भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

प्राप्तो बोद्धव्यः, स च सौम्यधातोरोजः प्रभृतेः पोषणेन पवनपावकसंशुष्कभागस्यार्द्रताविधानेन जीवयतीति शेषः । मही च-जलेन क्लिन्नस्यापि कठिनविधानेन । वायु-दोषधातुमलाङ्गोपाङ्गादीनां सञ्चारणेनोच्छ्वा- सनिःश्वासाभ्याञ्च । नभो-(१ऽनिलोनलविदारितस्रोतसामूर्ध्वाधस्तिर्यगवकाशदानेन । सत्वं रजस्तम इति-) मनोरूपतया परिणतं जीवात्मनः शरीरान्तरे जीवनग्रहणमोक्षणे हेतुरिति तदपि जीवयति । पञ्चेन्द्रियाणि- श्रोत्रत्वङ्नेत्रजिह्वाघ्राणानि, शब्दादिग्रहणकर्मणा । भूतात्मा-कर्मपुरुषः स चाशेषस्यैव राशेश्चैतन्य- हेतुर्जीवतीति ।। ३२० ।। 'अग्नि' पद से पाचक, आलोचक, रञ्जक, भ्राजक और साधक संज्ञक पाँच पित्त की ऊष्मा की तथा पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) सम्बन्धी अग्नि की और रस-रक्तादि सात धातुओं के मध्य में स्थित अग्नि की शक्तिरूप से अवस्थित एवं वाणी के अधिदेवत्व को प्राप्त हुआ अग्नि समझना चाहिये । वही अग्नि पाचकादि कर्म द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । और 'सोम' शब्द से पाँच प्रकार के श्लेष्मा, रस और शुक्रादि जितने जलात्मक भाव हैं उन सबों की तथा रसनेन्द्रिय की शक्तिरूप से अवस्थित एवं मन के अधिदेवत्व को प्राप्त हुए सोम को समझना चाहिये । वही सोम ओजः प्रभृति सौम्यधातु का पोषण करने से एवं वायु तथा अग्नि से शुष्क हुये भाग को आर्द्र करने से गर्भ को जीवित रखता है । पृथ्वी-जल से गीले हुये भाग को कठिन बनाने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती है । वायु-दोष, धातु, मल, अङ्ग और उपाङ्गादिकों का सञ्चारण (चलाने फिराने) के द्वारा तथा उच्छ्वास (साँस लेना) और निःश्वास (साँस छोड़ना) के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । आकाश-वायु और अग्नि से विदीर्ण किये हुये स्रोतों को ऊपर, नीचे और तिरछे (अगल बगल) अवकाश देने के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये सब मन के रूप में परिणत होकर जीवात्मा का दूसरे शरीर में जीवन ग्रहण करने के अर्थात् दूसरे शरीर के धारण करने के तथा शरीरत्याग करने के कारण हैं, अत एव सत्त्वादि भी गर्भ को जीवित रखते हैं । पञ्चेन्द्रिय-अर्थात् कर्ण, त्वक्, नेत्र, जिह्वा और घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादिकों को ग्रहण करने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती हैं । भूतात्मा-अर्थात् कर्मपुरुष सम्पूर्ण कर्मराशियों के ही चैतन्य का हेतु होकर गर्भ को जीवित रखता है । यह समझना चाहिये ।।३२०।। अपरं गर्भस्य जीवनोपायमाह- गर्भस्य नाभिनाड्या तु नाडी रसवहा स्त्रियाः । संलग्ना तेन गर्भस्य वृद्धिर्भवति नित्यशः ।।३२१।। गर्भ के जीवित रहने के हेतु-गर्भस्थ सन्तान की नाभि-नाडी के साथ माता की रस वहन करनेवाली नाड़ी मिली हुई रहती है, इसी से नित्य प्रति गर्भ की वृद्धि होती रहती है ।।३२१।। निःश्वासोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नांशान्सोऽधिगच्छति । मातुर्निःश्वसितोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नसंभवान् ।। ३२२ ।। माता के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ (सञ्चलन) और निन्द्रा से सन्तान के भी निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और निद्रासम्बन्धी सभी कार्य सम्पादित होते हैं ।।३२२।। ❖ संक्षोभः=सञ्चलनम्, माता निःश्वासादिकायाश्चेष्टाःकरोति तास्तागर्भोऽपि करोतीत्यर्थः ।।३२२।। 'संक्षोभ' पद से सञ्चलन अर्थ समझना चाहिये और सब का सारांश भी यही समझना चाहिये कि-माता जो-जो निःश्वासादि चेष्टायें करती है गर्भ भी उन्हीं-उन्हीं चेष्टाओं को करता है ।।३२२।। अथ गर्भवृद्धेर्हेतूपायमाह- गर्भस्य नाभिमध्ये तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् । तदा धमति वातश्च देहस्तेनास्य वर्धते ।।३२३।। ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुतः । ऊर्ध्वं तिर्यग्धस्ताच्च स्रोतांसि तु यथा तथा ।। ३२४ ।। १. कोष्ठस्थ पाठः क्वाचित्कः परन्तु समीचीनः।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९३ गर्भवृद्धि के हेतु—गर्भस्थ सन्तान के नाभिमध्य में एक ज्योतिःस्थान रहता है। वायु उसी स्थान को आध्मापित (उत्तेजित) किया करता है अत एव उस गर्भ की वृद्धि हुआ करती है। अर्थात्-वायु ऊष्मा से युक्त होकर आधमन (फूँक) के द्वारा सन्तान के सम्पूर्ण स्रोतों के ऊपर नीचे और इधर-उधर सभी भागों में जैसे-जैसे दारित (विस्तारित) करता जाता है वैसे-वैसे सन्तान के देह की भी वृद्धि हुआ करती है ॥३२३-३२४॥ ❖ यथा दारयति विस्तारयति १तथा देहो बर्धत इति पूर्वेणान्वयः ।।३२३-३२४।। यहाँ पर ३२४ के श्लोक की टीका में जो 'जैसे दारित अर्थात् विस्तारित करता जाता है वैसे सन्तान के' इतना अंश है इसका पूर्व में ३२३ के 'श्लोक की टीका में' जो 'देह की वृद्धि हुआ करती है' यह अंश है उसके साथ अन्वय है ऐसा समझना चाहिये ॥३२३-३२४॥ दृष्टिरोमकूपानामवृद्धिमाह- दृष्टिश्च रोमकूपाश्च न वर्धन्ते कदा च न । ध्रुवाण्येतानि मर्त्यानामिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।