भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
है, ये दोनों आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं। इनमें चोट लगने पर बाधिर्य (बहरापन) रोग हो जाता है। ❖ कृकाटिके-शिरोग्रीवयोरुभयतः सन्धी द्वे सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र शिरःकम्पः । कृकाटिका मर्म—शिर और ग्रीवा के दोनों भाग में जो दो सन्धियाँ हैं, वे ही कृकाटिका नामक मर्म हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर शिरःकम्प रोग होता है। ❖ अंसौ-स्कन्धौ स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र बाहुस्तम्भः । अंसमर्म—दोनों अंस (कन्धे) ही अंस नामक मर्म कहलाते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुस्तम्भ (बाहुओं का जकड़ जाना) रोग होता है। ❖ अंसफलके-पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसम्बद्धे, (ग्रीवायमंसद्वयस्य च संयोगो यत्र तन्त्रिकम् ।) अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाह्वोः शून्यता शोषश्च । अंसफलक मर्म—पीठ के ऊपर पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों ओर त्रिक से सम्बन्ध रखे हुये जो दो मर्म हैं वे ही अंसफलक नामक मर्म कहलाते हैं, (यहाँ पर 'त्रिक' पद से 'ग्रीवा में दोनों कन्धों का जहाँ पर संयोग होता है' उस स्थान को समझना चाहिये) ये आधे अङ्गुल परिमित अस्थिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुओं की शून्यता (सुन्न हो जाना) तथा शोष (सूख जाना) रोग होता है। ❖ अपाङ्गौ=नेत्रयोरन्तौ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुलौ वैकल्यकरौ, तत्रान्ध्यं दृष्ट्युपघातो वा । अपाङ्गमर्म—दोनों नेत्रों के जो दोनों प्रान्त भाग हैं वे ही अपाङ्ग मर्म कहलाते हैं। दोनों आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर आन्ध्य (अन्धा हो जाना) अथवा दर्शन शक्ति का ह्रास हो जाता है। नीले मन्ये च-कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यः, द्वे नीले द्वे मन्ये । तत्र एका मन्या एका लीना एकस्मिन् पार्श्वे, एव¹ अन्या मन्या नीला च अपरस्मिन् पार्श्वे द्वे द्वे शिरा मर्मणी द्व्यङ्गुले द्व्यङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र मूकता ²विकृतस्वरताऽरसग्राहिता च । नीला और मन्या मर्म—कण्ठ-नली के दोनों ओर नीला और मन्या नामक चार धमनियाँ हैं। उनमें से एक पार्श्व में एक नीला, एक मन्या और दूसरे पार्श्व में एक नीला तथा एक मन्या नामक धमनियाँ रहती हैं। इन्हीं मन्या नामक धमनियों में मन्या मर्म और नीला नामक धमनियों में नीला मर्म रहता है। दो दो अङ्गुल परिमित ये दोनों शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं। इनमें चोट लगने पर मूकता (गूँगा हो जाना) या विकृतस्वरता (स्वर का विकृत हो जाना) अथवा अरसग्राहिता (किसी रस के भी स्वाद लेने की शक्ति का न रहना) हो जाता है। ❖ फणे-घ्राणमार्गमुभयतः (³स्रोतोमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः) मांसमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र गन्धाज्ञानम् । फणमर्म—नासामार्ग के दोनों ओर (नासिका के भीतर स्रो
ौ द्वौ मणिबन्धौ द्वौ-> could line 7 have footnote 3? Or line 14:❖ मणिबन्धि द्वौ-> variant:'द्वौ मणिबन्धावि'ति पाठान्तरम्! Yes! Look at line 14: ❖ मणिबन्धि द्वौ-> someone wroteमणिबन्धि द्वौ, but variant is 'द्वौ मणिबन्धावि'ति! And look at the number in line 14: before द्वौor aboveमणिबन्धि? There is a superscript ३! Wait, let's look at line 14: ❖ मणिबन्धि ३द्वौor❖ मणिबन्धौ ३द्वौ? Wait, look at the digit before द्वौin line 14: It looks like a Devanagari३or४? In Devanagari, ३ has two curves (like a 3). In line 14, it has a loop: wait, is it ३or४? Let's look at line 10: सन्धिमर्म्मणी २द्वयङ्गुले- wait, the digit in line 10 has a loop at the bottom? In Devanagari, २ is a curve with a tail or loop: २. In line 7:रुजाकराणि जानीयादष्टावैता
दो मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म आधे अङ्गुल परिमित हैं, इन मर्मों में जब शल्य (बाणादि) बिंध जाते हैं, तब जितने काल तक शल्य उनमें बिंधे (पड़े) रहते हैं उतने काल तक मनुष्य जीवित रहता है, और यदि बिंधे हुये स्थान के पक जाने पर उसमें से शल्य आप ही आप बाहर निकल आवे तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है, किन्तु यदि बिंधे हुये शल्य को स्वयं निकाला जाय तो मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। ये विशल्यघ्न (बिंधे हुये शल्य के निकालने पर) प्राणियों के मारनेवाले हैं।
❖ स्थपनी-एका भ्रुवोर्मध्ये शिरामर्मेदमर्द्धाङ्गुलं विशल्यघ्नम् ।। २३५ ।। स्थपनी मर्म—दोनों भौहों के मध्यस्थल में एक स्थपनी नामक मर्म है। यह आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विशल्यघ्न है ॥२३५॥
सप्तरात्रान्तरे हन्युः सद्यः प्राणहराणि हि । कालान्तरप्राणहरं पक्षे मासे च मारकम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब सात रात्रि के अन्दर प्राण ले लेते हैं और कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब पक्ष में या एक मास के अन्दर प्राण हरण करते हैं ॥२३६॥
सद्यः प्राणहरस्यान्ते विद्धं कालेन मारयेत् । कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्धन्तु दुःखदम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त जितने मर्मस्थल हैं उनके समीप में शस्त्रादि से यदि चोट लग जाय तो कालान्तर में प्राणनाश होता है। और यदि कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त मर्मस्थलों के समीप में चोट लग जाय तो केवल दुःख देनेवाला (रुजा करनेवाला) ही होता है ।। २३६ ।।
अन्ते=मर्मसमीपे ।। २३७ ।। 'अन्ते' इस पदका 'समीप में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२३७॥
मर्माप्यधिष्ठाय हि ये विकारा मूर्च्छन्ति काये विविधा नराणाम् । प्रायेण ते कृच्छ्रतमा भवन्ति वैद्येन यत्नेरपि साध्यमानाः ।। २३८ ।। मनुष्यों के शरीर में मर्मस्थलों का आश्रय लेकर चाहे जिस प्रकार के रोग उत्पन्न हों तथा वैद्य लोग यत्नपूर्वक चाहे जितनी चिकित्सा करें तो भी प्रायः करके देखा जाता है कि वे कष्टसाध्य ही होते हैं ॥२३८॥
अथ सन्धयः ते द्विविधाश्चेष्टावन्तः स्थिराश्च - शाखासु हन्वोः कट्याञ्च चेष्टावन्तो भवन्ति हि । शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः ।। २३९ ।। सन्धियों के लक्षण—सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं—चेष्टावाली और स्थिर। उनमें से दोनों हाथों, दोनों पैरो, दोनों हनुओं (कपोलों के नीचे की हड्डियों) और कटि (कमर) में जो सन्धियाँ हैं, वे चेष्टावाली हैं और शेष सब सन्धियाँ स्थिर (चेष्टाशून्य) हैं ॥२३९॥
अथ सन्धिसंख्या आह- कथिता देहिनां देहे सन्धयो द्वे शते दश । शाखासु तेऽष्टषष्ठिश्च कोष्ठे त्वेकोनषष्टिका ।। २४० ।। ग्रीवाया ऊर्ध्वदेशे तुल्यशीतिस्ते प्रकीर्तिताः । प्रथमं परिगण्यन्ते तेषु शाखागता इह ।। २४१ ।। सन्धियों की संख्या—देहधारी मनुष्यों के शरीर में २१० सन्धियाँ हैं। उनमें से ६८ सन्धियाँ चारो शाखाओं में, ५९ कोष्ठ (ग्रीवा से नीचे पैर के ऊपर) में और ८३ ग्रीवा से लेकर उसके ऊपर भाग में कही हुई हैं। उन पूर्वोक्त सन्धियों में से जितनी चारों शाखाओं में हैं, इस समय उन्हीं का सर्व प्रथम परिगणन किया जा रहा है ॥२४०-२४१ ।।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७५ ❖ एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां१ त्रयस्त्रयो द्वावङ्गुष्ठे ते चतुर्दश । गुल्फजानुवङ्क्षणेष्वेकैकमेवं सप्तदश एकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । एवमष्टषष्टिःशाखासु । दोनों पैरों की चार-चार अङ्गुलियों में तीन-तीन और अंगूठे में दो-दो इस प्रकार एक पैर की पाँचों अङ्गुलियों में चौदह सन्धियाँ हैं और गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना) और वङ्क्षण (ऊरु सन्धि) में एक-एक सन्धियाँ हैं, इस प्रकार एक पैर में सब मिल कर सत्रह सन्धियाँ हैं। इसी तरह दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं की भी सन्धियाँ कही हुई हैं। इस प्रकार अड़सठ सन्धियाँ चार शाखाओं में होती हैं। अथ कोष्ठगतानाह- ❖ त्रयः २कटीकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवंशे, तावन्त एव पार्श्वयोरष्टावुरसि, एवमेकोन षष्टिः कोष्ठे । कोष्ठगत सन्धियाँ—कमर और कपाला
७६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवापृष्ठवंशयोस्तु प्रतराः । शिरःकटीकपालेषु १तूणसेवन्यः । हन्वोरुभयतः काकतुण्डाख्याः । कण्ठहृदयव्लोमनाडीषु मण्डलाख्याः । २श्रोत्रशृङ्गाटकेषु शङ्खावर्त्ताः ।।२४२।। (१) कोर सन्धि को कोई 'गड्ढे' और कोई 'नली' के सदृश बतलाते हैं। (२) उदूखल सन्धि ओखली (धानकूटने का काष्ठपात्र विशेष) के सदृश होती है। (३) सामुद्ग सन्धि यहाँ समुद्र पद से 'सम्पुट' समझना चाहिये। समुद्र ही 'सामुद्ग' कहलाता है, यहाँ पर स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने पर आदि पदकी वृद्धि होने से 'सामुद्ग' पद की सिद्धि होती है, यह 'सामुद्ग' सन्धि सम्पुट के आकार की होती है। (४) प्रतर सन्धि—जिससे जल में तैरा जा सके उसे प्रतर अर्थात् बेलन कहते हैं, 'प्रतर' सन्धि बेलन के आकार की होती है। (५) तूणसेवनी सन्धि-तूण अर्थात् बाण रखने के तरकश की भाँति सेवनी (सिली हुई) के समान होने से तूणसेवनी सन्धि कहते हैं। (६) काकतुण्ड सन्धि—कौवे के मुख के समान होने से इसे काकतुण्ड सन्धि कहते हैं। (७) मण्डल सन्धि-लोक प्रसिद्ध मण्डल की भाँति आकार होने से इसे मण्डलसन्धि कहते हैं। (८) शङ्खावर्त्त सन्धि-शङ्ख के आवर्त्त (नाभिचक्र) की भाँति आवर्त्त होने से इसे शङ्खावर्त्त सन्धि कहते हैं। इन पूर्वोक्त सन्धियों के नाम आकृति के अनुसार रखे गये हैं। इन सन्धियों के मध्य में कोर नामक सन्धि अङ्गुलि, मणिबन्ध (कलाई), गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना), कूर्पर (केहुनी), इन स्थानों में होती है। काँख, वङ्क्षण (ऊरुसन्धि) और दाँतों में उदूखलनामक सन्धि होती है। कन्धा, पीठ, गुदा, भग और नितम्ब में सामुद्गनामक सन्धि होती है। गर्दन और मेरुदण्ड में प्रतर नामक सन्धि होती है। शिर, कमर और कपाल में तूणसेवनी नामक सन्धि होती है। दोनों हनुओं के दोनों तरफ काकतुण्ड नामक सन्धि होती है। कण्ठ, हृदय, क्लोम और नाड़ी में मण्डलनामक सन्धि होती है। कान और शृङ्गाटक में शङ्खावर्त्त नामक सन्धि होती है ॥२४२॥ अस्थ्नां तु सन्धयो ह्येते केवलाः समुदाहृताः । पेशीस्नायु शिराणान्तु सन्धिसंख्या न विद्यते ।। २४३ ।। ऊपर जिन सन्धियों का उल्लेख किया गया है, वे केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु तथा शिराओं के सन्धियों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है क्योंकि वे असङ्ख्य हैं ॥२४३॥ अथ शिरामाह- सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुहाः शिराः। नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। २४४ ।। शिराओं का वर्णन—सन्धियों को बाँधने वाली तथा दोष (वात, पित्त, कफ) और धातु (रस, रक्तादि) को वहन करने वाली शरीर में जितनी शिरायें हैं वे सभी नाभि में बँधी हुई हैं और वहाँ ही से निकल कर चारों तरफ शाखा प्रशाखा द्वारा शरीर में फैली हुई हैं ॥२४४॥ शरीरं सकलञ्चैतच्छिराभिः पोष्यते सदा। प्रणालीभिरिवारामाः कुल्याभिः क्षेत्रधान्यवत् ।। २४५ ।। जैसे जल की नाली द्वारा बगीचा आदि का तथा कुल्या (नहर) द्वारा खेत में धानों का पोषण हुआ करता है, उसी भाँति शिराओं द्वारा समस्त शरीर का भी पोषण हुआ करता है ॥२४५॥ ❖ अत्र प्रणालीभिः कुल्याभिरिति दृष्टान्तद्वयं स्थूलसूक्ष्मशिराभेदात् ।। २४५ ।। यहाँ प्रणाली और कुल्या जो दो दृष्टान्त दिये गये हैं वे स्थूल और सूक्ष्म इन दो प्रकार की शिराओं के भेद से हैं ॥२४५॥ प्रसारणाकुञ्चनादिक्रियाभिः सततं तनौ। शिरा एवोपकुर्वन्ति ताः स्युः सप्तशतानि तु ।। २४६ ।। १. 'तूनसेविन्य' इति पा. । २. 'शिर' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७७ यथा द्रुमदले साक्षाद् दृश्यन्ते प्रतताः शिराः । तथैव देहिनो देहे वर्त्तन्ते सकले शिराः ।। २४७ ।। नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणात्राभिरुपाश्रिता । शिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ।। २४८ ।। अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना आदि क्रियाओं द्वारा जो शिरायें शरीर का उपकार करती हैं, वे संख्या में ७०० हैं । जिस प्रकार वृक्षों के पत्तों में फैली हुई शिरायें (नसें) प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ती हैं, उसी प्रकार देहधारी मनुष्यादि के सम्पूर्ण शरीर में भी फैली हुई शिरायें (नसें) रहती हैं । प्राणियों प्राणवाहक शिरासमूह नाभि में स्थित रहता है, और नाभि भी प्राणबाहक शिरासमूहों के आश्रित रहती है । जैसे चक्र की नाभि (पहिये की मध्यका गोलाकार काष्ठ) अरक (काष्ठ के लम्बे-लम्बे टुकड़ों) के द्वारा घिरी हुई रहती हैं, वैसे ही शिराओं से नाभि आवृत (लिपटी) हुई रहती हैं ।।२४६-२४८।। ❖ ता १यथा-तासां खलु मूलशिराश्चत्वारिंशत् । तासां दश वातवहाः, दश पित्तवहाः, दश श्लेष्मवहाः, दश रक्तवहाः, तासां खलु वातवहानां वातस्थानगतानां सपञ्चसप्तति शतं भवति२ । तावत्य३ एव पित्तवहाः पित्तस्थानगताः श्लेष्मवहास्ताः श्लेष्मस्थानगताः, रक्तवहा यकृत्प्लीहगताः । एवं शिराः सप्त शतानि भवन्ति । तत्र वातवहा एकस्मिन् सक्थिनि पञ्चविंशतिः, एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । विशेषतः कोष्ठे चतुस्त्रिंशत्, तासां श्रोण्यां गुदमेढ्रादिसंश्रिता४ अष्टौ । द्वे द्वे पार्श्वयोः । षट् ६ पृष्ठे । तावत्य एवोदरे ६ । दश वक्षसि १० । एकश्चत्वारिंशद् ४१ जत्रुणि ऊर्ध्वम् । तासां चतुर्दश १४ ग्रीवायाम् । ४ चतस्रः कर्णयोः । ९ नव जिह्वायाम् । ६ षट् नासिकायाम् । ८ अष्टौ नेत्रयोः । एवं वातवहानां सपञ्चसप्तति शतं भवति५ । एवं विभागः पित्तवहानामपि विशेषस्तु पित्तावहा नेत्रयोर्दश १० । कर्णयोर्द्वे दो । एवं रक्तवहाः । श्लेष्मवहास्तु षोडश १६ ग्रीवायाम् कर्णयोर्द्वे २ । एवं शिराणां सप्तशतानि व्याख्यातानि ।। २४६-२४८ ।। शिराओं के भेद—पूर्वोक्त ७०० शिराओं में से मुख्य शिरायें ४० हैं, उनमें १० वायु को १० पित्त को, १० कफ को और १० रक्त को वहन करने वाली हैं । उनमें से पूर्वोक्त वायु के स्थान में स्थित वायु को वहन करनेवाली जो मूल १० शिरायें हैं, वे ही शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ हो जाती हैं । इसी प्रकार पित्त के स्थान में स्थित पित्त को वहन करनेवाली, कफ के स्थान में स्थित कफ को वहन करनेवाली और यकृत् तथा प्लीहा जो रक्त के स्थान हैं उनमें स्थित रक्त को बहन करनेवाली जो मुख्य दस-दस शिरायें हैं उनमें से प्रत्येक शाखा प्रशाखा द्वारा वायु की भाँति १७५ हो जाती हैं । उनमें से वायु को वहन करनेवाली शिरायें एक पैर में २५ और दूसरे पैर में भी २५ हैं तथा दोनों बाहुओं में भी २५- २५ मिल कर ५० हैं, ऐसा समझना चाहिये । विशेषतः कोष्ठस्थान में वायु को वहन करने वाली ३४ शिरायें इस तरह से हैं—श्रोणि (कटि) गुदा और लिङ्ग आदि के आश्रित ८ दोनों पंसुलियों में दो-दो इस प्रकार चार, पीठ में छः, उदर में भी छः और वक्षःस्थल में दस । जत्रु (ग्रीवा) के मूल भाग के ऊपर ४१ वात को वहन करनेवाली शिरायें इस तरह से हैं—ग्रीवा में १४, दोनों कानों में दो-दो करके चार, जिह्वा में नौ, नासिका में छः, दोनों नेत्रों में चार-चार करके आठ । इस प्रकार वात को वहन करनेवाली मुख्य १० शिरायें शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ होती हैं । इसी प्रकार पित्त को वहन करनेवाली १६५ शिराओं का भी विभाग होता है, किन्तु विशेष यह है कि पित्त को वहन करनेवाली शिरायें नेत्रों में १० और कानों में दो होती है । इस प्रकार अर्थात् ठीक पित्तवहा शिराओं की भाँति ही १७५ रक्तवहा शिराओं का भी विभाग समझना चाहिये । कफ वहन करनेवाली १७५ शिराओं का भी विभाग इसी भाँति होता है, किन्तु भेद इतना ही है कि
१. 'तद्यथे'ति पा. । २. 'भवन्ती'ति पा. । ३. अत्र सर्वत्र 'तावन्त्य' इति पा. 'तावत्य' इत्यत्र पदे बोध्यम् । ४. 'श्रिते'ति पा. । ५. 'अज्ञानं ने'ति पा. । ६. 'चरन्त्रि'ति पाठः प्रामादिकः ।
