भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७९ किन्तु वही कफ जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के कफ से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५४॥ धातूनां पूरणं१ वर्णं स्पर्शज्ञानमसंशयम् । स्वशिरासु चरद्रक्तं कुर्याच्चान्यान् गुणानपि ॥२५५॥ रक्त जब अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के सम्पूर्ण धातुओं का पूरण करता है अर्थात् सब धातुओं की मात्रा पूर्ण रूप से बनाये रहता है और वर्ण अर्थात् शरीर के गौरादि वर्ण, जैसा चाहिये वैसा निश्चितरूप से स्पर्श का ज्ञान तथा अन्य भी गुणों को करता है ॥२५५॥ ❖ अन्यान् गुणान्=बलपुष्ट्यादीन् ॥२५५॥ ‘अन्यान् गुणान्’ अर्थात् ‘बल तथा पुष्टि आदि गुणों को ऐसा समझना चाहिये ॥२५५॥ यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः शिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसम्भवाः ॥२५६॥ किन्तु वही रक्त जब कुपित होकर अपनी शिराओं में विचरण करता है तब प्राणियों के रक्त से उत्पन्न होनेवाले अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ॥२५६॥ तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना शिराः । पित्तादुष्णाश्च२ नीलाश्च शीता गौर्यः स्थिराः कफात् । असृग्धरास्तु ता रक्ताः स्युश्च नात्युष्णशीतलाः ॥२५७॥ पूर्वोक्त शिराओं में से वायु को वहन करनेवाली शिरायें जब वायु से भरी रहती हैं तब देखने में अरुण वर्ण की मालूम पड़ती हैं । इसी भाँति पित्तवहन करनेवाली शिरायें पित्त से नील वर्ण की तथा गरम और कफ वहन करनेवाली शिरायें कफ से शीतल; स्थिर तथा गौर वर्ण की मालूम पड़ती हैं और जो रक्त वहन करनेवाली शिरायें हैं वे रक्त से न अत्यन्त गरम और न अत्यन्त शीतल तथा रक्त वर्ण की मालूम पड़ती हैं ॥२५७॥ अथ स्नायुः- तत्र स्नायोः स्वरूपमाह- मेदसः स्नेहमादाय शिरा स्नायुत्वमाप्नुयात् । शिराणां हि मृदुः पाकः स्नायूनान्तु ततः खरः ॥२५८॥ स्नायवो बन्धनानि स्युर्देहमांसास्थिमेदसाम् । सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ॥२५९॥ स्नायु के स्वरूप—जो शिरायें मेद के स्नेह भाग को ग्रहण कर लेती हैं वे ही पक कर स्नायु के रूप को प्राप्त कर लेती हैं, क्योंकि शिरा तथा स्नायु में इतना ही अन्तर है कि शिराओं का पाक मृदु होता है तथा स्नायुओं का पाक उसकी अपेक्षा खर होता है । सम्पूर्ण स्नायु देह में मांस, अस्थि, मेद और सन्धियों के बन्धन हैं अर्थात् इन्हीं से वे सब बँधे हुए हैं अत एव शिराओं की अपेक्षा ये सुदृढ़ कहे गये हैं ॥२५८-२५९॥ नौर्यथा फलकास्तीर्णा बन्धनैर्बहुभिर्युता । नियुक्ताऽगाधसलिले भवेद्भारसहा भृशम् ॥२६०॥ जिस प्रकार फलकों (पटरों) से आस्तीर्ण तथा बहुत से रस्सी आदि से बँधी हुई नौका अगाध जल (समुद्रादिकों) में डाल देने पर अत्यन्त भार सँभालने में समर्थ होती है ॥२६०॥ ❖ फलकैः=काष्ठपट्टैः । आस्तीर्णा=व्याप्ता ।।२६०।। ‘फलकैः’ अर्थात् काठ की पटरियों से, ‘आस्तीर्णाः’ अर्थात् व्याप्त ॥२६०॥ एवमेव शरीरेस्मिन्यावन्तः सन्थयः स्मृताः । स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२६१॥ १. ‘सम्यगि’ति पा. । २. ‘पित्तदुष्टाश्चे’ति पा. ।