भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८१ प्रश्वासः = अन्तःप्रविशन् १वायुः । उच्छ्वासः = ऊर्ध्वं गच्छन् वायुः । तास्तु हृदयं गतास्त्रिधा जायन्ते । तास्त्रिंशत् । तासां मध्ये द्वे द्वे वातपित्तकफशोणितरसान् वहतः । ता दश । अष्टाभिः शब्दरसरूपगन्धान् गृह्णाति पुरुषः । द्वाभ्यां भाषते । द्वाभ्यां घोषते । द्वाभ्यां स्वपिति । द्वाभ्यां जागर्ति । द्वे अश्रुवाहिन्यौ । द्वे स्तन्यं स्त्रियावहतः, [स्तनसंश्रिते२] त एव शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यामभिवहतः । एतास्त्रिंशत् (सविभागा३ व्याख्याताः) एताभि (रूर्ध्व नाभे४) रुदरपार्श्वपृष्ठोरस्कन्धग्रीवा५ बाहवो धार्यन्ते चाल्यन्ते च । उसमें से जो धमनियां ऊपर गई हुई हैं वे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रश्वास, उच्छ्वास, जम्भाई, छींक, हँसी, बोलना, रोना और गीत आदि विशेष कर्मों को वहन करती हुई अर्थात् कार्यों का सम्पादन करती हुई शरीर को धारण करती हैं (यहाँ पर 'प्रश्वास' पद से 'उदर' में प्रवेश करता हुआ वायु और 'उच्छ्वास' पद से 'ऊपर अर्थात् उदर से बाहर निकलता हुआ वायु' यह अर्थ समझना चाहिये) । पूर्वोक्त ऊपर जाने वाली वे ही १० धमनियां नाभि से हृदय में पहुँच कर प्रत्येक तीन-तीन हो जाती हैं, इस प्रकार वे ३० होती हैं। उनमें से २-२ वायु, पित्त, कफ, रक्त और रस को वहन करती हैं, इस प्रकार वे १० हैं और ८ धमनियों से मनुष्य शब्द, रस, रूप और गन्ध को ग्रहण करता है अर्थात् दो से शब्द, दो से रस इत्यादि क्रम से ग्रहण करता है। तथा दो धमनियों से बात करता है, दो से शब्द करता है, दो से सोता है, दो से जागता है, दो धमनियां आँसू वहन करने वाली हैं और दो धमनियां स्त्रियों के स्तनों में रह कर दूध को वहन करती हैं और वे ही दोनों धमनियां पुरुषों के दोनों स्तनों में रह कर वहाँ ही से शुक्र को वहन करती हैं। इस प्रकार ये ३० धमनियां विभाग के साथ अर्थात् अलग २ कही गई । ऊपर को जाने वाली इन्हीं तीस धमनियों द्वारा नाभि से ऊपर के भाग में स्थित उदर, पंसुली, पीठ, वक्षःस्थल, कन्धा, ग्रीवा और बाहु धारण किया जाता है और हिलाया डुलाना जाता है। (६अधोगताः प्राह-) ❖ अधोगतास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रार्त्तवादीनधो वहन्ति । तास्तु पित्ताशयं गतस्त्रिधा जायन्ते । तास्त्रिंशत् । तासां मध्ये द्वे द्वे वातपित्तकफशोणितरसान् वहतः । ता दश । द्वे अन्नवहे७ अन्त्राश्रिते । द्वे तोयवहे । द्वे बस्तिगते मूत्रवहे । द्वे शुक्रस्य प्रादुर्भावाय । द्वे तद्विसर्गाय, त एव नारीणामार्त्तवप्रादुर्भावयतो विसृजतश्च८ । द्वे स्थूलान्त्रप्रतिबद्धे पुरीषं विसृजतः । अष्टावन्यास्तिर्यग्गता स्वेदमर्पयन्ति । एतास्त्रिंशत् । एताभिरधो नाभेः पक्वाशयकटीमूत्रपुरीष- बस्तिगुदमेढ्रसक्थीनि धार्यन्ते चाल्यन्ते च । नाभि से नीचे की ओर गई हुई धमनियां—नीचे की ओर गई हुई धमनियां अधो वायु, मूत्र, पुरीष, शुक्र और आर्त्तव (रज) आदि को नीचे की ओर ले जाती हैं। और वे ही पित्ताशय में जाकर प्रत्येक तीन-तीन हो जाती हैं। इस प्रकार वे सब १० से ३० धमनियां हो जाती हैं। उनमें से दो दो वात, पित्त, कफ, रक्त और रस का वहन करती हैं, वे १० हैं और बाकी २० धमनियों में से दो धमनियां अतड़ियों के आश्रय में रह कर अन्न को वहन करती हैं, दो धमनियां बस्ति (मूत्राशय) में स्थित होकर मूत्र वहन करती हैं। दो धमनियां शुक्र को उत्पन्न करने के लिये और दो शुक्र को त्याग करने के लिये होती हैं, और वे ही दो-दो धमनियां स्त्रियों के रज को उत्पन्न करतीं तथा निकालती हैं और दो धमनियां मोटी आँतड़ियों में बँधी हुई पुरीष का त्याग करती हैं, और बाकी ८ धमनियां तिरछी जाकर स्वेद (पसीना) उत्पन्न करती हैं, इस प्रकार ये ३० नाभि के अधोभाग की ओर गई हुई धमनियां होती हैं। ये ही सब धमनियां नाभिके नीचे भाग में स्थित पक्वाशय, कटि, मूत्र, पुरीष, गुदा, लिङ्ग और पैर को धारण करती और हिलाती डुलाती हैं। १. 'प्रविष्ट' इति पा. । २,३,४. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ५. 'ग्रीवाशिर' इति पा. । ६. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ७. 'अन्तर्वहे' इति पा. । ८. 'प्रादुर्भावाय ते अधिसृजतश्चे'ति पा. । ९ भाव.I