७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवा में १६ और कानों में दो ही कफ वहन करनेवाली शिरायें होती हैं। इस प्रकार ७०० शिरायें मुनियों ने कही हैं ॥२४६-२४८॥ क्रियाणामप्रतीघातममोहं बुद्धिकर्मणाम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाःशिराः पवनश्चरन् ।।२४९।। वायु अपनी शिराओं में विचरण करता हुआ क्रियाओं का अप्रतिघात करता है, अर्थात् शरीर की प्रसारणादि क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आने देता और बुद्धिकर्मों का अमोह करता है अर्थात् बुद्धीन्द्रियों को मोह नहीं होने देता तथा अन्य गुणों को भी करता है ॥२४९॥ ❖ क्रियाणां = प्रसारणाकुञ्चनादीनाम् । अमोहं बुद्धिकर्मणाम् = बुद्धीन्द्रियाणां मनसो बुद्धेश्च स्वे स्वे विषये ज्ञानं करोतीत्यर्थः । अन्यान् गुणान् = रसादिव्यापनद्वारा शरीरपोषणादीन् ।।२४९।। ‘क्रियाओं का अप्रतीघात करता है' इसका अर्थ यह है कि फैलाना, सिकोड़ना आदि जितनी शरीर की क्रियायें हैं उन सबों का ठीक-ठीक सम्पादन करता है तथा 'बुद्धिकर्मों का अमोह करता है' अर्थात् बुद्धीन्द्रिय जो आँख, नाक, कान आदि हैं उनको तथा मन और बुद्धि को, अपने-अपने विषयों में ज्ञान प्रदान करता है। 'अन्य गुणों को करता है' अर्थात् रसादिकों को सर्वत्र व्याप्त करने के द्वारा शरीर का पोषण करता है, ऐसा समझना चाहिये ॥२४९॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः शिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसम्भवाः ।।२५०।। जिस समय वायु कुपित होकर अपनी सिराओं में विचरण करता है उस समय प्राणियों के शरीर में वायु से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५०॥ भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि पित्तमात्मशिराश्चरद् १ ।।२५१।। पित्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में भ्राजिष्णुता (शरीर में कान्ति होना), अन्न में रुचि, जठराग्नि की दीप्ति, अरोगता (रोग का न होना) तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५१॥ ❖ अरोगतां = पैत्तिकरोगानुत्पत्तिं करोति । अन्यान् गुणान् = मेधाबुद्धिदर्शनशक्त्यादीन् ।।२५१।। ‘अरोगतां' से 'पित्तसम्बन्धी रोग का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य भी गुणों को' इससे 'मेधा (धारणशक्ति), बुद्धि और देखने की शक्ति को' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२५१॥ यदा तु कुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः शिराः । यदाऽस्यविविधारोगाजायन्ते पित्त सम्भवाः ।।२५२।। किन्तु वही पित्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में पित्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५२॥ स्नेहमङ्गेषु सन्धीनां स्थैर्यं बलमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि बलासःस्वाःशिराश्चरन् ।।२५३।। कफ जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब अङ्गों में स्निग्धता अर्थात् अङ्गों का रूक्ष न होना, सन्धियों की स्थिरता, बल, अरोगता आदि अन्य गुणों को भी करता है ॥२५३॥ ❖ अरोगतां = श्लैष्मिकरोगानुत्पत्तिम् । अन्यान् गुणान् = बलपुष्ट्यादीन् ।।२५३।। 'आरोगतां' पद से 'कफ सम्बन्धी रोगों का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य गुणों को' इससे 'बल तथा पुष्टि आदि को' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२५३॥ यदा तु कुपितःश्लेष्मा स्वाःशिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसम्भवाः ।।२५४।। १. 'चरन्नि'ति पाठः प्रामादिकः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७९ किन्तु वही कफ जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के कफ से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५४॥ धातूनां पूरणं१ वर्णं स्पर्शज्ञानमसंशयम् । स्वशिरासु चरद्रक्तं कुर्याच्चान्यान् गुणानपि ॥२५५॥ रक्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के सम्पूर्ण धातुओं का पूरण करता है अर्थात् सब धातुओं की मात्रा पूर्ण रूप से बनाये रहता है और वर्ण अर्थात् शरीर के गौरादि वर्ण, जैसा चाहिये वैसा निश्चितरूप से स्पर्श का ज्ञान तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५५॥ ❖ अन्यान् गुणान्=बलपुष्ट्यादीन् ॥२५५॥ ‘अन्यान् गुणान्’ अर्थात् ‘बल तथा पुष्टि आदि गुणों को ऐसा समझना चाहिये ॥२५५॥ यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः शिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसम्भवाः ॥२५६॥ किन्तु वही रक्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के रक्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५६॥ तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना शिराः । पित्तादुष्णाश्च२ नीलाश्च शीता गौर्यः स्थिराः कफात् । असृग्धरास्तु ता रक्ताः स्युश्च नात्युष्णशीतलाः ॥२५७॥ पूर्वोक्त शिराओं में से वायु को वहन करनेवाली शिरायें जब वायु से भरी रहती हैं तब देखने में अरुण वर्ण की मालूम पड़ती हैं । इसी भाँति पित्तवहन करनेवाली शिरायें पित्त से नील वर्ण की तथा गरम और कफ वहन करनेवाली शिरायें कफ से शीतल; स्थिर तथा गौर वर्ण की मालूम पड़ती हैं और जो रक्त वहन करनेवाली शिरायें हैं वे रक्त से न अत्यन्त गरम और न अत्यन्त शीतल तथा रक्त वर्ण की मालूम पड़ती हैं ॥२५७॥ अथ स्नायुः- तत्र स्नायोः स्वरूपमाह- मेदसः स्नेहमादाय शिरा स्नायुत्वमाप्नुयात् । शिराणां हि मृदुः पाकः स्नायूनान्तु ततः खरः ॥२५८॥ स्नायवो बन्धनानि स्युर्देहमांसास्थिमेदसाम् । सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ॥२५९॥ स्नायु के स्वरूप—जो शिरायें मेद के स्नेह भाग को ग्रहण कर लेती हैं वे ही पक कर स्नायु के रूप को प्राप्त कर लेती हैं, क्योंकि शिरा तथा स्नायु में इतना ही अन्तर है कि शिराओं का पाक मृदु होता है तथा स्नायुओं का पाक उसकी अपेक्षा खर होता है । सम्पूर्ण स्नायु देह में मांस, अस्थि, मेद और सन्धियों के बन्धन हैं अर्थात् इन्हीं से वे सब बँधे हुए हैं अत एव शिराओं की अपेक्षा ये सुदृढ़ कहे गये हैं ॥२५८-२५९॥ नौर्यथा फलकास्तीर्णा बन्धनैर्बहुभिर्युता । नियुक्ताऽगाधसलिले भवेद्भारसहा भृशम् ॥२६०॥ जिस प्रकार फलकों (पटरों) से आस्तीर्ण तथा बहुत से रस्सी आदि से बँधी हुई नौका अगाध जल (समुद्रादिकों) में डाल देने पर अत्यन्त भार सँभालने में समर्थ होती है ॥२६०॥ ❖ फलकैः=काष्ठपट्टैः । आस्तीर्णा=व्याप्ता ।।२६०।। ‘फलकैः’ अर्थात् काठ की पटरियों से, ‘आस्तीर्णाः’ अर्थात् व्याप्त ॥२६०॥ एवमेव शरीरेस्मिन्यावन्तः सन्थयः स्मृताः । स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२६१॥ १. ‘सम्यगि’ति पा. । २. ‘पित्तदुष्टाश्चे’ति पा. ।
८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उसी प्रकार इस शरीर में जितनी सन्धियाँ हैं वे सब बहुत से स्नायुओं द्वारा बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्यादि भार वहन करने में समर्थ होते हैं ॥२६१॥ अथ स्नायुसंख्या आह- शतानि नव जायन्ते शरीरे स्नायवो नृणाम्। तासां विवरणं ब्रूमः शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ॥२६२॥ शाखासु षट्शतानि स्युः कोष्ठे त्रिंशच्छतद्वयम्। ग्रीवाया १ऊर्ध्वदेशे तु स्नायूनां सप्ततिः स्मृता ॥२६३॥ स्नायुओं की संख्या—मनुष्यों के शरीर में जो ९०० स्नायु हैं, उन सबों का विवरण हम कह रहे हैं, हे शिष्यों ! तुम लोग यत्नपूर्वक सुनो। चारो शाखाओं में अर्थात् दोनों हाथों और दोनों पैरों में ६००, कोष्ठ में २३०, ग्रीवा से ऊपर भाग में ७० स्नायुयें हैं ॥२६२-२६३॥ तत्र शाखागताः प्राह- एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां षट् षट् तास्त्रिंशत्। तावत्य एव तलकूर्चगुल्फेषु। तावत्य एव जङ्घायां, दश जानुनि। चत्वारिंशदूरौ। दश वङ्क्षणे। एवं सार्द्धशतमेकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहु च व्याख्यातौ। उनमें से शाखागत स्नायु—प्रत्येक पैर की अंगुलियों में ६-६६ मिलकर ३०, पैर के तलुये, कूर्च तथा गुल्फ में ३०, जङ्घा में ३०, जानु में १०, उरु में ४० और वङ्क्षण में १०, इस प्रकार से सब मिलकर १५० स्नायु एक पैर में होते हैं। इसी प्रकार दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं में भी स्नायु की संख्या कही हुई है। इस भाँति शाखाओं में ६०० स्नायु होते हैं। अथ कोष्ठगताः प्राह- ❖ षष्टिः कट्यां, तावत्य एव पार्श्वयोः, अशीतिः पृष्ठे, त्रिंशदुरसि। कोष्ठगत स्नायुओं की संख्या—कमर में ६०, दोनों पसुलियों में ६०, पीठ में ८० और वक्षः स्थल में ३०, इस प्रकार सब २३० स्नायु कोष्ठ में होते हैं। अथ ग्रीवोर्ध्वगताः प्राह- ❖ षट्त्रिंशद् ग्रीवायाम्। चतुस्त्रिंशन्मूर्ध्नि। एवं स्नायूनां नवशतानि भवन्ति ॥