३२५।। दृष्टि मण्डल तथा रोमकूपों की वृद्धि निषेध—मनुष्यों के दृष्टिमण्डल तथा सम्पूर्ण रोमकूप, कभी नहीं बढ़ते अर्थात् अन्यान्य अङ्ग और उपाङ्ग सभी क्रमशः बढ़ते रहते हैं पर दृष्टिमण्डल तथा रोमकूप ये सब सदा एक भाव से ही रहते हैं। ऐसे 'धन्वन्तरि' भगवान् का मत है ॥३२५॥ नखकेशानां सदा वृद्धिमाह- शरीरे क्षीयमाणेऽपि वर्धेत द्वाविमौ सदा । स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ।।३२६।। नख और केशों की वृद्धि में हेतु—शरीर के क्षीण हो जाने पर भी नख और केश ये दोनों सदा बढ़ते ही रहते हैं क्योंकि इन दोनों की ऐसी ही स्थिति (मर्यादा) होती है कि—अपने-अपने स्वभाव को ही प्रकृति (कारण) करके नित्य बढ़ते रहते हैं। अर्थात् नख और केश के बढ़ने में उनका स्वभाव ही कारण है ॥३२६॥ ❖ प्रकृतिं कृत्वा=कारणं कृत्वा । स्थितिः=मर्यादा ।।३२६।। 'प्रकृतिं कृत्वा' से 'कारण करके' और 'स्थिति' से 'मर्यादा' अर्थ समझना चाहिये ॥३२६॥ चेतनाचेतनान्यङ्गान्याह- चेतनानामधिष्ठानां मनो देहश्च सेन्द्रियः । २केशलोमनखाग्रान्मलद्रवगुणैर्विना ।।३२७।। शरीर में चेतन तथा अचेतन अङ्ग—केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न के मल, द्रव (मल-मूत्रादि) और शब्दादि गुण को छोड़कर इन्द्रियों से युक्त समस्त देह और मन चेतना का अधिष्ठान है अर्थात् केशादि को छोड़कर इन्द्रिय, शरीर और मन में चेतना है ॥३२७॥ गर्भस्य वातविण्मूत्रोत्सगार्करणे कारणमाह- वाताल्पत्वादयोगाच्च वायोः पक्वाशयस्य च । वातमूत्रपुरीषाणि गर्भस्थो न विमुञ्चति ।।३२८।। गर्भ में मलादि त्याग न करने में कारण—वायु की अल्पता होने से तथा वायु और पक्वाशय का अयोग (स्वल्पसंयोग) होने से गर्भस्य सन्तान बात, मूत्र और पुरीष (मल) का त्याग नहीं करता है ॥३२८॥ १. 'तथा तथे'त्यधिकः पा.। २. 'केशलोमनखाग्रान्तर्मलद्रव्ये'ति पा.।

९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ अयोगात्=ईषद्योगात् ।।३२८।। 'अयोग' पद का 'स्वल्प योग (संयोग)' अर्थ समझना ।।३२८।। गर्भरोदने कारणमाह- जरायुणा मुखे छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते । वायुमार्गनिरोधाच्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ।।३२९।। गर्भस्थ सन्तान के रोदन न करने के कारण—गर्भस्थ सन्तान का मुख जरायु (गर्भ को वेष्टित करनेवाली झिल्ली) के द्वारा ढका रहने से तथा कण्ठ कफ से भरा रहने से वायु के आने-जाने का मार्ग रुका रहता है अत एव गर्भस्थ सन्तान रोदन नहीं करती है ।।३२९।। अथ गर्भवतीकृत्याकृत्यानि । तत्रादौ गर्भिणीकृत्यान्याह- गर्भिणी प्रथमार्दहः प्रहृष्टा भूषिता शुचिः । भवेच्छुक्लाम्बरधरा गुरुविप्रार्चने रता ।।३३०।। भोज्यं तु मधुरप्रायं स्निग्धं हृद्यं द्रवं लघु । संस्कृतं दीपनीयं तु नित्यमेवोपयोजयेत् ।।३३१।। गर्भवती स्त्रियों के कर्म—गर्भिणी स्त्री गर्भ के प्रथम दिन ही से प्रसन्न चित्त, भूषणों से भूषित, पवित्र और स्वच्छ वस्त्र को धारण करनेवाली और गुरुजन तथा ब्राह्मणों के पूजन में रत रहे और नित्य ही मधुर रस से युक्त स्निग्ध (घृतादिमिश्रित), हृदय को प्रिय, द्रव (पतला) लघु, संस्कृत (भली-भाँति हिंग, जीरा आदि से छौंक कर उत्तम बनाये हुये) और अग्नि को दीपन करने वाले भोज्य पदार्थों का भोजन करे ।।३३०-३३१।। अथ गर्भिण्या अकृत्यान्याह- गर्भिणी न तु कुर्वीत व्यायाममपतर्पणम् । व्यवायं च न सेवत न कुर्यादतितर्पणम् ।।३३२।। रात्रौ जागरणं शोकं यानस्यारोहणं तथा । रक्तमोक्षं वेगरोधं न कुर्यादुत्कटासनम् ।।३३३।। दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते । स स भागः शिशोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ।।३३४।। मलिनां विकृताकारां हीनाङ्गीं न स्पृशेत्स्त्रियम् । न जिघ्रेदपि दुर्गन्धं न पश्येन्नयनाप्रियम् ।।३३५।।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९५ और यदि करे भी तो बहुत थोड़ा और कोमल गद्दा वगैरह बिछाकर सोवे और शय्या तथा आसन अत्यन्त ऊँचा न रखे, अर्थात् ऐसा रखे कि जिस पर आराम से चढ़कर बैठ सके। गर्भिणी स्त्री अति यत्नपूर्वक पूर्वोक्त इन सब नियमों का पालन करे ।।३३२-३३९।। अथ प्रसवमासानाह- नवमे दशमे मासि नारी गर्भं प्रसूयते । एकादशे द्वादशे वा ततोऽन्यत्र विकारतः ।।३४०।। प्रसब का समय—नवम या दशवें मास में गर्भिणी स्त्री सन्तान प्रसव करती है और कभी-कभी ग्यारहवें या बारहवें मास में भी प्रसव करती है। यदि इससे अधिक समय हो जाय तो यह समझना चाहिये कि किसी रोगवश विलम्ब हो रहा है अर्थात् या तो गर्भ की जगह कोई रोग है अथवा गर्भ में कोई विकार हो गया है ।।३४०।। अथ सूतिकागृहाकृतिमाह- अष्टहस्तायतं चारुचतुर्हस्तविशालकम्। प्राचीद्वारमुदग्द्वारं¹ विदध्यात्सूतिकागृहम् ।।३४१।। प्रसूतिकागृह का स्वरूप—आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौड़ा एवं पूर्व अथवा उत्तर द्वार वाला देखने में सुन्दर सूतिका गृह का निर्माण करना चाहिये ।।३४१।। आसन्नप्रसवाया लक्षणमाह- जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघने नारी विज्ञेया प्रसवोत्सुका ।।३४२।। आसन्नप्रसवायास्तु कटीपृष्ठं तु सव्यथम् । भवेन्मुहुः प्रवृत्तिश्च मूत्रस्य च मलस्य च ।।