भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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है, ये दोनों आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं। इनमें चोट लगने पर बाधिर्य (बहरापन) रोग हो जाता है। ❖ कृकाटिके-शिरोग्रीवयोरुभयतः सन्धी द्वे सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र शिरःकम्पः । कृकाटिका मर्म—शिर और ग्रीवा के दोनों भाग में जो दो सन्धियाँ हैं, वे ही कृकाटिका नामक मर्म हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर शिरःकम्प रोग होता है। ❖ अंसौ-स्कन्धौ स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र बाहुस्तम्भः । अंसमर्म—दोनों अंस (कन्धे) ही अंस नामक मर्म कहलाते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुस्तम्भ (बाहुओं का जकड़ जाना) रोग होता है। ❖ अंसफलके-पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसम्बद्धे, (ग्रीवायमंसद्वयस्य च संयोगो यत्र तन्त्रिकम् ।) अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाह्वोः शून्यता शोषश्च । अंसफलक मर्म—पीठ के ऊपर पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों ओर त्रिक से सम्बन्ध रखे हुये जो दो मर्म हैं वे ही अंसफलक नामक मर्म कहलाते हैं, (यहाँ पर 'त्रिक' पद से 'ग्रीवा में दोनों कन्धों का जहाँ पर संयोग होता है' उस स्थान को समझना चाहिये) ये आधे अङ्गुल परिमित अस्थिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुओं की शून्यता (सुन्न हो जाना) तथा शोष (सूख जाना) रोग होता है। ❖ अपाङ्गौ=नेत्रयोरन्तौ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुलौ वैकल्यकरौ, तत्रान्ध्यं दृष्ट्युपघातो वा । अपाङ्गमर्म—दोनों नेत्रों के जो दोनों प्रान्त भाग हैं वे ही अपाङ्ग मर्म कहलाते हैं। दोनों आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर आन्ध्य (अन्धा हो जाना) अथवा दर्शन शक्ति का ह्रास हो जाता है। नीले मन्ये च-कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यः, द्वे नीले द्वे मन्ये । तत्र एका मन्या एका लीना एकस्मिन् पार्श्वे, एव¹ अन्या मन्या नीला च अपरस्मिन् पार्श्वे द्वे द्वे शिरा मर्मणी द्व्यङ्गुले द्व्यङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र मूकता ²विकृतस्वरताऽरसग्राहिता च । नीला और मन्या मर्म—कण्ठ-नली के दोनों ओर नीला और मन्या नामक चार धमनियाँ हैं। उनमें से एक पार्श्व में एक नीला, एक मन्या और दूसरे पार्श्व में एक नीला तथा एक मन्या नामक धमनियाँ रहती हैं। इन्हीं मन्या नामक धमनियों में मन्या मर्म और नीला नामक धमनियों में नीला मर्म रहता है। दो दो अङ्गुल परिमित ये दोनों शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं। इनमें चोट लगने पर मूकता (गूँगा हो जाना) या विकृतस्वरता (स्वर का विकृत हो जाना) अथवा अरसग्राहिता (किसी रस के भी स्वाद लेने की शक्ति का न रहना) हो जाता है। ❖ फणे-घ्राणमार्गमुभयतः (³स्रोतोमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः) मांसमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र गन्धाज्ञानम् । फणमर्म—नासामार्ग के दोनों ओर (नासिका के भीतर स्रो