२६२-२६३॥ ग्रीवा से ऊपर भाग में स्थित स्नायुओं की संख्या—३६ ग्रीवा (गर्दन) में, और ३४ स्नायु मूर्धा में हैं। इस भाँति सब ७० स्नायु ग्रीवा से ऊपरी भाग में होते हैं। इस प्रकार सब मिल कर ९०० स्नायु होते हैं ॥२६२-२६३॥ अथ धमन्यः । धमन्यो नाभितो जाताश्चतुर्विंशतिसंख्यया। दशोर्ध्वग दशाधोगाः शेषास्तिर्यग्गताः स्मृताः ।। धमनियों की संख्या—जितनी धमनियां हैं वे सब नाभि से उत्पन्न हुई हैं तथा गिनती में २४ हैं जिनमें से १० धमनियां नाभि से निकल कर ऊपर को गई हैं और १० नीचे को तथा शेष चार धमनियां तिरछी गई हैं ॥२६४॥ ❖ तत्रोर्ध्वगाः-शब्दस्पर्शरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजृम्भितक्षुतहसितकथितरुदितगी१तादिविशेषा-नभिवहन्त्यः शरीरं धारयन्ति। १. ‘मूर्ध्वदेश’ इति पा. । १. ‘कम्पिते’ति पा. ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८१ प्रश्वासः = अन्तःप्रविशन् १वायुः । उच्छ्वासः = ऊर्ध्वं गच्छन् वायुः । तास्तु हृदयं गतास्त्रिधा जायन्ते । तास्त्रिंशत् । तासां मध्ये द्वे द्वे वातपित्तकफशोणितरसान् वहतः । ता दश । अष्टाभिः शब्दरसरूपगन्धान् गृह्णाति पुरुषः । द्वाभ्यां भाषते । द्वाभ्यां घोषते । द्वाभ्यां स्वपिति । द्वाभ्यां जागर्ति । द्वे अश्रुवाहिन्यौ । द्वे स्तन्यं स्त्रियावहतः, [स्तनसंश्रिते२] त एव शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यामभिवहतः । एतास्त्रिंशत् (सविभागा३ व्याख्याताः) एताभि (रूर्ध्व नाभे४) रुदरपार्श्वपृष्ठोरस्कन्धग्रीवा५ बाहवो धार्यन्ते चाल्यन्ते च । उसमें से जो धमनियां ऊपर गई हुई हैं वे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रश्वास, उच्छ्वास, जम्भाई, छींक, हँसी, बोलना, रोना और गीत आदि विशेष कर्मों को वहन करती हुई अर्थात् कार्यों का सम्पादन करती हुई शरीर को धारण करती हैं (यहाँ पर 'प्रश्वास' पद से 'उदर' में प्रवेश करता हुआ वायु और 'उच्छ्वास' पद से 'ऊपर अर्थात् उदर से बाहर निकलता हुआ वायु' यह अर्थ समझना चाहिये) । पूर्वोक्त ऊपर जाने वाली वे ही १० धमनियां नाभि से हृदय में पहुँच कर प्रत्येक तीन-तीन हो जाती हैं, इस प्रकार वे ३० होती हैं। उनमें से २-२ वायु, पित्त, कफ, रक्त और रस को वहन करती हैं, इस प्रकार वे १० हैं और ८ धमनियों से मनुष्य शब्द, रस, रूप और गन्ध को ग्रहण करता है अर्थात् दो से शब्द, दो से रस इत्यादि क्रम से ग्रहण करता है। तथा दो धमनियों से बात करता है, दो से शब्द करता है, दो से सोता है, दो से जागता है, दो धमनियां आँसू वहन करने वाली हैं और दो धमनियां स्त्रियों के स्तनों में रह कर दूध को वहन करती हैं और वे ही दोनों धमनियां पुरुषों के दोनों स्तनों में रह कर वहाँ ही से शुक्र को वहन करती हैं। इस प्रकार ये ३० धमनियां विभाग के साथ अर्थात् अलग २ कही गई । ऊपर को जाने वाली इन्हीं तीस धमनियों द्वारा नाभि से ऊपर के भाग में स्थित उदर, पंसुली, पीठ, वक्षःस्थल, कन्धा, ग्रीवा और बाहु धारण किया जाता है और हिलाया डुलाना जाता है। (६अधोगताः प्राह-) ❖ अधोगतास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रार्त्तवादीनधो वहन्ति । तास्तु पित्ताशयं गतस्त्रिधा जायन्ते । तास्त्रिंशत् । तासां मध्ये द्वे द्वे वातपित्तकफशोणितरसान् वहतः । ता दश । द्वे अन्नवहे७ अन्त्राश्रिते । द्वे तोयवहे । द्वे बस्तिगते मूत्रवहे । द्वे शुक्रस्य प्रादुर्भावाय । द्वे तद्विसर्गाय, त एव नारीणामार्त्तवप्रादुर्भावयतो विसृजतश्च८ । द्वे स्थूलान्त्रप्रतिबद्धे पुरीषं विसृजतः । अष्टावन्यास्तिर्यग्गता स्वेदमर्पयन्ति । एतास्त्रिंशत् । एताभिरधो नाभेः पक्वाशयकटीमूत्रपुरीष- बस्तिगुदमेढ्रसक्थीनि धार्यन्ते चाल्यन्ते च । नाभि से नीचे की ओर गई हुई धमनियां—नीचे की ओर गई हुई धमनियां अधो वायु, मूत्र, पुरीष, शुक्र और आर्त्तव (रज) आदि को नीचे की ओर ले जाती हैं। और वे ही पित्ताशय में जाकर प्रत्येक तीन-तीन हो जाती हैं। इस प्रकार वे सब १० से ३० धमनियां हो जाती हैं। उनमें से दो दो वात, पित्त, कफ, रक्त और रस का वहन करती हैं, वे १० हैं और बाकी २० धमनियों में से दो धमनियां अतड़ियों के आश्रय में रह कर अन्न को वहन करती हैं, दो धमनियां बस्ति (मूत्राशय) में स्थित होकर मूत्र वहन करती हैं। दो धमनियां शुक्र को उत्पन्न करने के लिये और दो शुक्र को त्याग करने के लिये होती हैं, और वे ही दो-दो धमनियां स्त्रियों के रज को उत्पन्न करतीं तथा निकालती हैं और दो धमनियां मोटी आँतड़ियों में बँधी हुई पुरीष का त्याग करती हैं, और बाकी ८ धमनियां तिरछी जाकर स्वेद (पसीना) उत्पन्न करती हैं, इस प्रकार ये ३० नाभि के अधोभाग की ओर गई हुई धमनियां होती हैं। ये ही सब धमनियां नाभिके नीचे भाग में स्थित पक्वाशय, कटि, मूत्र, पुरीष, गुदा, लिङ्ग और पैर को धारण करती और हिलाती डुलाती हैं। १. 'प्रविष्ट' इति पा. । २,३,४. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ५. 'ग्रीवाशिर' इति पा. । ६. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ७. 'अन्तर्वहे' इति पा. । ८. 'प्रादुर्भावाय ते अधिसृजतश्चे'ति पा. । ९ भाव.I
८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे (तिर्यग्गताः १प्राह-) तिर्यग्गतानां तु चतसृणामेकैका शतधा सहस्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यते । तास्तु असंख्येयास्ताभिरिदं शरीरं गवाक्षितम्, निबद्धमायतम्, गवाक्षवद् निबद्धमायतम् । गवाक्षो=वातायनम्, यथा गवाक्षे बहूनि छिद्राणि भवन्ति तथाऽस्मिन् देहे जालवद् शिरा व्याप्य तिष्ठन्तीति भावः । निबद्धमायतं गवाक्षितम् । २गवाक्षाकाररन्ध्रनिकरयुक्तं कृतमित्यर्थः । तासां मुखानि रोमलग्नानि यैर्मुखैः स्वेदः स्रवति रसश्चाभिसन्तर्पयन्ति अन्तर्बहिश्च । तैरवाभ्यङ्गपरिषेकावगाहनालेपनवीर्याणि त्वचि पक्वानि अन्तः प्रवेशयन्ति । तैरेव स्पर्शं शुभमशुभं वा गृह्णन्ति ।।२६४।। तिर्यग्गत धमनियाँ—तिर्यग्गत चार धमनियों में हर एक में से उत्तरोत्तर विभक्त हो कर सैकड़ों, हजारों धमनियाँ हो जाती हैं, अतः उनकी संख्या नहीं हो सकती । उन्हीं असंख्य धमनियों से मनुष्यादि का यह शरीर गवाक्ष (हवा आने की जालीदार खिड़की) की भाँति सर्वत्र निबद्ध अर्थात् भर रहा है । यहाँ पर मूल में 'गवाक्षितं निबद्धमायतञ्च' यह जो लिखा है उसका अर्थ यह है कि 'गवाक्ष की भाँति बहुत दूर में अर्थात् सर्वत्र निबद्ध (भर रहा) है' । इसका भाव यह है कि 'गवाक्ष' (हवा के आने जाने की खिड़की) में जैसे बहुत से छिद्र होते हैं, उसी भाँति इस शरीर में भी जाल की भाँति शिरायें सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित हैं अर्थात् जालीदार खिड़की की भाँति छिद्र समूहों से युक्त हो रहा है । उन्हीं असंख्य शिराओं के मुख प्रत्येक रोमों के साथ लगे हुए हैं अत एव जो स्वेद (पसीना) निकलता है वह उन्हीं असंख्य शिराओं के मुख से ही निकलता है तथा उन्हीं के द्वारा देहस्थित रस भीतर बाहर सर्वत्र पहुँच कर सन्तर्पण करता (सींचता) रहता है और उन्हीं के द्वारा अभ्यङ्ग (तैलादि की मालिश करना), परिषेक (शीतल जलादिकों से सेचन करना), अवगाहन (स्नान करना) और आलेपन (चन्दनादि का लेप करना) इन सबों के वीर्य (प्रभाव) त्वचा में जब परिपक्व हो जाते हैं तब शरीर के भीतर प्रवेश करते हैं और उन्हों के द्वारा पुरुष शुभ (भला) अथवा अशुभ (बुरा) स्पर्श का ज्ञान प्राप्त करता है ।।२६४।। यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु विसेषु च । धमनीनां तथा खानि रसो यैरभितश्चरेत् ।।२६५।। जिस प्रकार कमल के नाल तथा कन्दों में स्वभावतः बहुत से छिद्र होते हैं उसी प्रकार पूर्वोक्त धमनियों में भी छिद्र होते हैं । जिनसे कि रस चारों तरफ सञ्चार करता करता है ।।२६५।। पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति । पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ।।