भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ
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८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मारुतपित्तकफैस्तस्तथैः पच्यमानो द्वितीयके। 'कललस्थमहाभूतसमुदायो घनीभवेत् ।।२९०।। दूसरे मास में गर्भाशय में स्थित वायु, पित्त और कफ की ऊष्मा से पकता हुआ कलल में स्थित पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों से बना हुआ कललस्वरूप शुक्र और रज घन हो जाता है ।।२९०।।
- अत्र मरुत्कफयोरपि पाकहेतुत्वमेव तयोरप्यूष्मणोऽधिकरणत्वात् । यत उक्तं चरके 'भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसीः' इति ।। २९० ।। यहाँ पित्त की भाँति वायु और कफ को भी पाक का कारण समझना चाहिये क्योंकि इन दोनों में भी ऊष्मा होती है। अतएव चरक में भी कहा है कि - 'भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश में रहनेवाली भी पाँच ऊष्मा हैं' ।। २९० ।। तृतीये मासि शिरसो हस्तयोः पादयोस्तथा । पिण्डकाः पञ्च सिध्यन्ति सूक्ष्माङ्गावयवास्तनोः ।।२९१।। तीसरे मास में शिर, दोनों हाथ और दोनों पैर इन पाँच अवयवों के स्थान में पाँच पिण्ड और शरीर के सूक्ष्मभाव से अङ्गों के अवयव भी निकलते हैं ।।२९१।। सर्वाण्यङ्गान्युपाङ्गानि चतुर्थे स्युः स्फुटानि हि । हृदयव्यक्तभावेन व्यज्यते चेतनाऽपि च ।।२९२।। तस्माच्चतुर्थ गर्भस्तु नाना वस्तूिन वाञ्छति । ततो द्विहृदया यत्स्यान्नारी दौहृदिनी मता ।।२९३।। दौहृदावज्ञया कुब्जं कुणि षण्ढं च वामनम् । विकृताक्षमनक्षं वा पुत्रं नारी प्रसूयते ।।२९४।। यतः स्त्री दौहृदं प्राप्य वीर्यवन्तं चिरायुषम् । पुत्रं प्रसूयते तस्मात्तस्यै वाञ्छितमर्पयेत् ।। २९५ ।। चौथे मास में जितने अङ्ग और उपाङ्ग हैं वे सभी स्फुट (साफ-साफ प्रगट) हो जाते हैं और साथ-साथ हृदय के व्यक्त हो जाने से चेतना भी व्यक्त हो जाती है। इसी से उस समय गर्भिणी स्त्री दो (एक अपना और दूसरा गर्भ का) हृदयवाली हो जाने से 'दौहृदिनी' कहलाने लगती है। अतएव दौहृद की अवज्ञा होने से अर्थात् गर्भिणी स्त्री अभिलषित वस्तु को न पाने से कुब्जा, लूला, नपुंसक, बौना, विकार से युक्त (बुरा) नेत्रोंवाला अथवा अन्धा बालक उत्पन्न करती है। क्योंकि गर्भिणी स्त्री दौहृद (अभिलषित वस्तु) पाकर के वीर्यशाली और दीर्घ आयुवाली सन्तान पैदा करती है, अतः गर्भिणी को जो वांछित वस्तु हो देवे ।।२९२-२९५।। इन्द्रियार्थांस्तु यान्यान्सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी । गर्भबाधाभयात्तांस्तान्भिषगाहृत्य दापयेत् ।।२९६।। गर्भिणी स्त्री आँख, कान आदि जिन-जिन इन्द्रियों के विषयों को भोगने की इच्छा करे उन-उन विषयों को न देने से भी गर्भ को बाधा पहुँचेगी इस भय से वैद्य मँगवा करके दिलावें ।।२९६।।
- भोक्तुमुपभोक्तुमित्यर्थः ।। २९६ ।। 'भोग करने की' अर्थात् 'उपभोग करने की' ऐसा समझना चाहिये ।।२९६।। सा प्राप्तदौहृदा पुत्रं जनयेत्तु गुणान्वितम् । अलब्धदौहृदा गर्भे लभेतात्मनि वा भयम् ।। २९७।। इस प्रकार से अभिलषित वस्तु को प्राप्त किये हुई जो गर्भिणी स्त्री होती है वह गुण से युक्त सन्तान पैदा करती है और जो अभिलषित वस्तु को नहीं प्राप्त करती है वह अपने गर्भ अथवा शरीर के विषय में बाधा प्राप्त करती है ।। २९७।। येषु येष्विन्द्रियार्थेषु दौहृदे साऽवमानिता। प्रसूयते सुतं सार्ति तस्मिंस्तस्मिंस्तदिन्द्रिये ।।२९८।।
- सार्ति= सव्यथम् ।। २९८ ।। १. 'पाच्यमानमि'ति पा.। २. 'कललस्थं महाभूतं समुदायंगि'ति पा.। ३. 'हेतुत्वे' इति पा.।