३४३।। आसन्नप्रसवा के लक्षण—कुक्षि (कोख) शिथिल होने पर तथा हृदयबन्धन (सन्तान की नाभि-नाड़ी के साथ माता की रसवहन करनेवाली नाड़ी का बंधन) मुक्त होने पर एवं जघन-प्रदेश (स्त्री के कटि के नीचे का भाग) शूल की भाँति पीड़ा से युक्त होने पर गर्भिणी स्त्री प्रसव करने के लिये उत्सुक है ऐसा समझना चाहिये । आसन्नप्रसवा स्त्री की कमर और पीठ पीड़ा से युक्त होने लगती है तथा उसके मल और मूत्र की बारंबार प्रवृत्ति होती है ।।३४२-३४३।। अथासन्नप्रसवाया उपचारमाह- तैलेनाभ्यक्तगात्रान्तां संस्नातामुष्णवारिणा । यवागूं पाययेत्कोष्णां मात्रया घृतसंयुताम् ।।३४४।। आसन्नप्रसवा स्त्री के उपचार—आसन्नप्रसवा स्त्री के शरीर में भली-भाँति तैल की मालिश करके तथा गरम जल से स्नान करा के यथोचित मात्रा के साथ उसे कुछ कुछ गरम घी से युक्त यवागू पिलावे ।।३४४।। कृतोपधाने² मृदुनि विस्तीर्णे शयने शनैः । अभुग्नसक्थी चोत्ताना नारी तिष्ठेद्यथाऽन्विता ।। प्रसवव्यथा उपस्थित होने पर गर्भिणी स्त्री तकिया लगे हुये विस्तीर्ण कोमल शय्या पर दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से अर्थात् सटे हुए न रखकर उत्तान (चित) होकर धीरे-धीरे लेट जाय ।।३४५।। ❖ अभुग्नसक्थी=असङ्कोचितोरुः ।।३४५।। ‘अभुग्नसक्थी’ अर्थात् 'दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से रखकर' ।।३४५।। अथ जनयित्र्य आह- चतस्रोऽशंकनीयाश्च स्त्रावणे कुशला हिताः । वृद्धाः परिचरेयुस्ताः सम्यक्छिन्ननखाः स्त्रियः ।। १. 'प्राचीनद्वारान्युदग्द्वारमि'ति पा. । २. 'मृदुभिरि'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आसन्न प्रसवा की परिचारिका—प्रसव कराने में चतुर अशङ्कनीय (साहस युक्त), हिताकाक्षिणी एवं वृद्धा जो हों ऐसी चार स्त्रियाँ अपने अपने हाथ के बढ़े हुये नखों को भली भाँति कटाकर पीड़ायुक्त आसन्नप्रसवा स्त्री की परिचर्या करें ॥३४६॥ अथ जनयित्रीकृत्यमाह- अपत्यमार्गं तैलेन समभ्यज्य समन्ततः । एका तु तासु सुभगे प्रवाहस्तेति तां वदेत् ।। ३४७।। अव्यथा मा प्रवाहिष्ठाः प्रवाहेथा व्यथा यदि । प्रवाहेथाः शनैः पूर्वं प्रगाढं च ततः परम् ।। ३४८ ।। ततो गाढतमं गर्भे योनिद्वारमुपागते । अपरासहितो गर्भो यावत्पतति भूतले ।। ३४९।। जनयित्री स्त्रियों के करने योग्य कर्म—गर्भिणी स्त्री के योनिमार्ग के चारों तरफ तैल लगाकर भली-भाँति चिकनाहट से युक्त कर के जनयित्रियों के मध्य में से एक स्त्री उन (गर्भिणी) से कहे 'हे सुभगे ! प्रवाहण कर अर्थात् काँखो, किन्तु प्रसव सम्बन्धिनी व्यथा शान्त होने पर मत काँखो, यदि प्रसवव्यथा उपस्थित हो तो अवश्य काँखो और पहले धीरे धीरे काँखो, तदुपरान्त कुछ जोर से काँखो तथा काँखने से योनि के मुख पर सन्तान के उपस्थित हो जाने पर जब तक वह अपरा (जेर के साथ साथ) पृथ्वी पर न गिर पड़े तब तक अत्यन्त जोर से काँखो'। ये सब बातें गर्भिणी को समझा दें ॥३४७-३४९॥ व्यथारहितायाः प्रवहणाद्वैगुण्यमाह- मूकं वा बधिरं कुब्जं श्वासकासक्षयान्वितम् । सूते स्रस्ततनुं बालमकाले तु प्रवहणात् ।। ३५० ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे गर्भप्रकरणं तृतीयम् ।। ३ ।। प्रसवव्यथा से रहित गर्भिणी के कांखने से वैगुण्य—प्रसवव्यथा न रहने पर भी यदि गर्भिणी स्त्री प्रसव के लिये काँखे तो वह मूक, बधिर, कुब्ज (कुबड़ा), श्वास, कास से युक्त या शिथिल शरीर वाला बालक पैदा करती है ॥३५०॥ इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां तृतीयगर्भप्रकरणम् समाप्तम् ।। ३ ।।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् अथ बालस्यजन्मोत्तरविधिः- अथ बाले समुत्पन्ने विदधीत विधिं तथा¹। यथैव ²कुलवृद्धस्त्रीव्यवहारपरम्परा ।।१।। बालक के जन्म होने के बाद की विधि—बालक के उत्पन्न होने पर अपने कुल की वृद्धा स्त्रियों की जैसी उस समय व्यवहार करने की परम्परा हो उसके अनुरूप विधि करे ॥१॥ प्रसूता हितमाहारं विहारं च समाचरेत्। व्यायामं मैथुनं क्रोधं शीतसेवां विवर्जयेत् ।।२।। मिथ्याचारात्सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते। स कृच्छ्रसाध्योऽसाध्यो वा भवेत्तत्पथ्यमाचरेत् ।।३।। प्रसूता स्त्री के नियम—प्रसूता स्त्री हितकर आहार-विहार करे और व्यायाम (परिश्रम युक्त कार्य), मैथुन, क्रोध और शीतल उपचार का परित्याग करे। क्योंकि उपर्युक्त नियमों का पालन न करने से प्रसूता स्त्री को जो व्याधि उत्पन्न होती है वह कृच्छ्रसाध्य (कठिनता से दूर होनेवाली) अथवा असाध्य हो जाती है। अत एव प्रसूता स्त्री जो पथ्य हो उसी का सेवन करे ।।२-३।। अथ बालस्यजन्मोत्तरविधिः- सर्वतः परिशुद्धा स्यात्स्निग्धपथ्याऽल्पभोजना। स्वेदाभ्यङ्गपरा नित्यं भवेन्मासमतन्द्रिता ।। प्रसूता स्त्री के नियम पालन करने का समय—प्रसूता स्त्री को प्रसव होने के बाद एक मास तक अत्यन्त सावधानी से शुद्ध होकर रहना चाहिये अर्थात् वस्त्रादिकों में लगे हुये जो खराब रक्तादि हों उसे भली-भाँति साफ करके सदा स्वच्छ रहना चाहिये तथा स्निग्ध और पथ्य भोज्य पदार्थों का अल्प मात्रा में भोजन करना चाहिये और नित्य तेल की मालिश तथा स्वेद निकलवाना चाहिये ।।४।। ❖ सर्वतः परिशुद्धा तु अनवसृष्टदुष्टरुधिरा, अतन्द्रिता=सावधाना ।।४।। 'सर्वतः परिशुद्धा' का यह अर्थ है कि—धोने वगैरह से वस्त्र में लगे हुये खराब रक्त को दूर करके सदा स्वच्छ रहे और 'अतन्द्रिता' का 'सावधानी से युक्त रहे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥४॥ प्रसूता सार्धमासान्ते दृष्टे वा पुनरार्त्तवे। सूतिकानामहीना स्यादिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।५।। व्युपद्रवां विशुद्धां च विज्ञाय वरवर्णिनीम्। ऊर्ध्वं चतुर्भ्यो मासेभ्यो नियमं परिहारयेत् ।।६।। प्रसव होने के डेढ़ महीने बाद अथवा पुनर्वार रजःस्राव दिखाई पड़ने के बाद प्रसूता स्त्री का 'सूतिका' यह नाम नहीं रह जाता ऐसा 'धन्वन्तरि' का मत है। प्रसव के चार महीना के बाद जब यह समझ पड़े कि प्रसूता स्त्री शुद्ध तथा उपद्रव से रहित हो गई है तो फिर उससे प्रसूता सम्बन्धी नियमों का पालन कराना बन्द कर देवें अर्थात् उसको यथेच्छ आहार-विहार करने दे ।।५-६।। अथ स्तन्यस्वरूपमाह- रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः। कृत्स्नाद्देहात्स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते ।।७।। दूध का स्वरूप—परिपक्व आहार से उत्पन्न हुआ एवं मधुर रस से युक्त जो रस का सार भाग है वही देह के सम्पूर्ण भागों से धमनियों द्वारा दोनों स्तनों में प्राप्त होकर दूध होता है अत एव वही 'स्तन्य' कहलाता है ॥७॥ १. 'तत' इति पा.। २. 'कुलवृद्धा स्त्री व्यवहारपरम्परे'ति पा.। १० भाव.I

९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ रसप्रसादः = रसस्य सारः ।।७।। 'रसप्रसादः' का अर्थ है 'रस का सार भाग' ॥७॥ अथ स्तन्यस्य प्रवृत्त्यवधिमाह- स्तन्यं त्रिरात्रात्स्त्रीणां वा चतुरात्रादनन्तरम्। प्रवर्तयन्ति विवृता धमन्यो हृदये स्थिताः ।।८।। प्रसूता स्त्रियों के स्तनों से दूध उतरने का समय—प्रसव होने के तीन अथवा चार रात्रि व्यतीत होने पर प्रसूता के हृदय में स्थित दूध को वहन करनेवाली धमनियों का मुख खुल जाने पर उनसे दूध निकलने लगता है ॥८॥ अथ स्तन्यप्रवृत्तिमाह- पयः पुत्रस्य संस्पर्शाद्दर्शनात्स्मरणादपि। ग्रहणादप्युरोजस्य शुक्रवत्सम्प्रवर्तते। स्नेहो निरन्तरस्तस्य प्रवाहे हेतुरुच्यते ।।९।। दूध निकलने के कारण—अभिलषित स्त्रियों का दर्शन अथवा स्पर्शादि करने से जिस प्रकार शुक्र का क्षरण होता है उसी प्रकार पुत्र का भी दर्शन, स्पर्श अथवा स्मरण करने से तथा स्तनों को पकड़ने से भी माता का दूध निकलने लगता है। सुतरां दूध के निकलने में माता का प्रगाढ़ स्नेह ही कारण होता है ॥९॥ अथ स्तन्यस्याल्पताहेतुमाह- अवात्सल्याद्भयाच्छोकात्क्रोधादत्यपतर्पणात्। स्त्रीणां स्तन्यं भवेत्स्वल्पं गर्भान्तरविधारणात् ।।१०।। दूध के कम निकलने के कारण—अवात्सल्य (वात्सल्यहीनता) अर्थात् पुत्र में स्नेह न होना, भय, शोक, अत्यन्त अपतर्पण (भोजनादि से तृप्त न रहना) अथवा दूसरा गर्भ धारण करना, इन सब कारणों से स्त्रियों के कम दूध निकलने लगता है ॥१०॥ अथ स्तन्यस्य वृद्धिहेतुमाह- शालिषष्टिकगोधूममांसक्षुद्रझषानपि। कालशाकमलाबूं च नारिकेलं कसेरुकम् ।।११।। शृङ्गाटकं वरीं चापि विदारीकन्दमेव च। लशुनं दुग्धवृद्ध्यै स्त्री सेवेत सुमना भवेत् ।।१२।। कलमस्य तण्डुलानां कल्कं या क्षीरपेषितं पिबति। सा भवति भृशं तरुणी क्षीरभारेणैव तुङ्गकुचयुगला ।।१३।। दूध के बढ़ने के कारण—शालि (अगहनी) और षष्टिक (साठी) धान्य, गेहूँ, मांस, क्षुद्रमत्स्य (छोटी-छोटी मछलियाँ), कालशाक (नरिचा), अलाबू (लौआ या लौकी), नारियल, कसेरू सिंघाड़ा, शतावर, विदारीकन्द और लहसुन इन सब द्रव्यों को दूध बढ़ने के लिये प्रसूता स्त्री सेवन करे और सुमना (प्रसन्न चित्त) रहे अर्थात् शालि, षष्टिकादि द्रव्यों के सेवन से दूध की वृद्धि होती है तथा माता का चित्त प्रसन्न रहने से भी दूध की वृद्धि होती है। 'कलम' नामक धान्य विशेष का चावल दूध के साथ पीस कर उसका कल्क (चटनी) बनाकर जो तरुणी स्त्री भक्षण करती है, वह दूध के भार से अत्यन्त उन्नत कुचोंवाली हो जाती है ॥११-१३॥ कलमो धान्यविशेषस्तस्य लक्षणमाह- कलमः कलिविख्यातो जायते स बृहद्ह्रदे¹। काश्मीरदेश एवोक्त महातण्डुलसंज्ञकः ।।१४।। कलम नामक धान्यविशेष का लक्षण—कलम नामक जो धान्य कलि में विख्यात है वह बड़े भारी हृद (जलाशय में) उत्पन्न होता है, उसी को काश्मीर देश में महातण्डुल नाम से कहते हैं ॥ १. 'बृहद्धने' इति पा.।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् ९९ विदारिकन्दस्य रसं पिबेत्स्तन्यस्य वृद्धये । तच्चूर्णं तस्य वृद्ध्यर्थं पिबेद्वा क्षीरसंयुतम् ।।१५।। दूध की वृद्धि के लिये विदारीकन्द का रस अथवा विदारीकन्द का चूर्ण दूध में मिला कर पीवे ।।१५।। अथ स्तन्यस्य दुष्टताहेतुमाह- धात्र्या गुरुभिराहारविहारैर्दोषलस्तथा । देहे दोषाः प्रकुप्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ।।१६।। मिथ्याऽऽहारविहारिण्या दुष्टा वातादयः स्त्रियाः । दूषयन्ति पयस्तेन शरीरं व्याधयः शिशोः ।।१७।। दूध के दूषित होने के कारण—गुरु (देर में पचनेवाला) भोजन, दोषजनक भोजन तथा विहार करने से वातादि दोष धात्री (दूध पिलानेवाली धाई अथवा माता) के देह में प्रकुपित हो जाते हैं अत एव दूध दूषित हो जाता है । अवैध आहार तथा विहार करनेवाली स्त्री के वातादि दोष प्रकुपित होकर दूध को दूषित कर देते हैं और उसी दूषित दूध के पिलाने से बालक के शरीर में रोग पैदा होते हैं ।।१६-१७।। कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् । पित्तादम्लं च कटुकं राज्योऽम्भसि तु पीतिकाः ।।१८।। कफदुष्टं तु यत्तोये निमज्जति च पिच्छिलम् । द्वन्द्वजं तु द्विलिङ्गं स्यास्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ।।१९।। दूषित दूध के लक्षण—वात से दूषित दूध कषाय (कसैला) रस से युक्त तथा जल में डालने पर तैरनेवाला होता है और पित्त से दूषित दुग्ध अम्ल (खट्टा) तथा कटु (कड़वा) रस से युक्त होता है और जल में डालने पर उसमें पीली रेखाएँ दिखाई पड़ती हैं । कफ से दूषित जो दुग्ध होता है वह जल में डालने पर डूब जाता है तथा पिच्छिल (चिकनाहट से युक्त) होता है और जिसमें दो दोषों के लक्षण पाये जायें वह दो दोषों से दूषित होने से द्वन्द्वज और जिसमें तीन दोषों के लक्षण पाये जायें वह सान्निपातिक दूध कहलाता है ।।१८-१९।। अथ दुष्टस्तन्य शोधनविधिमाह- धात्री क्षीरविशुद्ध्यर्थं मुद्गयूषरसाशिनी । भार्गीदारुवचाः पिष्ट्वा पिबेत्साऽतिविषास्तथा ।।२०।। दूषित दुग्ध की शोधन विधि—दुग्ध दूषित होने पर उसकी शुद्धि के लिये धात्री को भोजन के साथ मूँग का यूष तथा मांलरस अर्थात् सुरुवा पीना चाहिये और भार्ङ्गी, देवदारु, वच और अतीस भी पीसकर पीना चाहिये ।।२०।। पाठामूर्वाऽब्दभूनिम्बदारुशुण्ठीकलिङ्गकैः । सारिवामत्स्यपित्ताऽख्यैः क्वाथः स्तन्यविशोधनः ।। पाठा, मूर्वा, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, सोंठ, इन्द्रजौ, सारिवा (अनन्त मूल) और कुटकी इन सब द्रव्यों का क्वाथ बनाकर पीने से भी दूध शुद्ध हो जाता है ।।२१।। ❖ मत्स्यपित्ता = कटुकी ।।२१।। 'मत्स्यपित्ता' से कुटकी का ग्रहण करना चाहिये ।।२१।। पटोलनिम्बासनदारुपाठा मूर्वा गुडूचीं कटुरोहिणीं च । १सनागरां च क्वथितां च तोये धात्री पिबेत्स्तन्यविशुद्धिहेतोः ।।२२।। परवल, नीम, असन, (पीतसाल), देवदारु, पाठा, मूर्वा, गिलोय (गुरुच)' कुटकी और सोंठ इन सबों का क्वाथ दूध को शुद्ध करने के लिये धात्री पीवे ।।२१-२२।। अथ शुद्धस्तन्यस्य लक्षणमाह- नीरे स्तन्यं यदेकि स्यादविवर्णमतन्तुमत् । पाण्डुरं तनु शीतं च तद्दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।।२३।। शुद्ध दूध के लक्षण—जो दूध जल में डालने पर जल के साथ मिल जाय और दूसरे रङ्ग का न हो तथा तार १. 'सनागरं च क्वथितं चे'ति पा. ।

१०० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे न छूटे और देखने में पाण्डुर (पीत मिश्रित शुक्ल) वर्ण का हो तथा पतला और शीतल हो उसे शुद्ध समझना चाहिये ॥२३॥ धात्रीलक्षणमाह- पीताय यदि बालस्य विदध्यादुपमातरम्। सुविचार्य गुणान्दोषान्कुर्याद्धात्रीं तदेदृशीम् ॥२४॥ सवर्णां मध्यवयसां सच्छीलां मुदितां सदा। शुद्धदुग्धां बहुक्षीरां सवत्सामतिवत्सलाम् ॥२५॥ स्वाधीनामल्पसन्तुष्टां कुलीनां सज्जनात्मजाम्। कैतवेन परित्यक्तां निजपुत्रशदृशं शिशौ ॥२६॥ धात्री के लक्षण—बालक को दूध पिलाने के लिये यदि उपमाता (धाई) रखी जाय तो उसके गुण-दोषों को भली- भाँति विचार कर ऐसी धाई रखे जो अपनी जाति की हो तथा मध्य अवस्था वाली, सुशीला, सदा प्रसन्न चित्त रहनेवाली, शुद्ध तथा अधिक दूधवाली, पुत्र से युक्त, बालकों पर अत्यन्त प्रेम रखनेवाली, अपने अधीन रहनेवाली, अल्प द्रव्यादि देने से भी सन्तुष्ट रहनेवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, सज्जन की पुत्री, कपट से रहित तथा बालक को अपने पुत्र ही की भाँति देखनेवाली हो ॥२४-२६॥ अथ निषिद्धां धात्रीमाह- शोकाकुलाक्षुधार्ता च श्रान्ताव्याधिमती सदा। अत्युच्चा नितरां नीचा स्थूलातीव भृशं कृशा ॥२७॥ गर्भिणी ज्वरिणी चापि लम्बोन्नतपयोधरा। अजीर्णभोजिनी चापि तथा पथ्यविवर्जिता ॥२८॥ आसक्ता क्षुद्रकार्येषु दुःखार्ता चञ्चलाऽपि च। एतासां स्तन्यपानेन शिशुर्भवति सामयः ॥२९॥ दूध पिलाने के अयोग्य धात्री के लक्षण—शोक से व्याकुल चित्तवाली, भूख से पीड़ित, थकी हुई, सदा रोग से घिरी हुई, अत्यन्त लम्बी, अत्यन्त नीची, अत्यन्त मोटी, अत्यन्त दुबली, गर्भिणी, ज्वर से युक्त, लम्बे तथा ऊँचे स्तनोंवाली, अजीर्ण होने पर भी भोजन करने वाली, कुपथ्य भोजनादि सेवन करनेवाली, क्षुद्र (नीच) कार्यों के करने में आसक्त चित्त वाली, दुःख से पीड़ित और चञ्चल चित्तवाली ऐसी धाइयों के दूध पीने से बालक रोगी हो जाता है ॥२७-२९॥ अथ बालस्य स्तन्यपानविधिमाह- तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी। उपविश्यासने सम्यग्दक्षिणं स्तनमम्बुना ॥३०॥ प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्। उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धाय पाययेत् ॥३१॥ बालकों को दूध पिलाने की विधि—बालक को दूध पिलाने के समय माता या धाई जो कोई हो वह अपने अङ्गों को स्नानादि से स्वच्छ सुन्दर वस्त्र पहने पूर्व की ओर मुख करके अच्छी तरह से आसन पर बैठे और प्रथम दक्षिण स्तन को जल से खूब धोकर थोड़ा सा दूध उसमें से निकाल कर फेंक दे। उसके बाद आगे लिखे हुये दो मन्त्रों से स्तन को अभिमन्त्रित करके बालक का मुख गोदी में उत्तर ओर रखकर धीरे से उसके मुख में स्तन देकर दूध पिलावे ॥३०-३१॥ ❖ माता=इत्युपलक्षणम्। धात्री चेष्परिस्राव्य ॥३१॥ “माता' यह उपलक्षण है। अतएव धात्री को भी उचित है कि—दूध पिलाने के समय स्तन को धोकर उससे थोड़ा सा दूध निकाल कर फेंक देवे ॥३१॥ अन्यथा वैगुण्यमाह सुश्रुतः- अस्रावितं स्तनं बालः पिबन्स्तन्येन भूयसा। पूर्णस्रोता वमीकासश्वासैर्भवति पीडितः ॥३२॥ अविधि स्तनपान कराने का दोष—यदि दूध पिलाने के पहले स्तन से कुछ दूध निकाल कर बिना फेंके ही उसको बालक पीवे तो अधिक दूध मुख में चले जाने के कारण मुख में ऊपर का स्रोत भर जाने से बालक वमन, कास और श्वासरोग से पीड़ित होता है ॥३२॥

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०१ अथ स्तन्याभिमन्त्रणमाह- क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः । सदैव सुभगो बालो भवत्वेष महाबलः ।।३३।। पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने ! । दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राप्यामृतं यथा ।।३४।। दूध अभिमन्त्रित करने के उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ- क्षीर समुद्र तुम्हारे दोनों स्तनों में दूध भरनेवाला हो तथा उसी दूध के पीने से यह बालक सदा सौभाग्यशाली और अत्यन्त बलवान् होवे और हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता लोगों ने अमृतपान करके दीर्घ आयु प्राप्त किया, उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी अमृत के समान इस दूध को पीकर दीर्घ आयु को प्राप्त करे ।।३३-३४।। इमौ मन्त्रौ पित्रा अन्येन वा ब्राह्मणेन पठनीयौ । यावत् मन्त्रपाठस्तावद् मात्रा धात्र्या वा दक्षिणहस्तेन ('दक्षिण) स्तनस्पर्शः कार्यः ।।३३-३४।। उपर्युक्त दोनों मन्त्रों का पिता अथवा दूसरा कोई ब्राह्मण पाठ करे और जब तक मन्त्र का पाठ हो तब तक माता या धात्री जो हो वह दक्षिण हाथ से दक्षिण स्तन का स्पर्श करती रहे ।।३३-३४।। क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा । दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।।३५।। स्तन्य के अभाव में गो अथवा बकरी के दुग्ध- यदि माता के स्तन में दूध न हो तथा कोई धात्री भी न मिले तो जितने दिन तक माता के स्तनों में अच्छी तरह दूध न उतर आवे अथवा जब तक दूध पीने की योग्यता होवे तब तक उपयुक्त मात्रा में बालक को बकरी अथवा गाय का दूध पिलावे, क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य (प्रकृत्यनुकूल) होता है ।।३५।। ❖ क्षीरसात्म्यतयेति । यतः शिशोः क्षीरमेव सात्म्यं भवति न त्वन्नादिकम् । आस्तन्यपर्याप्तेरिति । यावत् स्त्रियाः स्तन्यस्य समन्ततोभावेन प्राप्तिर्भवति । अथवा यावत् स्तन्यपानस्य योग्यता भवेदित्यर्थः ।।३५।। 'बालक को बकरी या गाय का दूध ही पिलाना चाहिये क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य होता है न कि अन्नादि' इसी भाव को व्यक्त करने के लिये मूल में 'क्षीरसात्म्यतया' यह पद दिया गया है तथा 'जब तक स्त्री के स्तनों में भली भाँति दूध न उत्तर आवे और जब तक दूध पीने की योग्यता रहे' यह भाव व्यक्त करने के लिये 'आस्तन्यप्राप्तेः' यह पद दिया गया है ।।३५।। अथ बालस्यान्नप्राशनसमयमाह- यथोक्तविधिना बालं मासि षष्ठेऽष्टमेऽपि च । अन्नं सम्प्राशयेत्किञ्चित्ततस्तद्वर्धयेत्क्रमात् ।।३६।। अन्नप्राशन का समय- छठें अथवा आठवें मास में शास्त्रोक्त विधि से बालक को थोड़ा सा अन्न प्रथम चटावे, उसके बाद अवस्था वृद्धि के अनुसार अन्न की मात्रा थोड़ी थोड़ी बढ़ावे ।।३६।। अथ बालस्य परिचर्याविधिमाह- बालमङ्कं सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत्क्वचित् । सहसा बोधयेन्नैव नायोग्वमुपवेशयेत् ।।३७।। बालक की परिचर्या- बालक को जिस तरह से दुःख न हो उस तरह उठा कर गोदी में रखे और उसको कभी नहीं डरावे तथा सोते हुये उसको सहसा जगावे भी नहीं और यदि अयोग्य हो तो बैठावे भी नहीं ।।३७।। अयोग्यमुपवेशनासमर्थम् ।।३७।। 'अयोग्य' पद का 'बैठने में असमर्थ' यह अर्थ करना चाहिये ।।३७।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

१०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नाकृष्य स्थापयेत्क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित्कार्ये विधिमावश्यकं विना।।३८।। बालक को खींच कर गोद में न लेवे तथा जल्दी से शय्या पर सुलावे, आवश्यक कार्य (तैल मालिश आदि) के विना किसी कार्य में कभी न रुलावे ॥३८॥ ❖ आवश्यको विधिः=भेषजदानतैलाभ्यङ्गोद्वर्त्तनादिः ।।३८।। 'आवश्यको विधिः' अर्थात् 'औषध देना, तेल लगाना, उबटन लगाना' आदि ।।३८।। तच्चित्तमनुवर्तेत तं सदैव fly/अनुमोदयेत्। (१वातातपतडिद्वृष्टिधूम्रानलजलादितः) निम्नोच्चस्थानतश्चापि रक्षेद्बालं प्रयत्नतः ।।३९।। बालक के मन के अनुसार चले तथा उसे सदा प्रसन्न रखे एवं वायु, घाम, बिजली, वर्षा, धूम, अग्नि, जल आदि से तथा नीचे-ऊँचे स्थानों से भी उसे यत्न पूर्वक बचाता रहे ॥३९॥ अथ बालस्य स्वभावतो हितान्याह- अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानं नेत्रयोरञ्जनं तथा- वसनं मृदु यत्तच्च तथा मृद्वनुलेपनम्। जन्मप्रभृति पथ्यानि बालस्यैतानि सर्वथा ।।