भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७१ ❖ जानुनी-जङ्घोर्वोः१ सन्धी सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुले वैकल्यकरे तत्र खञ्जता । जानुमर्म—जङ्घा और ऊरु की जो दो सन्धियाँ हैं वे ही जानु नामक मर्म कहलाती हैं, ये दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर खंजता (लङ्गड़ापन) रोग हो जाता है । २ऊर्व्यः—द्वे ऊर्वोर्मध्ये द्वे प्रगण्डयोर्मध्ये एवं चतस्रः, शिरामर्माणि एकाङ्गुल्यो वैकल्यकारिण्यस्तत्र३ शोणितक्षयात्सक्थिबाह्वोः४ शोषः । ऊर्वी मर्म—दोनों ऊरुओं के मध्य में दो और दोनों बाजुओं के मध्य में दो इस प्रकार मिल कर चार ऊर्वी मर्म हैं, ये एक अङ्गुल परिमित शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर रक्तक्षय होने से सक्थि शोष (पैर का सूखना) और बाहुशोष (बाहु का सूखना) रोग हो जाता है । कूर्चाः—पादयोरङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्ये तयोरूर्ध्वमधश्च, ५एवं चत्वारि स्नायुमर्माणि वैकल्यकराणि, तत्र पादयोर्भ्रमणवेपने भवतः । कूर्च मर्म—दोनों पैरों के अँगूठे और अङ्गुलियों के मध्य में ऊपर और नीचे दो दो करके कूर्चनामक चार स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर पैर का भ्रमण (घूमजाना) तथा कम्पन (काँपना) होता है । ❖ विटपे—द्वे वङ्क्षणवृषणयोर्मध्ये स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे च तत्र षाण्ड्यमल्पशुक्रता वा । विटपमर्म—वङ्क्षण और अण्डकोश के मध्य में विटप नामक दो मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर नपुंसकता अथवा शुक्र की अल्पता हो जाती है । ❖ कूर्परौ—कफोणिजौ द्वौ सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुलौ वैकल्यकरौ तत्र बाहुमध्ये सङ्कोचः । कूर्परमर्म—दोनों कफोणि (वेहुनी) कूर्परनामक मर्म कहलाते हैं, ये दोनों दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर बाहु के मध्य में सङ्कोच होता है । ❖ कुकुन्दरे—नितम्बकूपकौ६ द्वे७ सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र स्पर्शाज्ञानमधः—कायस्य चेष्टोपघातश्च । कुकुन्दर मर्म—दोनों नितम्बों के ऊपर जो दो गड्ढे से हैं, वे ही कुकुन्दर नामक मर्म कहलाते हैं । ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं । इनमें चोट लगने पर स्पर्शज्ञान का अभाव (सुन्न हो जाना) तथा शरीर के नीचे भाग की चेष्टाओं का नाश हो जाता है । ❖ कक्षधरे—वक्षःकक्षयोर्मध्ये द्वे स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र पक्षाघातः । कक्षधर मर्म—वक्षःस्थल तथा कक्ष (काँख) के मध्य में दोनों ओर दो कक्षधर नामक मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर पक्षाघात होता है । ❖ विधुरे—कर्णपृष्ठतोऽधःसंश्रिते८ किञ्चिन्निम्नाकारे द्वे स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाधिर्यम् । विधुरमर्म—दोनों कानों के पीछे नीच के भाग में कुछ दबे हुये जो स्थान हैं उन्हीं स्थानों में विधुर नामक मर्म होता १. 'जङ्घयो'रिति पा. । २. 'ऊर्वोरि'ति पा.। ३. 'वैकल्यकर्य' इति पा. । ४. 'सक्थिशोष' इति पा. । ५. 'हस्तयोरधश्चे'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ६. 'कूर्पराविति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ७. 'द्वावि'ति पा. । ८. 'पृष्ठाध' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA