भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवापृष्ठवंशयोस्तु प्रतराः । शिरःकटीकपालेषु १तूणसेवन्यः । हन्वोरुभयतः काकतुण्डाख्याः । कण्ठहृदयव्लोमनाडीषु मण्डलाख्याः । २श्रोत्रशृङ्गाटकेषु शङ्खावर्त्ताः ।।२४२।। (१) कोर सन्धि को कोई 'गड्ढे' और कोई 'नली' के सदृश बतलाते हैं। (२) उदूखल सन्धि ओखली (धानकूटने का काष्ठपात्र विशेष) के सदृश होती है। (३) सामुद्ग सन्धि यहाँ समुद्र पद से 'सम्पुट' समझना चाहिये। समुद्र ही 'सामुद्ग' कहलाता है, यहाँ पर स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने पर आदि पदकी वृद्धि होने से 'सामुद्ग' पद की सिद्धि होती है, यह 'सामुद्ग' सन्धि सम्पुट के आकार की होती है। (४) प्रतर सन्धि—जिससे जल में तैरा जा सके उसे प्रतर अर्थात् बेलन कहते हैं, 'प्रतर' सन्धि बेलन के आकार की होती है। (५) तूणसेवनी सन्धि-तूण अर्थात् बाण रखने के तरकश की भाँति सेवनी (सिली हुई) के समान होने से तूणसेवनी सन्धि कहते हैं। (६) काकतुण्ड सन्धि—कौवे के मुख के समान होने से इसे काकतुण्ड सन्धि कहते हैं। (७) मण्डल सन्धि-लोक प्रसिद्ध मण्डल की भाँति आकार होने से इसे मण्डलसन्धि कहते हैं। (८) शङ्खावर्त्त सन्धि-शङ्ख के आवर्त्त (नाभिचक्र) की भाँति आवर्त्त होने से इसे शङ्खावर्त्त सन्धि कहते हैं। इन पूर्वोक्त सन्धियों के नाम आकृति के अनुसार रखे गये हैं। इन सन्धियों के मध्य में कोर नामक सन्धि अङ्गुलि, मणिबन्ध (कलाई), गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना), कूर्पर (केहुनी), इन स्थानों में होती है। काँख, वङ्क्षण (ऊरुसन्धि) और दाँतों में उदूखलनामक सन्धि होती है। कन्धा, पीठ, गुदा, भग और नितम्ब में सामुद्गनामक सन्धि होती है। गर्दन और मेरुदण्ड में प्रतर नामक सन्धि होती है। शिर, कमर और कपाल में तूणसेवनी नामक सन्धि होती है। दोनों हनुओं के दोनों तरफ काकतुण्ड नामक सन्धि होती है। कण्ठ, हृदय, क्लोम और नाड़ी में मण्डलनामक सन्धि होती है। कान और शृङ्गाटक में शङ्खावर्त्त नामक सन्धि होती है ॥२४२॥ अस्थ्नां तु सन्धयो ह्येते केवलाः समुदाहृताः । पेशीस्नायु शिराणान्तु सन्धिसंख्या न विद्यते ।। २४३ ।। ऊपर जिन सन्धियों का उल्लेख किया गया है, वे केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु तथा शिराओं के सन्धियों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है क्योंकि वे असङ्ख्य हैं ॥२४३॥ अथ शिरामाह- सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुहाः शिराः। नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। २४४ ।। शिराओं का वर्णन—सन्धियों को बाँधने वाली तथा दोष (वात, पित्त, कफ) और धातु (रस, रक्तादि) को वहन करने वाली शरीर में जितनी शिरायें हैं वे सभी नाभि में बँधी हुई हैं और वहाँ ही से निकल कर चारों तरफ शाखा प्रशाखा द्वारा शरीर में फैली हुई हैं ॥२४४॥ शरीरं सकलञ्चैतच्छिराभिः पोष्यते सदा। प्रणालीभिरिवारामाः कुल्याभिः क्षेत्रधान्यवत् ।। २४५ ।। जैसे जल की नाली द्वारा बगीचा आदि का तथा कुल्या (नहर) द्वारा खेत में धानों का पोषण हुआ करता है, उसी भाँति शिराओं द्वारा समस्त शरीर का भी पोषण हुआ करता है ॥२४५॥ ❖ अत्र प्रणालीभिः कुल्याभिरिति दृष्टान्तद्वयं स्थूलसूक्ष्मशिराभेदात् ।। २४५ ।। यहाँ प्रणाली और कुल्या जो दो दृष्टान्त दिये गये हैं वे स्थूल और सूक्ष्म इन दो प्रकार की शिराओं के भेद से हैं ॥२४५॥ प्रसारणाकुञ्चनादिक्रियाभिः सततं तनौ। शिरा एवोपकुर्वन्ति ताः स्युः सप्तशतानि तु ।। २४६ ।। १. 'तूनसेविन्य' इति पा. । २. 'शिर' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA