्षुतहसितकथितरुदितगी१तादिविशेषा-नभिवहन्त्यः शरीरं धारयन्ति। १. ‘मूर्ध्वदेश’ इति पा. । १. ‘कम्पिते’ति पा. ।