४०।। बालकों के लिये हितकर—तेल मालिश करना, उबटन लगाना, नहलाना, नेत्रों में अञ्जन लगाना, कोमल वस्त्र पहराना और मृदु पदार्थों का लेप करना, ये सब बालकों के लिये जन्म से ही हितकर होते हैं ।।४०।। अथ बालस्य कवलादेः समयमाह- कवलः पञ्चमाद्वर्षादष्टमान्नास्यकर्म च। विरेकः षोडशाद्वर्षाद्विंशतेश्चैव मैथुनम् ।।४१।। बालकों के कवलादि करने का समय—पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने के उपरान्त औषधों का कवल धारण करने का समय होता है तथा आठ वर्ष की अवस्था के बाद नास लेने का, सोलह वर्ष की अवस्था के बाद विरेचन (जुलाब लेने) का और बीस २० वर्ष की अवस्था के बाद मैथुन करने का समय प्रशस्त होता है। इन समयों से पहले यदि पूर्वोक्त कवलादिकों का प्रयोग कराया जाय तो हानि होती है ।।४१।। अथ बाल्यादेरवधिमाह सुश्रुतः- वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।।४२।। त्रिविधः सोऽपि दुग्धाशी दुग्धान्नाशी तथाऽन्नभुक्। दुग्धाशी वर्षपर्यन्तं दुग्धान्नाशी शरद्द्वयम् ।।४३।। तदुत्तरं स्यादश्नाशी एवं बालस्त्रिधा मतः। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः ।।४४।। २चतुर्धा मध्यमं वृद्धिद्युवपूर्णक्षयान्वितम्। भवेदाविंशतेर्वृद्धिर्युवा त्वान्त्रिंशतो मतः ।।४५।। सुश्रुतोक्त बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा—अवस्था तीन प्रकार की होती है, (१) बाल्यावस्था, (२) मध्यावस्था और (३) वृद्धावस्था, उनमें मनुष्य जब तक सोलह वर्ष से कम अवस्था का होता है तब तक उसकी बाल्यावस्था कहलाती है अतः वह बालक कहा जाता है और वह बालक भी तीन प्रकार का होता है, (१) दूध पीने वाला, (२) दूध पीने और अन्न खाने वाला तथा (३) केवल अन्न खानेवाला, उसमें एक वर्ष तक केवल दूध पीने वाला, दो वर्ष तक दूध तथा अन्न खानेवाला और उसके बाद १५ वर्ष तक केवल अन्न खाने वाला, इस प्रकार के बालक होते हैं। पण्डित लोग १६ वर्ष से लेकर ७० वर्ष के मध्य की अवस्था को मध्यावस्था कहते हैं। वह चार प्रकार की होती १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. क्वचित् 'चतुर्धा मध्यमं प्राह युव द्वात्रिंशतो मतः' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०३ है—(१) वृद्धि की अवस्था है, (२) युवावस्था, (३) पूर्णावस्था और, (४) क्षीणावस्था, इनमें से बीस वर्ष तक वीर्यादि की वृद्धि होने से यह वृद्धि की अवस्था कहलाती है तत्पश्चात्, तीस वर्ष तक की युवावस्था कहलाती है ॥४२-४५॥ चत्वारिंशत्समा यावत्तिष्ठेद्वीर्यादिपूरितः । ततः क्रमेण क्षीणः स्याद्यावद्भवति सप्ततिः ॥४६॥ ४० वर्ष तक पूर्णावस्था कहलाती है क्योंकि इस अवस्था तक शरीर में वीर्यादि पूर्ण बने रहते हैं । उसके बाद क्रम-क्रम से जब तक ७० वर्ष की अवस्था होती है तब तक वीर्यादि क्षीण हो जाते हैं अत एव यह क्षीणावस्था कहलाती है ॥४६॥ ❖ वीर्यादीत्यादिशब्देन रसादिसर्वधात्विन्द्रियबलोत्साहा उच्यन्ते । क्षीणः=सर्वधात्विन्द्रियब- लोत्साहैर्हीनः ।।४६।। ‘वीर्यादिपूरितः’ इस पद में स्थित ‘आदि’ शब्द से ‘रस रक्तादि सम्पूर्ण धातु, इन्द्रियों का बल और उत्साह पूर्ण बने रहते हैं’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये और ‘क्षीण’ पद से ‘सम्पूर्ण रसादि धातु तथा इन्द्रियों का बल एवं उत्साह से हीन’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४६॥ ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं क्षीणधातुरसादिकः । क्षीयमाणेन्द्रियबलः क्षीणरेता दिने दिने ॥४७॥ वलीप लितखालित्ययुक्तः कर्मसु चाक्षमः । कासश्वासादिभिः क्लिष्टो वृद्धो भवति मानवः ॥४८॥ उसके बाद ७० वर्ष से ऊपर की अवस्था होने पर मनुष्यों के धातु, रस रक्तादि क्षीण होते हैं और दिनों दिन इन्द्रियों का बल क्षीण होता जाता है तथा शुक्र भी क्षीण हो जाता है और तब वह बली (झुर्री) पलित (बालों का सफेद होना) और खालित्य (शिर के बालों का झड़जाना) से युक्त तथा इन्द्रियों के द्वारा कार्य करने में असमर्थ हो जाना है एवं कास, (खाँसी) और श्वास आदि रोगों से पीड़ित रहता है अतएव सत्तर वर्ष की अवस्था के बाद मनुष्य वृद्ध कहलाता हैं ॥४७-४८॥ बाल्ये विवर्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम् । वार्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।।४९।। बाल्यावस्था में कफ की वृद्धि रहती है, मध्यावस्था में पित्त का आधिक्य रहता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता है अत एव वैद्य को इसका विचार करके रोगी की चिकित्सा करनी चाहिए ॥४९॥ उपक्रमेत्=चिकित्सेत् ।।४९।। ‘उपक्रमेत्’ का ‘चिकित्सा करनी चाहिये’ ? यह अर्थ होता है ॥४९॥ तन्त्रान्तरे तु- १बाल्यं वृद्धिश्छविर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रंविक्रमौ । बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं२ दशतो ह्रसेत् ।।५०।। दूसरे ग्रन्थों में तो यह लिखा है कि—बाल्य (लड़कपन), वृद्धि (रस रक्तादि का बढ़ना), छवि (देह की कान्ति), मेधा (धारण करनेवाली बुद्धि), त्वक् (चमड़ा), दृष्टि (देखने की शक्ति), शुक्र, विक्रम, बुद्धि, कर्मेन्द्रिय (हाथ पैर आदि), चित्त और जीवन ये सब यथा क्रम से प्रति १० वर्ष के व्यतीत होने पर ह्रास को प्राप्त होते हैं अर्थात्-प्रथम दश वर्ष के बाद बाल्य द्वितीय दश (बीस) वर्ष बाद वृद्धि, तृतीय दश (तीस) वर्ष के बाद छवि इत्यादि क्रम से ह्रास को प्राप्त होते हैं ॥५०॥ अथ प्रकृतिलक्षणान्याह- सप्त प्रकृतयो नृणां वातात्पित्तात्कफात्तथा । संसर्गात्सन्निपाताच्च भवन्ति भिषजां मते ।।५१।। १. ‘बाल्यादि’ति पा. । २. ‘क्रमत’ इति पा. ।

