भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७५ ❖ एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां१ त्रयस्त्रयो द्वावङ्गुष्ठे ते चतुर्दश । गुल्फजानुवङ्क्षणेष्वेकैकमेवं सप्तदश एकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । एवमष्टषष्टिःशाखासु । दोनों पैरों की चार-चार अङ्गुलियों में तीन-तीन और अंगूठे में दो-दो इस प्रकार एक पैर की पाँचों अङ्गुलियों में चौदह सन्धियाँ हैं और गुल्फ (एड़ी), जानु (घुटना) और वङ्क्षण (ऊरु सन्धि) में एक-एक सन्धियाँ हैं, इस प्रकार एक पैर में सब मिल कर सत्रह सन्धियाँ हैं। इसी तरह दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं की भी सन्धियाँ कही हुई हैं। इस प्रकार अड़सठ सन्धियाँ चार शाखाओं में होती हैं। अथ कोष्ठगतानाह- ❖ त्रयः २कटीकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवंशे, तावन्त एव पार्श्वयोरष्टावुरसि, एवमेकोन षष्टिः कोष्ठे । कोष्ठगत सन्धियाँ—कमर और कपाला