भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८९ जिन-जिन इन्द्रियों के विषय शब्द स्पर्शादि अभिलाषित होते हुये भी यदि गर्भिणी को नहीं प्राप्त होते हैं तो वह उन-उन इन्द्रियों ही के सम्बन्ध में पीड़ा युक्त सन्तान पैदा करती है अर्थात् जैसे गर्भिणी की इत्र सूँघने की इच्छा हुई और उसे इत्र नहीं प्राप्त हुआ तो उसके जो सन्तान पैदा होगी उसके घ्राणेन्द्रिय (नासिका) में अवश्य किसी न किसी रोग से पीड़ा पहुँचेगी ॥२९८॥ दौहृदविशेषफलमाह- राजसन्दर्शने यस्या दौहृदं जायते स्त्रियाः। अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ।।२९९।। दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहृदात्। अलङ्कारेषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ।।३००।। गर्भिणी की इच्छा विशेष—जिस गर्भिणी स्त्री की अभिलाषा राजा के दर्शन करने की हो वह धनवान् और भाग्यशाली सन्तान पैदा करती है। यदि उत्तम सूती अथवा रेशमी वस्त्र तथा भूषणादि धारण करने की अभिलाषा हो तो वह अलङ्कारों (आभूषणों) को चाहने वाली सुन्दर सन्तान पैदा करती है ॥२९९-३००॥ आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते। देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पार्षदोपमम् ।।३०१।। यदि (तपस्वियों के) आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो तो मन को वश में रखने वाली धर्मशील सन्तान पैदा करती है। यदि देवताओं की प्रतिमा (मूर्ति) देखने अथवा पूजनादि करने की अभिलाषा हो तो पार्षद के समान सन्तान उत्पन्न करती है ॥३०१॥ ❖ आश्रमे = तपस्विनामाश्रमे दौहृदात्, पार्षदोपमं=प्रमथोपमम् ।।३०१।। 'आश्रमे' का अर्थ प्रकरण वश 'तपस्वियों के आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो' ऐसा किया गया है और 'पार्षदोपमम्' इस पद से प्रमथ (भगवान् शङ्कर के पार्षद) के समान ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥३०१॥ दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते। रक्ताक्षं लोमशं शूरं महिषामिषदौहृदात् ।।३०२।। वाराहमांसे स्वप्नालुं शूरं सञ्जनयेत्सुतम्। मृगमांसे तु जङ्घालं१ विक्रान्तं वनचारिणम् ।।३०३।। अतोऽनुक्तेषु या नारी दौहृदं विदधाति हि। शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ।।३०४।। पञ्चमे मानसं षष्ठे बुद्धिश्चातिप्रबुद्ध्यते। सर्वाण्यङ्गान्यपाङ्गानि भृशं व्यक्तानि सप्तमे ।।३०५।। ओजोऽष्टमे सञ्चरति माता पुत्रौ मुहुः क्रमात्। तेन तौ म्लानमुदितौ स्यातां जातो न जीवति ।।३०६।। यदि हिंस्रजातिवाले व्याघ्रादि जीवों के देखने के विषय में अभिलाषा हो तो हिंसाशील सन्तान पैदा करती है। महिष (भैंसा) के मांस खाने की अभिलाषा होने से लाल नेत्रवाली, बहुत रोयें से युक्त शरीर वाली और शूर (पराक्रमी) सन्तान पैदा करती है। सूअर के मांस खाने की अभिलाषा होने से अधिक सोनेवाली और शूर सन्तान पैदा करती है। हरिण के मांस खाने की अभिलाषा होने से जङ्घाल अर्थात् दौड़ लगानेवाली अथवा जङ्घा में अधिक ताकत रखनेवाली विक्रम से युक्त वन में विचरण करनेवाली सन्तान पैदा करती है। जो गर्भिणी स्त्री इन पूर्वोक्त जन्तुओं से भिन्न जन्तुओं के मांस खाने की इच्छा करे तो जैसा उस जन्तु का शरीर, आचरण और स्वभाव होगा उसी के समान शरीर, आचरण और स्वभाव रखनेवाली सन्तान पैदा करेगी। पाँचवें महीने में मन और छठें महीने में बुद्धि उत्पन्न होती हैं। जितने अङ्ग तथा उपाङ्ग हैं वे सब सातवें महीने में भली-भाँति व्यक्त हो जाते हैं और आठवें महीने में ओज उत्पन्न होता है। ओज माता तथा पुत्र (यहाँ पर 'पुत्र' शब्द उपलक्षणपरक है अतः सन्तान मात्र का बोधक समझना) दोनों में क्रम से बारंबार सञ्चार करता रहता है, अतः वे दोनों म्लान तथा हर्षित होते रहते हैं अर्थात् जिस समय ओज माता में सञ्चार करता है उस समय माता हर्षित और गर्भस्थ बालक म्लान हो जाता है; तथा जिस समय ओज बालक में सञ्चार करता है उस समय बालक हर्षित
१. 'तच्छायमि'ति पा.।