२६६।। पञ्चभूतात्मक धमनियाँ पाँच इन्द्रियों से विशिष्ट जीवात्मा को श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठानों में संयोजित करती हैं अर्थात् क्रमानुसार प्रत्येक इन्द्रियों के अधिष्ठान में संयोजित करती हैं न कि एक ही समय में जीवात्मा को पाँचों इन्द्रियों के अधिष्ठानों में संयोजित करती हैं । एवं श्रोत्रादि पाँच बुद्धीन्द्रियों और इनसे उपलक्षित हस्तादि पाँच कर्मेन्द्रियों को तथा ज्ञानेन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय संज्ञक मन को भी पृथिव्यादि सम्बन्धी पाँच बुद्धीन्द्रियों के गन्धादि विषयों में और उनमें उपलक्षित हस्तादि पाँच कर्मेन्द्रियों के विषयों में तथा मन के विषय मन्तव्य अर्थात् सभी इन्द्रियों के विषयों के ज्ञान करने में संयोजित करती हैं तथा प्राणविनाश होने के समय सभी धमनियाँ पञ्चत्व अर्थात् आकाशादि पञ्च महाभूतों के भाव को प्राप्त हो जाती हैं । इसका भाव यह है कि—धमनियों की ही सहायता से जीवात्मा क्रम से श्रोत्रादि प्रत्येक इन्द्रियों के अधिष्ठानों का आश्रय लेता है तथा उसके आश्रय लेने के बाद वे ही इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में संयोजित होती हैं यह प्रकृतावस्था की दशा है, विकृतावस्था में अपने-अपने महाभूतों के रूप में मिल जाती हैं ।।२६६।। १. कोष्ठस्यः पाठः क्वाचित्कः । २. 'गवाक्षाकारान्त्रे'ति पा. ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८३ ❖ अस्यायमर्थः-धमन्यः कथम्भूताः पञ्चाभिभूताः, पञ्चभ्य आकाशादिमहाभूतेभ्यः, अभिसमन्ताद् भूताः । पञ्चेन्द्रियम्=पञ्च इन्द्रियाणि उभयात्मकं मनश्च यस्य तं पञ्चेन्द्रियं जीवात्मानम् । पञ्चसु=इन्द्रियाधिष्ठानेषु श्रोत्रादिषु । पञ्चकृत्वः=पञ्चवारान्, पर्यायेण न तु एकदैव, भावयन्ति=प्रापयन्ति । पञ्चेन्द्रियं=पञ्चानाभिन्द्रियाणां समाहारः पञ्चेन्द्रियं श्रोत्रादि तदुपलक्षितं कर्मेन्द्रियं मनश्च । पञ्चसु=पृथिव्यादिषु बुद्धीन्द्रियविषयेषु तदुपलक्षितेषु हस्तादिषु कर्मेन्द्रियविषयेषु मन्तव्ये मनोविषये च । भावयित्वा=प्राप्य, संयोज्येति यावत् । विनाशकाले पञ्चत्वमाकाशादिभावमायान्ति प्राप्नुवन्तीत्यर्थः ।।२६६।। उपर्युक्त श्लोक स्थित पदों की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि-'धमनियां कैसी हैं कि-'पञ्चाभिभूताः' अर्थात् आकाशादि पञ्चमहाभूतों से अभिभूत (सर्वतोभाव से उत्पन्न) हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँच श्रोत्रादि इन्द्रियाँ तथा उभयात्मक (बुद्धीन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय स्वरूप) मन जिसकी इन्द्रियाँ हैं ऐसे जीवात्मा को। 'पञ्चसु' अर्थात् श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठानों में । 'पञ्चकृत्वः' अर्थात् पाँच बार पर्याय से (क्रम से) न कि एक समय में ही। 'भावयन्ति' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) करती हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँचों इन्द्रियों के समूह जो श्रोत्रादि बुद्धीन्द्रियाँ तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियाँ एवं मन हैं उन सबों को । 'पञ्चसु' अर्थात् पृथिव्यादि सम्बन्धी जो बुद्धीन्द्रियों के गन्धादि विषय हैं तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियों के भी जो ग्राह्यादि (सृष्टिप्रकरणोक्त) विषय हैं, एवं मन के भी जो मन्तव्य अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियों के विषयों का ज्ञानरूप विषय हैं उन सबों में 'भावयित्वा' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) कर के । विनाश का काल उपस्थित होने पर 'पञ्चत्वम्' अर्थात् आकाशादि ५ महाभूतों के भाव को प्राप्त करती हैं—पञ्च महाभूतों के रूप में मिल जाती हैं ।।२६६।। अथ कण्डराः- महत्यः स्नायवः प्रोक्ताः कण्डरास्तास्तु षोडश । प्रसारणाकुञ्चनयोर्द्दष्टं तासां प्रयोजनम् ।। चतस्रो हस्तयोस्तासां तावत्यः१ पादयोः स्मृताः । ग्रीवायामपि तावत्यस्तावत्यः२ पृष्ठसङ्गताः ।।२६७।। कण्डराओं के स्वरूप और स्थान—बड़ी-बड़ी स्नायुओं को 'कण्डरा' कहते हैं, वे १६ हैं। कण्डराओं के द्वारा शरीर के अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना क्रिया सम्पन्न होती हैं। उन १६ कण्डराओं में से चार कण्डरायें दोनों हाथों में, चार दोनों पैरों में, चार गर्दन में और चार ही पीठ में होती हैं ।।२६७।। तत्र पादहस्तगतानां कण्डराणां नखाः प्ररोहाः । ग्रीवानिबन्धनानामधोभागगतानां प्ररोहो मेढ्रः । पृष्ठनिबन्धनानां प्ररोहा ३नितम्बमूर्धोरुवक्षोऽक्षितनपिण्डाः ।।२६८।। उनमें से जो हाथों और पैरों में रहनेवाली कण्डरायें हैं उनके प्ररोह (अङ्कुर) भाग नख हैं। गर्दन में बंधी हुई और नीचे की ओर गई हुई कण्डराओं का प्ररोह (अङ्कुर) भाग मेढ्र (लिङ्ग) है। और पीठ में बंधी हुई कण्डराओं के प्ररोह (अङ्कुर) भाग नितम्ब, मस्तक, ऊरु, वक्षःस्थल, नेत्र और स्तनपिण्ड हैं ।।२६८।। अथ रन्ध्राणि- नेत्रश्रवणनासानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते । मुखमेहनपायूनामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।।२६९।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः । स्त्रीणामन्यानि च त्रीणि स्तनयोर्गर्भवर्त्मनि ।।२७०।। रन्ध्रों की संख्या और स्थान—नेत्र, कान, नाक, में दो-दो, मुख, लिङ्ग तथा गुदा में एक-एक और मस्तक १. 'तावन्त्य' इति पा. । २. 'तावन्त्यस्तावन्त्य' इति पा. । ३. 'मूर्ध्नो'रिति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे में एक छिद्र होता है। इस प्रकार पुरुषों के शरीर में १० छिद्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में दोनों स्तनों में दो और गर्भाशय में एक इस प्रकार तीन छिद्र अधिक होते हैं ॥२६९-२७०॥ अथ स्रोतांसि- मनःप्राणान्नपानीयदोषधातुपधातवः । धातूनां च मला मूत्रं मलमित्यादयस्तनौ ।। २७१।। सञ्चरन्ति हि यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सङ्गगुः । बहूनि तानि संख्याय शक्यन्ते नैव भाषितुम् ।। २७२।। स्रोतों के लक्षण—जिन मार्गों से मन, प्राण, अन्न, जल, दोष धातु, उपधातु, धातुओं के मल, मूत्र और विष्ठा आदि पदार्थ शरीर में सञ्चार करते हैं उन्हीं मार्गों को स्रोत कहते हैं। वे इतने अधिक हैं कि गिन नहीं सकते अर्थात् असंख्य हैं ॥२७१-२७२॥ अथ जालानि- जालानि तु शिरास्नायुमांसास्थ्नामुद्भवन्ति हि । तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश ।। २७३।। जालों के लक्षण और संख्या—शिरा (नसें), स्नायु, मांस और हड्डी इनका जाल होता है अर्थात् इन्हीं से जालों की उत्पत्ति होती है। वे जाल प्रत्येक शिरा आदि में चार-चार हैं अत एव सब मिल कर सोलह हैं ॥२७३॥ ❖ निरन्तररन्ध्रानि१ करकलितानि समूहितानि च जालानीव जालानि । तानि मणिबन्धगुल्फसंश्रितानि२ परस्परनिबद्धानि परस्परसंश्लिष्टानि परस्परगवाक्षितानि चेति, यैर्गवाक्षितमिदं शरीरम् । निरन्तर (सघन) छिद्रसमूहों से बने हुये समूह युक्त जाल की भाँति होने से ये जाल कहलाते हैं। ये मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (पादग्रन्थि) में स्थित परस्पर बँधे हुये तथा परस्पर मिले हुये हैं अत एव गवाक्ष (जालीदार खिड़की) की भाँति छिद्रयुक्त होते हैं। जिन (जालों) से यह शरीर गवाक्षित (जालीदार खिड़की की भाँति) होता है। ❖ अयमर्थः-एकस्मिन् मणिबन्धे एकं जालं शिरायाः, अपरं स्नायोः, तृतीयं मांसस्य, चतुर्थमस्थ्नः, एवं चत्वारि जालानि । एतेनेतरमणिबन्धो गुल्फौ च व्याख्यातौ । गवाक्षितं विरचितनिरन्तरजालाका- रन्ध्रनिकरपरिकलितमित्यर्थः ।। २७३।। स्पष्ट अभिप्राय यह है कि—एक मणिबन्ध में एक जाल शिराओं का, दूसरा स्नायुओं का, तीसरा मांस का, चौथा हड्डियों का, इस प्रकार चार जाल हैं। इसी प्रकार दूसरे मणिबन्ध तथा दोनों गुल्फों (पैर की एड़ी) में चार २ जाल कहे हुये हैं तथा इन जालों से यह शरीर गवाक्षित अर्थात्—सघन बुने हुये जाल के आकार की भाँति छिद्रसमूहों से व्याप्त रहता है ॥२७३॥ अथ कूर्चाः- कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि । ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ्रे सर्वेऽपि षट् स्मृताः । कूर्चा अपि शिरास्नायुमांसास्थिप्रभवाः३ स्मृताः ।।२७४।। कूर्चों के लक्षण और संख्या—दोनों हाथों में दो, दोनों पैरों में दो, ग्रीवा में एक और मेढ्र में एक, इस प्रकार सब मिलकर छै कूर्च हैं, कूर्च शिरा, स्नायु, मांस तथा अस्थियों से ही बने होते हैं। कूर्च (कूँचा) के समान आकृति होने से ये कूर्च कहलाते हैं ॥२७४॥ १. ‘रन्ध्राणि करे’ति पा. । २. ‘संसृते’ति पाठान्तरं सार्वत्रिकं सुश्रुतासम्मतम् । ३. ‘प्रभव’ इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८५ अथ रज्जवः- पृष्ठवंशस्योभयत्र महत्यो मांसरज्जवः। चतस्रो मांसपेशीनां बन्धनं तत्प्रयोजनम् ।।२७५।। रज्जुओं के लक्षण और संख्या-पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों तरफ बड़ी-बड़ी चार मांस की रज्जु (डोरियाँ) हैं, उनमें से दो बाहर की तथा दो भीतर की हैं। इनका प्रयोजन केवल यह है कि मांसपेशियों को ऊपर नीचे से अस्थियों में बाँध कर रखें जिससे बिखर न जायें ।।२७५।। अथ सेवन्यः- सेवन्यः सप्त तासां तु भवेयुः पञ्च मस्तके। एका शेफसि जिह्वायामेका विध्येन्न ताः क्वचित् ।। सेवनियों के लक्षण और संख्या-शरीर में सेवनी सात होती हैं, उनमें पाँच मस्तक में, एक लिङ्ग में तथा एक जीभ में होती है। सेवनियों का कभी शस्त्रादि से वेध नहीं करना चाहिये। सिले हुए की भाँति जो स्थान होता है उसी को सेवनी समझना चाहिये ।।२७६।। अथ सङ्घाताः- चतुर्दशास्थां सङ्घातास्तेषां त्रयो गुल्फजानुवंक्षणेषु। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ त्रिकशिरसोरेकैकम्¹ ।।२७७।। सङ्घातों की संख्या-हड्डियों के संघात (तक जगह रहना) शरीर में १४ हैं। उनमें से तीन सङ्घात गुल्फ (एड़ी), जानु और वङ्क्षण (ऊरुसन्धि) में हैं, इसी तरह दूसरे पैर के भी गुल्फ, जानु तथा वङ्क्षण में तीन सङ्घात हैं। तथा दोनों बाहुओं में भी तीन-तीन सङ्घात हैं अर्थात् दोनों बाहुओं के मणिबन्ध, कूर्पर (केहुनी) तथा वंक्षण (बगल) में भी तीन-तीन कुल छै सङ्घात हैं और त्रिकस्थान में एक तथा शिर में भी एक सङ्घात है ।।२७७।। ❖ अत्र तु त्रिकपदेन, बाहुग्रीवास्थिसङ्घात उच्यते ।।२७७।। 'त्रिक' पद से ग्रीवा और दोनों बाहुओं के मध्य में स्थित अस्थिसङ्घात को समझना चाहिये ।।२७७।। अथ सीमन्ताः- चतुर्दशैव सीमन्ताः कथिता मुनिपुङ्गवैः। सङ्घाताः सीविता यैस्तु सीमन्तास्ते प्रकीर्तिताः ।।२७८।। सीमन्तों के लक्षण और संख्या-मुनिश्रेष्ठों ने शरीर में चौदह सीमन्त कहे हैं। जिनसे अस्थियों के सङ्घात परस्पर जोड़े जाते हैं, वे सीमन्त कहलाते हैं ।।२७८।। ❖ यैः-अस्थिभिः ।।२७८।। अथ त्वचः- क्षीरस्य पच्यमानस्य यथा सन्तानिका भवेत्। पच्यमानस्य शुक्रस्य रजसश्च तथा त्वचः ।। पूर्वावभासिनी तासां सिध्मस्थानं च सा स्मृता ।।२७९।। त्वचाओं के लक्षण और संख्या-जिस प्रकार अग्नि पर दूध के पकाये जाने पर उसके ऊपर सन्तानिका (मलाई) पड़ जाती है, उसी भाँति धातुस्थित अग्नि से पकते हुए शुक्र तथा रज से भी जो उत्पन्न होता है वही त्वचा कहलाती है और एक के ऊपर दूसरी इस प्रकार से सब मिलकर सात प्रकार की त्वचायें हैं उनमें से सबसे पहली अवभासिनी नाम की त्वचा है, जो सिध्म नामक कोढ़ विशेष के उत्पन्न होने का स्थान है ।।२७९।। १. 'रैकैक' इति पा. । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचिरकः।
८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ अथावभासिनी-भ्राजकेन पित्तेनावभासनात् । परिणाहेन विस्तारितस्य व्रीहे (२विंशतिभागेष्व) द्वादशो भागःप्रमाणं यस्याः । व्रीहिरत्रयवः, सा सिध्मपद्मकण्टकयोरधिष्ठानम् ।। त्वचा का जो 'अवभासिनी' नाम है वह भ्राजक नामक पित्त से अवभासित (दीप्त) होने से ही है। परिणाह अर्थात् चौड़ाई में फैलाये हुये व्रीहि का (जब की चौड़ाई का) बीस भाग करने पर उनमें से केवल १८ भागों को मिला कर जितनी चौड़ाई होती है उतने प्रमाण इस त्वचा की मुटाई होती है। यहाँ पर 'व्रीहि' इस पद से जब नामक अन्न का ग्रहण करना चाहिये । यह केवल 'सिध्म' उत्पन्न होने का स्थान नहीं है, बल्कि 'सिध्म' और 'पद्मकण्टक' दोनों ही का उत्पत्तिस्थान है। द्वितीया लोहिता ज्ञेया तिलकालकजन्मभूः ।।२८०।। दूसरी त्वचा का नाम 'लोहिता' है यह 'तिलकालक' का उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।। ❖ द्वितीया यवषोडशभागप्रमाणा तिलकालकन्यच्छव्यङ्गानामधिष्ठानम् ।।२८०।। दूसरी त्वचा की मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से १६ भागों के बराबर होती है। यह केवल तिलकालक का ही नहीं किन्तु न्यच्छ और व्यङ्ग (झाईं) रोगों का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।। तृतीया तु भवेच्छ्वेता स्थानं चर्मदलस्य सा ।।२८१।। तीसरी त्वचा श्वेता नाम की होती है जो चर्मदल नामक रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।। ❖ सा यवद्वादशभागप्रमाणा चर्मदलाजगल्लिकामशकानामधिष्ठानम् ।।२८१।। तीसरी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के २० भागों में से १२ भागों के बराबर होती है और वह केवल चर्मदल का ही नहीं, किन्तु अजगल्लिका और मस्सा का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।। ताम्रा चतुर्थी विज्ञेया किलाश्वित्रभूमिका ।।२८२।। चौथी त्वचा का नाम ताम्रा है, वह किलास तथा श्वित्र नामक कोढ़ का उत्पत्तिस्थान है ।।२८२।। चतुर्थी यवाष्टभागप्रमाणा ।।२८२।। चौथी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के बीस भागों में से ८ भागों के बराबर होती है ।।२८२।। पञ्चमी१ वेदिनी नाम्ना पञ्चभागप्रमाणिका । विसर्पकुष्ठाधिष्ठाना ज्ञेया षष्ठी तु रोहिणी ।। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः ।।२८३।। पाँचवीं त्वचा वेदिनी नाम की होती है। इसकी मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से पाँच भागों के बराबर होती है। यह विसर्प तथा कुष्ठों का उत्पत्तिस्थान है। छठी त्वचा रोहिणी नाम से प्रसिद्ध है, यह गाँठ, अपची और गलगण्ड रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।। ❖ २व्रीहिमात्रप्रमाणा सा रोहिणी ग्रन्थ्यपचीगलगण्ड (३गण्ड) मालाऽर्बुदश्लीपदानाम्धिष्ठानम् ।।२८३।। 'रोहिणी' नाम की जो छठीं त्वचा है, उसकी मुटाई एक जौ की चौड़ाई के बराबर है। वह केवल गाँठ, अपची और गलगण्ड का ही नहीं किन्तु गण्डमाला, अर्बुद और श्लीपद रोग का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।। १. एतत्कोष्ठस्थपाठस्थाने क्वचित् 'पञ्चमी वेदिनी नाम्ना सर्वकुष्ठोद्भवा तु सा। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः' उति पाठो लभ्यते। २. 'सा पञ्चमी वेदिनी यवपञ्चभागप्रमाणिका। सा षष्ठी रोहिणी व्रीहिप्रमाणे'ति पाठान्तरम्। ३. क्वचिन्नाप्युपलभ्यते कोष्ठस्थः पाठः।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८७ स्थूला त्वक्सप्तमी ख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्च सा ।।२८४।। सातवीं त्वचा स्थूला नाम से प्रसिद्ध है और वह विद्रधि आदि रोगों का उत्पत्तिस्थान है ।।२८४।। ❖ सा सप्तमी व्रीहिद्वयप्रमाणा ।। अत¹ एवोक्तं शार्ङ्गधरेण-स्थूला व्रीहिद्विमात्राचेति । सप्तापि त्वचः समुदिता विंशतितमभागोनषड्यवप्रमाणाः । षड्यवप्रमाणं तु अङ्गुष्ठोदरतुल्यम् । यत उक्तम्-‘एतत् प्रमाणं मांसलेषु स्थलेषु बोद्धव्यम्, न तु ललाटसूक्ष्माङ्गुल्यादिषु उदरे ²त्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति ।।२८४।। सातवीं स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जौ की चौड़ाई की भाँति होती है। क्योंकि 'शार्ङ्गधर' ने भी कहा है कि— 'स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जब के बराबर है' और इन सातों त्वचाओं की मुटाई सब मिलकर एक जौ के बीस भागों में से बीसवाँ भाग (अर्थात् एक भाग) कम छः जौ के चौड़ाई के भाँति है। छः जौ की चौड़ाई तो हाथ के अंगूठे के उदर भाग की चौड़ाई के बराबर होती है। किन्तु यह प्रमाण (चौड़ाई) मांसल (मांस से भरे हुए) स्थूल भागों में ही जानना चाहिये; न कि ललाट, तथा पतली अंगुली आदि भागों में। क्योंकि कहा भी है कि 'पेट में यदि शस्त्र से वेध (छेदन) करना हो तो अंगूठे के उदर की चौड़ाई के बराबर गहरा छेदन करना चाहिये ।।२८४।। अथ लोमानि लोमकूपाश्च- अस्थ्नो मलानि लोमनि चासंख्यानि भवन्ति हि । सन्ति यावन्ति लोमानि तावन्तो लोमकूपकाः ।।२८५।। रोम तथा रोमकूप—रोम हड्डियों के मल से उत्पन्न होते हैं और वे असङ्ख्य हैं। तथा शरीर में जितने रोम हैं उतने ही रोमकूप (छिद्र) भी हैं ।।२८५।