भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 1167 में से

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दो मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म आधे अङ्गुल परिमित हैं, इन मर्मों में जब शल्य (बाणादि) बिंध जाते हैं, तब जितने काल तक शल्य उनमें बिंधे (पड़े) रहते हैं उतने काल तक मनुष्य जीवित रहता है, और यदि बिंधे हुये स्थान के पक जाने पर उसमें से शल्य आप ही आप बाहर निकल आवे तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है, किन्तु यदि बिंधे हुये शल्य को स्वयं निकाला जाय तो मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। ये विशल्यघ्न (बिंधे हुये शल्य के निकालने पर) प्राणियों के मारनेवाले हैं।

❖ स्थपनी-एका भ्रुवोर्मध्ये शिरामर्मेदमर्द्धाङ्गुलं विशल्यघ्नम् ।। २३५ ।। स्थपनी मर्म—दोनों भौहों के मध्यस्थल में एक स्थपनी नामक मर्म है। यह आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विशल्यघ्न है ॥२३५॥

सप्तरात्रान्तरे हन्युः सद्यः प्राणहराणि हि । कालान्तरप्राणहरं पक्षे मासे च मारकम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब सात रात्रि के अन्दर प्राण ले लेते हैं और कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले जितने मर्म हैं वे सब पक्ष में या एक मास के अन्दर प्राण हरण करते हैं ॥२३६॥

सद्यः प्राणहरस्यान्ते विद्धं कालेन मारयेत् । कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्धन्तु दुःखदम् ।। २३६ ।। सद्यः प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त जितने मर्मस्थल हैं उनके समीप में शस्त्रादि से यदि चोट लग जाय तो कालान्तर में प्राणनाश होता है। और यदि कालान्तर में प्राणहरण करनेवाले पूर्वोक्त मर्मस्थलों के समीप में चोट लग जाय तो केवल दुःख देनेवाला (रुजा करनेवाला) ही होता है ।। २३६ ।।

अन्ते=मर्मसमीपे ।। २३७ ।। 'अन्ते' इस पदका 'समीप में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२३७॥

मर्माप्यधिष्ठाय हि ये विकारा मूर्च्छन्ति काये विविधा नराणाम् । प्रायेण ते कृच्छ्रतमा भवन्ति वैद्येन यत्नेरपि साध्यमानाः ।। २३८ ।। मनुष्यों के शरीर में मर्मस्थलों का आश्रय लेकर चाहे जिस प्रकार के रोग उत्पन्न हों तथा वैद्य लोग यत्नपूर्वक चाहे जितनी चिकित्सा करें तो भी प्रायः करके देखा जाता है कि वे कष्टसाध्य ही होते हैं ॥२३८॥

अथ सन्धयः ते द्विविधाश्चेष्टावन्तः स्थिराश्च - शाखासु हन्वोः कट्याञ्च चेष्टावन्तो भवन्ति हि । शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः ।। २३९ ।। सन्धियों के लक्षण—सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं—चेष्टावाली और स्थिर। उनमें से दोनों हाथों, दोनों पैरो, दोनों हनुओं (कपोलों के नीचे की हड्डियों) और कटि (कमर) में जो सन्धियाँ हैं, वे चेष्टावाली हैं और शेष सब सन्धियाँ स्थिर (चेष्टाशून्य) हैं ॥२३९॥

अथ सन्धिसंख्या आह- कथिता देहिनां देहे सन्धयो द्वे शते दश । शाखासु तेऽष्टषष्ठिश्च कोष्ठे त्वेकोनषष्टिका ।। २४० ।। ग्रीवाया ऊर्ध्वदेशे तुल्यशीतिस्ते प्रकीर्तिताः । प्रथमं परिगण्यन्ते तेषु शाखागता इह ।। २४१ ।। सन्धियों की संख्या—देहधारी मनुष्यों के शरीर में २१० सन्धियाँ हैं। उनमें से ६८ सन्धियाँ चारो शाखाओं में, ५९ कोष्ठ (ग्रीवा से नीचे पैर के ऊपर) में और ८३ ग्रीवा से लेकर उसके ऊपर भाग में कही हुई हैं। उन पूर्वोक्त सन्धियों में से जितनी चारों शाखाओं में हैं, इस समय उन्हीं का सर्व प्रथम परिगणन किया जा रहा है ॥२४०-२४१ ।।

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