भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 1167 में से

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७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीवा में १६ और कानों में दो ही कफ वहन करनेवाली शिरायें होती हैं। इस प्रकार ७०० शिरायें मुनियों ने कही हैं ॥२४६-२४८॥ क्रियाणामप्रतीघातममोहं बुद्धिकर्मणाम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाःशिराः पवनश्चरन् ।।२४९।। वायु अपनी शिराओं में विचरण करता हुआ क्रियाओं का अप्रतिघात करता है, अर्थात् शरीर की प्रसारणादि क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आने देता और बुद्धिकर्मों का अमोह करता है अर्थात् बुद्धीन्द्रियों को मोह नहीं होने देता तथा अन्य गुणों को भी करता है ॥२४९॥ ❖ क्रियाणां = प्रसारणाकुञ्चनादीनाम् । अमोहं बुद्धिकर्मणाम् = बुद्धीन्द्रियाणां मनसो बुद्धेश्च स्वे स्वे विषये ज्ञानं करोतीत्यर्थः । अन्यान् गुणान् = रसादिव्यापनद्वारा शरीरपोषणादीन् ।।२४९।। ‘क्रियाओं का अप्रतीघात करता है' इसका अर्थ यह है कि फैलाना, सिकोड़ना आदि जितनी शरीर की क्रियायें हैं उन सबों का ठीक-ठीक सम्पादन करता है तथा 'बुद्धिकर्मों का अमोह करता है' अर्थात् बुद्धीन्द्रिय जो आँख, नाक, कान आदि हैं उनको तथा मन और बुद्धि को, अपने-अपने विषयों में ज्ञान प्रदान करता है। 'अन्य गुणों को करता है' अर्थात् रसादिकों को सर्वत्र व्याप्त करने के द्वारा शरीर का पोषण करता है, ऐसा समझना चाहिये ॥२४९॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः शिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसम्भवाः ।।२५०।। जिस समय वायु कुपित होकर अपनी सिराओं में विचरण करता है उस समय प्राणियों के शरीर में वायु से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५०॥ भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि पित्तमात्मशिराश्चरद् १ ।।२५१।। पित्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में भ्राजिष्णुता (शरीर में कान्ति होना), अन्न में रुचि, जठराग्नि की दीप्ति, अरोगता (रोग का न होना) तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५१॥ ❖ अरोगतां = पैत्तिकरोगानुत्पत्तिं करोति । अन्यान् गुणान् = मेधाबुद्धिदर्शनशक्त्यादीन् ।।२५१।। ‘अरोगतां' से 'पित्तसम्बन्धी रोग का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य भी गुणों को' इससे 'मेधा (धारणशक्ति), बुद्धि और देखने की शक्ति को' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२५१॥ यदा तु कुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः शिराः । यदाऽस्यविविधारोगाजायन्ते पित्त सम्भवाः ।।२५२।। किन्तु वही पित्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के शरीर में पित्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५२॥ स्नेहमङ्गेषु सन्धीनां स्थैर्यं बलमरोगताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि बलासःस्वाःशिराश्चरन् ।।२५३।। कफ जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब अङ्गों में स्निग्धता अर्थात् अङ्गों का रूक्ष न होना, सन्धियों की स्थिरता, बल, अरोगता आदि अन्य गुणों को भी करता है ॥२५३॥ ❖ अरोगतां = श्लैष्मिकरोगानुत्पत्तिम् । अन्यान् गुणान् = बलपुष्ट्यादीन् ।।२५३।। 'आरोगतां' पद से 'कफ सम्बन्धी रोगों का उत्पन्न न होना' तथा 'अन्य गुणों को' इससे 'बल तथा पुष्टि आदि को' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२५३॥ यदा तु कुपितःश्लेष्मा स्वाःशिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसम्भवाः ।।२५४।। १. 'चरन्नि'ति पाठः प्रामादिकः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

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