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तिः स्वभावादेव जायते । सन्निवेशश्च गात्राणां नात्रास्ते कारणान्तरम् ।।२८६।। अङ्ग और प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति तथा इन सबों का भिन्न-भिन्न प्रकार की बनावट स्वभाव से ही होती है। इसमें दूसरा कारण कोई नहीं है ।।२८६।। ❖ निर्वृत्तिः=सिद्धिः । स्वभावात्=ईश्वरात् । सन्निवेशो=रचनाविशेषः ।।२८६।। 'निर्वृत्ति' पद से सिद्धि अर्थात् उत्पत्ति और स्वभाव' पद से 'ईश्वर की इच्छा' तथा 'सन्निवेश' पद से 'रचना विशेष' अर्थात् 'बनावट' समझना चाहिये ।।२८६।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तौ ये भवन्त्यगुणा गुणाः ! ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ।।२८७।। दन्तानां पतनं जन्म पुनः पाते त्वसम्भवः । तलेष्वनुद्भवो लोम्नामेतत्सर्वं स्वभावतः ।।२८८।। गर्भ के अङ्ग तथा उपाङ्गों के बनने में जो गुण अथवा अवगुण (दोष) हो जाते हैं वे उसी गर्भस्थ जीव के धर्म तथा अधर्म के निमित्त.से ही होते हैं। बाल्यावस्था में दाँतों का गिरना तथा उसके बाद पुनः जमना और दुबारा जमे हुए दाँतों के गिरने पर पुनर्बार न जमना, एवं हथेली तथा तलुए में रोगों का न होना, ये सब स्वभाव (ईश्वरेच्छा) से होते हैं, इनमें कोई दूसरा कारण नहीं है ।।२८७-२८८।। गर्भे मासि मासि यद्भवति तदाह- गर्भाशये निपतितं यादृक्शुक्रं तथाऽऽर्तवम् । तादृगेव द्रवीभूतं प्रथमे मासि तिष्ठति ।।२८९।। प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था—गर्भाशय में जैसी अवस्था में शुक्र तथा रज गिरता है पहले महीने में वह वैसी (द्रवरूप में) ही रहता है ।।२८९।। १. 'तत' इति पाठान्तरम् । २. 'उदरेष्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति पा. ।'
८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मारुतपित्तकफैस्तस्तथैः पच्यमानो द्वितीयके। 'कललस्थमहाभूतसमुदायो घनीभवेत् ।।२९०।। दूसरे मास में गर्भाशय में स्थित वायु, पित्त और कफ की ऊष्मा से पकता हुआ कलल में स्थित पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों से बना हुआ कललस्वरूप शुक्र और रज घन हो जाता है ।।२९०।।
- अत्र मरुत्कफयोरपि पाकहेतुत्वमेव तयोरप्यूष्मणोऽधिकरणत्वात् । यत उक्तं चरके 'भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसीः' इति ।। २९० ।। यहाँ पित्त की भाँति वायु और कफ को भी पाक का कारण समझना चाहिये क्योंकि इन दोनों में भी ऊष्मा होती है। अतएव चरक में भी कहा है कि - 'भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश में रहनेवाली भी पाँच ऊष्मा हैं' ।। २९० ।। तृतीये मासि शिरसो हस्तयोः पादयोस्तथा । पिण्डकाः पञ्च सिध्यन्ति सूक्ष्माङ्गावयवास्तनोः ।।२९१।। तीसरे मास में शिर, दोनों हाथ और दोनों पैर इन पाँच अवयवों के स्थान में पाँच पिण्ड और शरीर के सूक्ष्मभाव से अङ्गों के अवयव भी निकलते हैं ।।२९१।। सर्वाण्यङ्गान्युपाङ्गानि चतुर्थे स्युः स्फुटानि हि । हृदयव्यक्तभावेन व्यज्यते चेतनाऽपि च ।।२९२।। तस्माच्चतुर्थ गर्भस्तु नाना वस्तूिन वाञ्छति । ततो द्विहृदया यत्स्यान्नारी दौहृदिनी मता ।।२९३।। दौहृदावज्ञया कुब्जं कुणि षण्ढं च वामनम् । विकृताक्षमनक्षं वा पुत्रं नारी प्रसूयते ।।२९४।। यतः स्त्री दौहृदं प्राप्य वीर्यवन्तं चिरायुषम् । पुत्रं प्रसूयते तस्मात्तस्यै वाञ्छितमर्पयेत् ।। २९५ ।। चौथे मास में जितने अङ्ग और उपाङ्ग हैं वे सभी स्फुट (साफ-साफ प्रगट) हो जाते हैं और साथ-साथ हृदय के व्यक्त हो जाने से चेतना भी व्यक्त हो जाती है। इसी से उस समय गर्भिणी स्त्री दो (एक अपना और दूसरा गर्भ का) हृदयवाली हो जाने से 'दौहृदिनी' कहलाने लगती है। अतएव दौहृद की अवज्ञा होने से अर्थात् गर्भिणी स्त्री अभिलषित वस्तु को न पाने से कुब्जा, लूला, नपुंसक, बौना, विकार से युक्त (बुरा) नेत्रोंवाला अथवा अन्धा बालक उत्पन्न करती है। क्योंकि गर्भिणी स्त्री दौहृद (अभिलषित वस्तु) पाकर के वीर्यशाली और दीर्घ आयुवाली सन्तान पैदा करती है, अतः गर्भिणी को जो वांछित वस्तु हो देवे ।।२९२-२९५।। इन्द्रियार्थांस्तु यान्यान्सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी । गर्भबाधाभयात्तांस्तान्भिषगाहृत्य दापयेत् ।।२९६।। गर्भिणी स्त्री आँख, कान आदि जिन-जिन इन्द्रियों के विषयों को भोगने की इच्छा करे उन-उन विषयों को न देने से भी गर्भ को बाधा पहुँचेगी इस भय से वैद्य मँगवा करके दिलावें ।।२९६।।
- भोक्तुमुपभोक्तुमित्यर्थः ।। २९६ ।। 'भोग करने की' अर्थात् 'उपभोग करने की' ऐसा समझना चाहिये ।।२९६।। सा प्राप्तदौहृदा पुत्रं जनयेत्तु गुणान्वितम् । अलब्धदौहृदा गर्भे लभेतात्मनि वा भयम् ।। २९७।। इस प्रकार से अभिलषित वस्तु को प्राप्त किये हुई जो गर्भिणी स्त्री होती है वह गुण से युक्त सन्तान पैदा करती है और जो अभिलषित वस्तु को नहीं प्राप्त करती है वह अपने गर्भ अथवा शरीर के विषय में बाधा प्राप्त करती है ।। २९७।। येषु येष्विन्द्रियार्थेषु दौहृदे साऽवमानिता। प्रसूयते सुतं सार्ति तस्मिंस्तस्मिंस्तदिन्द्रिये ।।२९८।।
- सार्ति= सव्यथम् ।। २९८ ।। १. 'पाच्यमानमि'ति पा.। २. 'कललस्थं महाभूतं समुदायंगि'ति पा.। ३. 'हेतुत्वे' इति पा.।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८९ जिन-जिन इन्द्रियों के विषय शब्द स्पर्शादि अभिलाषित होते हुये भी यदि गर्भिणी को नहीं प्राप्त होते हैं तो वह उन-उन इन्द्रियों ही के सम्बन्ध में पीड़ा युक्त सन्तान पैदा करती है अर्थात् जैसे गर्भिणी की इत्र सूँघने की इच्छा हुई और उसे इत्र नहीं प्राप्त हुआ तो उसके जो सन्तान पैदा होगी उसके घ्राणेन्द्रिय (नासिका) में अवश्य किसी न किसी रोग से पीड़ा पहुँचेगी ॥२९८॥ दौहृदविशेषफलमाह- राजसन्दर्शने यस्या दौहृदं जायते स्त्रियाः। अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ।।२९९।। दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहृदात्। अलङ्कारेषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ।।३००।। गर्भिणी की इच्छा विशेष—जिस गर्भिणी स्त्री की अभिलाषा राजा के दर्शन करने की हो वह धनवान् और भाग्यशाली सन्तान पैदा करती है। यदि उत्तम सूती अथवा रेशमी वस्त्र तथा भूषणादि धारण करने की अभिलाषा हो तो वह अलङ्कारों (आभूषणों) को चाहने वाली सुन्दर सन्तान पैदा करती है ॥२९९-३००॥ आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते। देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पार्षदोपमम् ।।३०१।। यदि (तपस्वियों के) आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो तो मन को वश में रखने वाली धर्मशील सन्तान पैदा करती है। यदि देवताओं की प्रतिमा (मूर्ति) देखने अथवा पूजनादि करने की अभिलाषा हो तो पार्षद के समान सन्तान उत्पन्न करती है ॥३०१॥ ❖ आश्रमे = तपस्विनामाश्रमे दौहृदात्, पार्षदोपमं=प्रमथोपमम् ।।३०१।। 'आश्रमे' का अर्थ प्रकरण वश 'तपस्वियों के आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो' ऐसा किया गया है और 'पार्षदोपमम्' इस पद से प्रमथ (भगवान् शङ्कर के पार्षद) के समान ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥३०१॥ दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते। रक्ताक्षं लोमशं शूरं महिषामिषदौहृदात् ।।३०२।। वाराहमांसे स्वप्नालुं शूरं सञ्जनयेत्सुतम्। मृगमांसे तु जङ्घालं१ विक्रान्तं वनचारिणम् ।।३०३।। अतोऽनुक्तेषु या नारी दौहृदं विदधाति हि। शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ।।३०४।। पञ्चमे मानसं षष्ठे बुद्धिश्चातिप्रबुद्ध्यते। सर्वाण्यङ्गान्यपाङ्गानि भृशं व्यक्तानि सप्तमे ।।३०५।। ओजोऽष्टमे सञ्चरति माता पुत्रौ मुहुः क्रमात्। तेन तौ म्लानमुदितौ स्यातां जातो न जीवति ।।३०६।। यदि हिंस्रजातिवाले व्याघ्रादि जीवों के देखने के विषय में अभिलाषा हो तो हिंसाशील सन्तान पैदा करती है। महिष (भैंसा) के मांस खाने की अभिलाषा होने से लाल नेत्रवाली, बहुत रोयें से युक्त शरीर वाली और शूर (पराक्रमी) सन्तान पैदा करती है। सूअर के मांस खाने की अभिलाषा होने से अधिक सोनेवाली और शूर सन्तान पैदा करती है। हरिण के मांस खाने की अभिलाषा होने से जङ्घाल अर्थात् दौड़ लगानेवाली अथवा जङ्घा में अधिक ताकत रखनेवाली विक्रम से युक्त वन में विचरण करनेवाली सन्तान पैदा करती है। जो गर्भिणी स्त्री इन पूर्वोक्त जन्तुओं से भिन्न जन्तुओं के मांस खाने की इच्छा करे तो जैसा उस जन्तु का शरीर, आचरण और स्वभाव होगा उसी के समान शरीर, आचरण और स्वभाव रखनेवाली सन्तान पैदा करेगी। पाँचवें महीने में मन और छठें महीने में बुद्धि उत्पन्न होती हैं। जितने अङ्ग तथा उपाङ्ग हैं वे सब सातवें महीने में भली-भाँति व्यक्त हो जाते हैं और आठवें महीने में ओज उत्पन्न होता है। ओज माता तथा पुत्र (यहाँ पर 'पुत्र' शब्द उपलक्षणपरक है अतः सन्तान मात्र का बोधक समझना) दोनों में क्रम से बारंबार सञ्चार करता रहता है, अतः वे दोनों म्लान तथा हर्षित होते रहते हैं अर्थात् जिस समय ओज माता में सञ्चार करता है उस समय माता हर्षित और गर्भस्थ बालक म्लान हो जाता है; तथा जिस समय ओज बालक में सञ्चार करता है उस समय बालक हर्षित
