भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे को पार्श्व सन्धिनामक मर्म कहते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ कटीकतरुणे—त्रिकसन्निधाने उभयतः श्रोणिकाण्डं १लक्ष्यीकृत्यास्थिस्थिते अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले शोणितक्षयात्पाण्डुविवर्णरूपं कृत्वा कालान्तरमारके। कटीकतरुण मर्म—त्रिक (पृष्ठवंश के नीचे की तीन हड्डी) के पास दोनों ओर दोनों श्रोणिकाण्डों को लक्ष्य करके जो दो हड्डियाँ हैं, उन्हीं में आधे अङ्गुल परिमित दो कटीकतरुण नामक अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से पाण्डु तथा विवर्ण रूप करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ नितम्बौ—प्रसिद्धौ। द्वे२ अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुलावधः कायशोषेण दौर्बल्येन च कालान्तर- मारके३ ॥२३१॥ नितम्बमर्म—नितम्ब नाम से प्रसिद्ध जो स्थान है, उसके दोनों भागों में आधे अङ्गुल परिमित दो अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर शरीर के नीचे भाग में शोष होने से तथा दुर्बलता होने से ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं ॥२३१॥ वैकल्यकराणि मर्माण्याह- लोहिताक्षाणिजानूर्वी४ कूर्चा विटपकूर्पराः। कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ॥२३२॥ अंसांसफलकापाङ्गा५ नीले मन्ये फणे तथा। वैकल्यकरणान्याहुरावत्तौ द्वौ तथैव च ॥२३३॥ विकलता करनेवाले मर्मस्थल—लोहिताक्ष चार, आणि चार, जानु दो, ऊर्वी चार, कूर्च चार, विटप दो, कूर्पर दो, कुकुन्दर दो, कक्षधर दो, विधुर दो, कृकाटिका दो, अंस दो, अंसफलक दो, अपाङ्ग दो, नीला दो, मन्या दो, फण दो, और आवर्त्त दो, ये सब मर्मस्थल चोट लगने पर अङ्ग में विकलता उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥२३२-२३३॥ ❖ लोहिताक्षाणि—ऊर्व्या६ ऊर्ध्वमधो वङ्क्षणसन्धेर्लोहिताक्षम्, ते च द्वे बाह्रोर्द्वे ऊर्वोरिवं तानि चत्वारि शिरामर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि। वैकल्यकराणि। तत्र शोणितक्षयेण पक्षाघातः सक्थिसादो वा। लोहिताक्ष मर्म—ऊर्वी नामक मर्म के ऊपर और वंक्षण नामक सन्धि के नीचे लोहिताक्ष नामक मर्म रहता है, वे दोनों बाहुओं में दो तथा दोनों ऊरुओं में दो इस प्रकार कुल चार हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म कहलाते हैं, चोट लगने पर ये विकलता करनेवाले होते हैं। इन मर्मस्थलों में चोट लगने पर जब रुधिर का क्षय होता है तब पक्षाघात (वायु सम्बन्धी रोग) अथवा सक्थिसाद होता है। ❖ आणयः-जानुन ऊर्ध्वमुभयोः पार्श्वयोस्त्र्यङ्गुला एकस्मिन् जानुनि द्वे अपरस्मिन् द्वे एवञ्चतस्रः, स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि वैकल्यकराणि, तत्र शोथाभिवृद्धिः सक्थिस्तम्भश्च। आणिमर्म—जानुओं के ऊपर दोनों ओर तीन अङ्गुल परिमिति जो स्थान है उसी को आणिमर्म कहते हैं। पैर में एक जानु के ऊपर दो और दूसरे पैर में जानु के ऊपर दो, इस प्रकार मिल कर चार आणिमर्म हैं। आधे अङ्गुल परिमित ये स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इन मर्मों में चोट लगने पर शोथ की अधिकता तथा सक्थिस्तम्भ रोग होता है। १. 'लक्ष्मी'ति पा.। २. 'द्वावि'ति पा.। ३. 'मारकावि'ति पा.। ४. 'जानूर्वोरि'ति पा.। ५. 'अंसांसफलकापाङ्गावि'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्। ६. 'ऊर्वोरि'ति पा.।