भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८७ स्थूला त्वक्सप्तमी ख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्च सा ।।२८४।। सातवीं त्वचा स्थूला नाम से प्रसिद्ध है और वह विद्रधि आदि रोगों का उत्पत्तिस्थान है ।।२८४।। ❖ सा सप्तमी व्रीहिद्वयप्रमाणा ।। अत¹ एवोक्तं शार्ङ्गधरेण-स्थूला व्रीहिद्विमात्राचेति । सप्तापि त्वचः समुदिता विंशतितमभागोनषड्यवप्रमाणाः । षड्यवप्रमाणं तु अङ्गुष्ठोदरतुल्यम् । यत उक्तम्-‘एतत् प्रमाणं मांसलेषु स्थलेषु बोद्धव्यम्, न तु ललाटसूक्ष्माङ्गुल्यादिषु उदरे ²त्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति ।।२८४।। सातवीं स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जौ की चौड़ाई की भाँति होती है। क्योंकि 'शार्ङ्गधर' ने भी कहा है कि— 'स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जब के बराबर है' और इन सातों त्वचाओं की मुटाई सब मिलकर एक जौ के बीस भागों में से बीसवाँ भाग (अर्थात् एक भाग) कम छः जौ के चौड़ाई के भाँति है। छः जौ की चौड़ाई तो हाथ के अंगूठे के उदर भाग की चौड़ाई के बराबर होती है। किन्तु यह प्रमाण (चौड़ाई) मांसल (मांस से भरे हुए) स्थूल भागों में ही जानना चाहिये; न कि ललाट, तथा पतली अंगुली आदि भागों में। क्योंकि कहा भी है कि 'पेट में यदि शस्त्र से वेध (छेदन) करना हो तो अंगूठे के उदर की चौड़ाई के बराबर गहरा छेदन करना चाहिये ।।२८४।। अथ लोमानि लोमकूपाश्च- अस्थ्नो मलानि लोमनि चासंख्यानि भवन्ति हि । सन्ति यावन्ति लोमानि तावन्तो लोमकूपकाः ।।२८५।। रोम तथा रोमकूप—रोम हड्डियों के मल से उत्पन्न होते हैं और वे असङ्ख्य हैं। तथा शरीर में जितने रोम हैं उतने ही रोमकूप (छिद्र) भी हैं ।।२८५।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तिः स्वभावादेव जायते । सन्निवेशश्च गात्राणां नात्रास्ते कारणान्तरम् ।।२८६।। अङ्ग और प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति तथा इन सबों का भिन्न-भिन्न प्रकार की बनावट स्वभाव से ही होती है। इसमें दूसरा कारण कोई नहीं है ।।२८६।। ❖ निर्वृत्तिः=सिद्धिः । स्वभावात्=ईश्वरात् । सन्निवेशो=रचनाविशेषः ।।२८६।। 'निर्वृत्ति' पद से सिद्धि अर्थात् उत्पत्ति और स्वभाव' पद से 'ईश्वर की इच्छा' तथा 'सन्निवेश' पद से 'रचना विशेष' अर्थात् 'बनावट' समझना चाहिये ।।२८६।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तौ ये भवन्त्यगुणा गुणाः ! ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ।।२८७।। दन्तानां पतनं जन्म पुनः पाते त्वसम्भवः । तलेष्वनुद्भवो लोम्नामेतत्सर्वं स्वभावतः ।।२८८।। गर्भ के अङ्ग तथा उपाङ्गों के बनने में जो गुण अथवा अवगुण (दोष) हो जाते हैं वे उसी गर्भस्थ जीव के धर्म तथा अधर्म के निमित्त.से ही होते हैं। बाल्यावस्था में दाँतों का गिरना तथा उसके बाद पुनः जमना और दुबारा जमे हुए दाँतों के गिरने पर पुनर्बार न जमना, एवं हथेली तथा तलुए में रोगों का न होना, ये सब स्वभाव (ईश्वरेच्छा) से होते हैं, इनमें कोई दूसरा कारण नहीं है ।।२८७-२८८।। गर्भे मासि मासि यद्भवति तदाह- गर्भाशये निपतितं यादृक्शुक्रं तथाऽऽर्तवम् । तादृगेव द्रवीभूतं प्रथमे मासि तिष्ठति ।।२८९।। प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था—गर्भाशय में जैसी अवस्था में शुक्र तथा रज गिरता है पहले महीने में वह वैसी (द्रवरूप में) ही रहता है ।।२८९।। १. 'तत' इति पाठान्तरम् । २. 'उदरेष्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति पा. ।'