१. 'तच्छायमि'ति पा.।
९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे और माता म्लान हो जाती है, और आठवें महीने में उत्पन्न हुआ बालक प्रायः जीवित नहीं रहता है क्योंकि उस महीने में ओज स्थिर नहीं रहता है। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि जिस समय ओज माता में चला गया होता है उस समय यदि बालक का जन्म होता है तो वह नहीं जीवित रहता है और यदि बालक ही में रहता है तो जन्म लेने पर जीवित रह सकता है ॥३०२-३०६॥ न जीवत्यष्टमे जातस्तत्रौजो न स्थिरं यतः। तथा नैर्ऋत्यभागत्वाद्दापयेत्तद्बलिं ततः ॥३०७॥ अष्टम मास में उत्पन्न हुई सन्तान के जीवित न रहने में एक यह भी कारण है कि नैर्ऋत्य नामक रुद्र के अनुचर का उस समय बालक के शरीर में अंश रहता है, अत एव वह अपनी पूजा प्राप्त करने की इच्छा से उस समय बालक को कष्ट देता है और पूजा न पाने पर मार डालता है, अतः उसकी शान्ति के लिये नैर्ऋत्य के उद्देश्य से बलि दिलानी चाहिये ॥३०७॥ नैर्ऋत्याय भागश्च बालेषु रुद्रेण दत्तः, यत उक्तं कुमारतन्त्रे='अष्टमे मासि नैर्ऋत्याय मांसोदनं बलिं दापयेदि'ति ॥३०७॥ रुद्रने बालकों के शरीर में नैर्ऋत्य का भाग निर्दिष्ट कर दिया है। क्योंकि 'कुमारतन्त्र' में कहा भी है कि—'आठवें महीने में नैर्ऋत्य के लिये मांस और भात की बलि दिलावे' ॥३०७॥ नवमे दशमे मासि नारी बालं प्रसूयते। एकादशे द्वादशे वा ततोऽन्यत्र विकारतः ॥३०८॥ गर्भिणी स्त्री नवें या दशवें महीने में सन्तान पैदा किया करती हैं और कभी-कभी ग्यारहवें और बारहवें महीने में भी प्रसव करती हैं, इससे अधिक समय यदि हो जावे और प्रसव न हो तो यह समझना चाहिये कि कोई विकार गर्भ को हो गया है जिससे प्रसव नहीं हो रहा है ॥३०८॥ गर्भे यदङ्गं प्रथमं भवति, तदाह- शिरो भवति चाङ्गस्य पूर्वमित्याह शौनकः। शिरस्येवोपजायन्ते प्रधानानीन्द्रियाणि यत् ॥३०९॥ हृदयं जायते पूर्वं कृतवीर्योऽवदन्मुनिः। बुद्धेश्च मनसश्चापि यतस्तत्स्थानमीरितम् ॥३१०॥ पाराशर्य इति प्राह पूर्व नाभिसमुद्भवः। प्राणो यत्र स्थितो देहं बर्द्धयत्यूष्मसंयुतः ॥३११॥ पाणिपादं भवेत्पूर्वं मार्कण्डेयमुनेर्मतम्। देहिनः सकलाश्चेष्टाः पाणिपादाश्रया यतः ॥३१२॥ प्रथमं जायते कोष्ठं ततः सर्वाङ्गसम्भवः। एतत्तु कथयामास गौतमो मुनिपुंगवः ॥३१३॥ सर्वाण्यङ्गान्युपाङ्गानि युगपत्सम्भवन्ति हि। सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥३१४॥ गर्भ में अङ्गोत्पत्ति—शौनक मुनि यह कहते हैं कि-सब अङ्गों से पहले शिर उत्पन्न होता है क्योंकि जितनी प्रधान- प्रधान इन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, रसना नाम की ज्ञानेन्द्रियाँ) हैं वे सब शिर में ही उत्पन्न होती हैं और 'कृतवीर्य मुनि' कहते हैं कि-'प्रथम हृदय उत्पन्न होता है क्योंकि उसी को बुद्धि और मन के रहने का स्थान कहा है' और 'पाराशर्य' मुनि यह कहते हैं कि-'पहले नाभि की उत्पत्ति होती है, क्योंकि उसी नाभि में स्थित हो कर ऊष्मा से युक्त होता हुआ प्राण शरीर को बढ़ाता है' यहाँ 'मार्कण्डेय' मुनि का मत यह है कि—'हाथ और पैर पहले उत्पन्न होता है क्योंकि-प्राणियों की जितनी चेष्टायें होती हैं, वे सब हाथ-पैर के सहारे से ही होती हैं' और मुनियों में श्रेष्ठ 'गौतम' मुनि ने तो इस विषय में यह कहा है कि—'पहले कोष्ठ (गर्दन से नीचे कमर तक के भाग) उत्पन्न होता है क्योंकि उसी कोष्ठ से सम्पूर्ण अङ्गों की उत्पत्ति होती है' किन्तु 'धन्वन्तरि' का मत यह है कि—'जितने अङ्ग तथा उपाङ्ग हैं वे सब साथ ही साथ उत्पन्न होते हैं किन्तु उस समय सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं पड़ते हैं' ॥३०९-३१४॥ आम्रस्याणुफले भवन्ति युगपन्मांसास्थिमज्जादयो लक्ष्यन्ते न पृथक्पृथक्तनुतया पुष्टास्त एव स्फुटाः। एवं गर्भसमुद्भवे त्ववयवाः सर्वे भवन्त्येकदा लक्ष्याः सूक्ष्मतया न ते प्रकटतामायान्ति वृद्धिं गताः ॥३१५॥
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९१ जैसे आम के अत्यन्त छोटे फल में मांस (गूदा), अस्थि (कुसुली) और मज्जा (मींगी) आदि साथ ही साथ रहते हैं और अत्यन्त सूक्ष्म होने से अलग २ दिखलाई नहीं पड़ते और पुष्ट होने पर वे ही दिखलाई पड़ने लगते हैं, उसी भाँति गर्भ रहने पर जितने अवयव हैं वे सभी एक साथ ही उसमें रहते हैं किन्तु सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं पड़ते और जब वे ही बढ़ जाते हैं तब साफ-साफ प्रकट हो जाते हैं ॥३१५॥ ❖ मज्जादय इत्यादिशब्देन त्वक्केशरमज्जत्वमङ्कुरवृन्तानि गृह्यन्ते ।।३१५।। 'मज्जादय' इस पद में आदि शब्द से छिल्का, केशर, मींगी के ऊपर का अत्यन्त पतला छिल्का, अङ्कुर, वृन्त (ढेपी) इन सबों का ग्रहण होता है ॥३१५॥ अथ शरीर पितृज-मातृज-रसजात्मजा भागा उच्यन्ते । तत्र- केशाः श्मश्रु च लोमानि नखा दन्ताः शिरास्तथा। धमन्यः स्नाववः शुक्रमेतानि पितृजानि हि ।।३१६।। मांसासृङ्मज्जमेदांसि यकृत्प्लीहान्त्रनाभयः । हृदयं च गुदं चापि भवन्त्येतानि मातृतः ।।३१७।। शरीरोपचयो वर्णो बलं देहस्थितितस्तथा। रसादेतानि जायन्ते भिषजो मुनयो जगुः ।।३१८।। पितृज-मातृज शरीराकृति—बाल, दाढ़ी, मूंछ, रोम, नख, दाँत, शिरा, धमनी, स्नायु और शुक्र ये सब पितृज (पिता से उत्पन्न हुये) कहलाते हैं। मांस, रक्त, मज्जा, मेदा, यकृत, प्लीहा, अँतड़ी, नाभि, हृदय और गुदा ये सब माता से उत्पन्न होते हैं अत एव मातृज कहलाते हैं । शरीर की वृद्धि, गौरादि वर्ण, बल और देह का स्थित रहना, ये सब रस से उत्पन्न होते हैं अत एव रसज कहलाते हैं ऐसा वैद्यक के जानकार मुनियों ने कहा है ॥३१६-३१८॥ ज्ञानं विज्ञानमायुश्च सुखदुःखादिकं तथा। इन्द्रियाणि च सर्वाणि भवन्त्येतानि चात्मनः ।।३१९।। ज्ञान, विज्ञान, आयु और सुख-दुःखादि तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ ये सब आत्मा से उत्पन्न होते हैं अत एव आत्मज कहलाते हैं ॥३१९॥ ❖ ('१सुख) दुःखादिकमित्यादिशब्देन नानायोनिजन्मादिकमुच्यते । आत्मनः = आत्मसन्निकर्षाद् न त्वात्मनो जायन्ते, आत्मनो निर्विकारात् प्रकृतिभावानुपपत्तेः ।।३१९।। 'सुखदुःखादिकम्' इस पद में स्थित आदि शब्द से अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेना आदि का भी ग्रहण करना चाहिये और 'आत्मा से उत्पन्न होते हैं' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि आत्मा के सम्बन्ध से उत्पन्न होते हैं न कि साक्षात् आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि-आत्मा निर्विकार है अत एव वह प्रकृति के भावों को नहीं प्राप्त कर सकता अर्थात् प्रकृति के जैसे १६ विकार होते हैं वैसे इसके कोई भी विकार नहीं होते ॥३१९॥ गर्भस्य किंकिं विशिष्टोपकारकं तदाह- अग्नीषोमौ मही वायुर्नभः सत्त्वं रजस्तमः । पञ्चेन्द्रियाणि भूतात्मा गर्भं सञ्जीवयन्ति हि ।।३२०।। ❖ गर्भ के विशेष उपकारक—अग्नि, सोम, पृथ्वी, वायु, आकाश, सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण, पाँच इन्द्रियाँ और भूतात्मा ये सब गर्भ का संजीवन करते हैं अर्थात् इन्हीं सबों से गर्भ उत्पन्न और रक्षित तथा वर्धित होता है ॥३२०॥ ❖ अग्निरत्र-पाचकालोचक रञ्जक भ्राजकसाधकानाम्; तथा पाञ्चभौतिकानां तथा सप्तधातुगतानामग्नीनां शक्तिरूपतयाऽवस्थितो वाचोऽधिदेवत्वं प्राप्तो बोद्धव्यः, सच पाचकादिकर्मणा जीवयति । सोमश्च- पञ्चात्मकश्लेष्मरसशुक्रादीनां २तोयात्मकानां भावानां रसनेन्द्रियस्य३ च शक्तिरूपतयाऽवस्थितो मनसश्चाधिदेवत्वं १. कोष्ठस्थः पाठ क्वाचित्कः । २. सोमे'ति पा.। ३. 'रसे'ति पा. ।