भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७७ यथा द्रुमदले साक्षाद् दृश्यन्ते प्रतताः शिराः । तथैव देहिनो देहे वर्त्तन्ते सकले शिराः ।। २४७ ।। नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणात्राभिरुपाश्रिता । शिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ।। २४८ ।। अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना आदि क्रियाओं द्वारा जो शिरायें शरीर का उपकार करती हैं, वे संख्या में ७०० हैं । जिस प्रकार वृक्षों के पत्तों में फैली हुई शिरायें (नसें) प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ती हैं, उसी प्रकार देहधारी मनुष्यादि के सम्पूर्ण शरीर में भी फैली हुई शिरायें (नसें) रहती हैं । प्राणियों प्राणवाहक शिरासमूह नाभि में स्थित रहता है, और नाभि भी प्राणबाहक शिरासमूहों के आश्रित रहती है । जैसे चक्र की नाभि (पहिये की मध्यका गोलाकार काष्ठ) अरक (काष्ठ के लम्बे-लम्बे टुकड़ों) के द्वारा घिरी हुई रहती हैं, वैसे ही शिराओं से नाभि आवृत (लिपटी) हुई रहती हैं ।।२४६-२४८।। ❖ ता १यथा-तासां खलु मूलशिराश्चत्वारिंशत् । तासां दश वातवहाः, दश पित्तवहाः, दश श्लेष्मवहाः, दश रक्तवहाः, तासां खलु वातवहानां वातस्थानगतानां सपञ्चसप्तति शतं भवति२ । तावत्य३ एव पित्तवहाः पित्तस्थानगताः श्लेष्मवहास्ताः श्लेष्मस्थानगताः, रक्तवहा यकृत्प्लीहगताः । एवं शिराः सप्त शतानि भवन्ति । तत्र वातवहा एकस्मिन् सक्थिनि पञ्चविंशतिः, एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ । विशेषतः कोष्ठे चतुस्त्रिंशत्, तासां श्रोण्यां गुदमेढ्रादिसंश्रिता४ अष्टौ । द्वे द्वे पार्श्वयोः । षट् ६ पृष्ठे । तावत्य एवोदरे ६ । दश वक्षसि १० । एकश्चत्वारिंशद् ४१ जत्रुणि ऊर्ध्वम् । तासां चतुर्दश १४ ग्रीवायाम् । ४ चतस्रः कर्णयोः । ९ नव जिह्वायाम् । ६ षट् नासिकायाम् । ८ अष्टौ नेत्रयोः । एवं वातवहानां सपञ्चसप्तति शतं भवति५ । एवं विभागः पित्तवहानामपि विशेषस्तु पित्तावहा नेत्रयोर्दश १० । कर्णयोर्द्वे दो । एवं रक्तवहाः । श्लेष्मवहास्तु षोडश १६ ग्रीवायाम् कर्णयोर्द्वे २ । एवं शिराणां सप्तशतानि व्याख्यातानि ।। २४६-२४८ ।। शिराओं के भेद—पूर्वोक्त ७०० शिराओं में से मुख्य शिरायें ४० हैं, उनमें १० वायु को १० पित्त को, १० कफ को और १० रक्त को वहन करने वाली हैं । उनमें से पूर्वोक्त वायु के स्थान में स्थित वायु को वहन करनेवाली जो मूल १० शिरायें हैं, वे ही शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ हो जाती हैं । इसी प्रकार पित्त के स्थान में स्थित पित्त को वहन करनेवाली, कफ के स्थान में स्थित कफ को वहन करनेवाली और यकृत् तथा प्लीहा जो रक्त के स्थान हैं उनमें स्थित रक्त को बहन करनेवाली जो मुख्य दस-दस शिरायें हैं उनमें से प्रत्येक शाखा प्रशाखा द्वारा वायु की भाँति १७५ हो जाती हैं । उनमें से वायु को वहन करनेवाली शिरायें एक पैर में २५ और दूसरे पैर में भी २५ हैं तथा दोनों बाहुओं में भी २५- २५ मिल कर ५० हैं, ऐसा समझना चाहिये । विशेषतः कोष्ठस्थान में वायु को वहन करने वाली ३४ शिरायें इस तरह से हैं—श्रोणि (कटि) गुदा और लिङ्ग आदि के आश्रित ८ दोनों पंसुलियों में दो-दो इस प्रकार चार, पीठ में छः, उदर में भी छः और वक्षःस्थल में दस । जत्रु (ग्रीवा) के मूल भाग के ऊपर ४१ वात को वहन करनेवाली शिरायें इस तरह से हैं—ग्रीवा में १४, दोनों कानों में दो-दो करके चार, जिह्वा में नौ, नासिका में छः, दोनों नेत्रों में चार-चार करके आठ । इस प्रकार वात को वहन करनेवाली मुख्य १० शिरायें शाखा प्रशाखा द्वारा १७५ होती हैं । इसी प्रकार पित्त को वहन करनेवाली १६५ शिराओं का भी विभाग होता है, किन्तु विशेष यह है कि पित्त को वहन करनेवाली शिरायें नेत्रों में १० और कानों में दो होती है । इस प्रकार अर्थात् ठीक पित्तवहा शिराओं की भाँति ही १७५ रक्तवहा शिराओं का भी विभाग समझना चाहिये । कफ वहन करनेवाली १७५ शिराओं का भी विभाग इसी भाँति होता है, किन्तु भेद इतना ही है कि


१. 'तद्यथे'ति पा. । २. 'भवन्ती'ति पा. । ३. अत्र सर्वत्र 'तावन्त्य' इति पा. 'तावत्य' इत्यत्र पदे बोध्यम् । ४. 'श्रिते'ति पा. । ५. 'अज्ञानं ने'ति पा. । ६. 'चरन्त्रि'ति पाठः प्रामादिकः ।