भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उसी प्रकार इस शरीर में जितनी सन्धियाँ हैं वे सब बहुत से स्नायुओं द्वारा बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्यादि भार वहन करने में समर्थ होते हैं ॥२६१॥ अथ स्नायुसंख्या आह- शतानि नव जायन्ते शरीरे स्नायवो नृणाम्। तासां विवरणं ब्रूमः शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ॥२६२॥ शाखासु षट्शतानि स्युः कोष्ठे त्रिंशच्छतद्वयम्। ग्रीवाया १ऊर्ध्वदेशे तु स्नायूनां सप्ततिः स्मृता ॥२६३॥ स्नायुओं की संख्या—मनुष्यों के शरीर में जो ९०० स्नायु हैं, उन सबों का विवरण हम कह रहे हैं, हे शिष्यों ! तुम लोग यत्नपूर्वक सुनो। चारो शाखाओं में अर्थात् दोनों हाथों और दोनों पैरों में ६००, कोष्ठ में २३०, ग्रीवा से ऊपर भाग में ७० स्नायुयें हैं ॥२६२-२६३॥ तत्र शाखागताः प्राह- एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां षट् षट् तास्त्रिंशत्। तावत्य एव तलकूर्चगुल्फेषु। तावत्य एव जङ्घायां, दश जानुनि। चत्वारिंशदूरौ। दश वङ्क्षणे। एवं सार्द्धशतमेकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहु च व्याख्यातौ। उनमें से शाखागत स्नायु—प्रत्येक पैर की अंगुलियों में ६-६६ मिलकर ३०, पैर के तलुये, कूर्च तथा गुल्फ में ३०, जङ्घा में ३०, जानु में १०, उरु में ४० और वङ्क्षण में १०, इस प्रकार से सब मिलकर १५० स्नायु एक पैर में होते हैं। इसी प्रकार दूसरे पैर तथा दोनों बाहुओं में भी स्नायु की संख्या कही हुई है। इस भाँति शाखाओं में ६०० स्नायु होते हैं। अथ कोष्ठगताः प्राह- ❖ षष्टिः कट्यां, तावत्य एव पार्श्वयोः, अशीतिः पृष्ठे, त्रिंशदुरसि। कोष्ठगत स्नायुओं की संख्या—कमर में ६०, दोनों पसुलियों में ६०, पीठ में ८० और वक्षः स्थल में ३०, इस प्रकार सब २३० स्नायु कोष्ठ में होते हैं। अथ ग्रीवोर्ध्वगताः प्राह- ❖ षट्त्रिंशद् ग्रीवायाम्। चतुस्त्रिंशन्मूर्ध्नि। एवं स्नायूनां नवशतानि भवन्ति ॥२६२-२६३॥ ग्रीवा से ऊपर भाग में स्थित स्नायुओं की संख्या—३६ ग्रीवा (गर्दन) में, और ३४ स्नायु मूर्धा में हैं। इस भाँति सब ७० स्नायु ग्रीवा से ऊपरी भाग में होते हैं। इस प्रकार सब मिल कर ९०० स्नायु होते हैं ॥२६२-२६३॥ अथ धमन्यः । धमन्यो नाभितो जाताश्चतुर्विंशतिसंख्यया। दशोर्ध्वग दशाधोगाः शेषास्तिर्यग्गताः स्मृताः ।। धमनियों की संख्या—जितनी धमनियां हैं वे सब नाभि से उत्पन्न हुई हैं तथा गिनती में २४ हैं जिनमें से १० धमनियां नाभि से निकल कर ऊपर को गई हैं और १० नीचे को तथा शेष चार धमनियां तिरछी गई हैं ॥२६४॥ ❖ तत्रोर्ध्वगाः-शब्दस्पर्शरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजृम्भितक्षुतहसितकथितरुदितगी१तादिविशेषा-नभिवहन्त्यः शरीरं धारयन्ति। १. ‘मूर्ध्वदेश’ इति पा. । १. ‘कम्पिते’ति पा. ।