१०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे शुक्रशोणितसंयोगे यो दोषस्तूतकटो भवेत्। प्रकृतिर्जायते तेन तस्या लक्षणमुच्यते ।।५२।। प्रकृतियों के लक्षण—वैद्यों के मत से सात प्रकार की मनुष्यों की प्रकृति होती है। उसमें वात से वात-प्रकृति १, पित्त से पित्त-प्रकृति २, कफ से कफ-प्रकृति ३, दो दोषों के मेल से द्वन्द्व-प्रकृति अर्थात् वातपित्त-प्रकृति ४, वातकफ-प्रकृति ६ और तीनों दोषों से सान्निपातिक-प्रकृति ७ होती है। गर्भाधान के समय माता पिता के शुक्र और रज के संयोगकाल में जिन दोषों की अधिकता रहती है उन्हीं दोषों के अनुसार मनुष्यों को प्रकृतियाँ होती हैं। अन्य प्रकृतियों के लक्षण आगे कहते हैं ।।५१-५२।। वाग्भटे तु आत्रेयादयः- शुक्रा सृग्गर्भिणीभोज्यचेष्टागर्भाशयार्त्तिषु¹। यः स्याद्दोषोऽधिकस्तेन ²प्रकृतिः सप्तधोदिता ।। इसी विषय में 'आत्रेयादि महर्षि' 'वाग्भट' नामक ग्रन्थ में तो ऐसा कहते हैं कि—शुक्र, शोणित (रज), गर्भिणी स्त्रियों के भोज्य पदार्थ और चेष्टायें तथा गर्भाशय की पीड़ा इन सबों में जिन दोषों की अधिकता होती है उन दोषों के अनुसार ही मनुष्यों की सात प्रकार की प्रकृति उत्पन्न होती है ।।५३।। ❖ सोऽपि दोषः स्वभावावस्थितो न तु दुष्टः, दुष्टेन तु शुक्रशोणितयोर्दुष्टौ शुद्धगर्भासम्भवात् ।।५३।। शुक्र शोणितादिगत जो अधिक दोष होते हैं उनके द्वारा प्रकृति का उत्पन्न होना जो कहा गया है उसमें दोष पद से दुष्टता की प्राप्त दोषों को नहीं समझना चाहिये किन्तु जो अपने स्वभाव में स्थित हों उन्हीं को प्रकृति का उत्पादक समझना चाहिये। क्योंकि दोषों के दुष्ट होने पर उनके द्वारा शुक्र और शोणित की भी दुष्टि हो जाती है और उन दोनों की दुष्टि से 'शुद्ध गर्भ की उत्पत्ति हो नहीं सकती अतः सर्वथा निर्दुष्ट दोषों ही को प्रकृति का उत्पादक समझना चाहिये ।।५३।। अथ वातादिप्रकृतयस्तत्रादौ वातप्रकृतिलक्षणमाह- जागरूकोऽल्पकेशश्च स्फुटिताङ्घ्रिकरः कृशः। शीघ्रगो बहुवाग्रूक्षः स्वप्ने वियति गच्छति ।। एवंविधः स विज्ञेयो वातप्रकृतिको नरः ।।५४।। वात-प्रकृति के लक्षण—जागनेवाला, अल्पकेशों से युक्त, फटे हुये हाथ-पैरवाला, दुबला-पतला, शीघ्र चलनेवाला तथा बहुत बोलनेवाला एवं रूखे शरीर वाला और स्वप्न में आकाश में गमन करनेवाला जो मनुष्य होता है उसे वात-प्रकृति वाला समझना चाहिये ।।५४।। अथ पित्तप्रकृतिलक्षणमाह- पित्तप्रकृतिको लोको यादृशोऽथ निगद्यते । अकालपलितो गौरः क्रोधी स्वेदी च बुद्धिमान् ।।५५।। बहुभुक्ताम्रनेत्रश्च³ स्वप्ने ज्योतींषि पश्यति। एवंविधो भवेद्यस्तु पित्तप्रकृतिको नरः ।।५६।। पित्त प्रकृति के लक्षण—बिना वृद्धावस्था आये ही जिसके बाल सफेद हो जायँ, और जो गौर वर्ण का तथा क्रोधी हो, शरीर से पसीना अधिक निकले, बुद्धिमान्, बहुत भोजन करने वाला, ताम्र के वर्ण के समान नेत्रवाला और स्वप्न में सूर्य, बिजली आदि ज्योति से युक्त पदार्थों का देखनेवाला हो उसे पित्त प्रकृति वाला समझना चाहिये ।।५५-५६।। १. 'गर्भाशयान्तरे' इति पा.। २. 'सर्वथोदिते'ति पा.। ३. 'बहुभोक्ताऽस्रे'ति पा.।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०५ अथ श्लेष्मप्रकृतिलक्षणमाह- श्यामकेशः क्षमी स्थूलो बहुवीर्यो महाबलः । स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः ॥५७॥ कफ प्रकृति के लक्षण-काले बालों वाला, क्षमाशील, स्थूल शरीरवाला, वीर्यशाली, अत्यन्त बलवान् और स्वप्न में जलाशय (नदी, तालाब आदि) को देखनेवाला, जो मनुष्य हो उसे कफ प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५७॥ अथ द्वन्द्वजत्रिदोषजप्रकृतिलक्षणमाह- दृश्यते प्रकृतौ यत्र रूपं दोषद्वयस्य तु । द्विसंसर्गेण जानीयात्सर्वलिङ्गैस्त्रिदोषजम् ।।५८।। द्वन्द्वज तथा त्रिदोषज प्रकृति के लक्षण-जिसकी प्रवृत्ति में दो दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे द्वन्द्वज और जिसकी प्रकृति में तीन दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे त्रिदोषज-प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५८॥ अथ वातप्रकृतिलक्षणानि वाग्भटे- १विभुत्वादाशुकारित्वाद्बलित्वादन्यकोपनात्२ । स्वातन्त्र्याद्बहुरोगत्वाद्दोषणां प्रबलोऽनिलः ।।५९।। प्रायोऽत३ एव पवनाध्युषिता मनुष्या दोषात्मकाः स्फुटितधूसरकेशगात्राः ।। शीतद्विषश्चलधृतिस्मृतिबुद्धिचेष्टासौहार्ददृष्टिगतयोऽतिबहुप्रलापाः ।।६०।। अल्पपित्तबलजीवितनिद्राः सन्नसक्तचलजर्जरवाचः । नास्तिका बहुभुजः सविलासा गीतहास्यमृगयाकलिलोलाः ।।६१।। मधुराम्लपटूष्णसात्म्यकांक्षाः कृशदीर्घकृतयः सशब्दयाताः । न दृढा न जितेन्द्रिया न चार्या न च कान्तादयिता बहुप्रजा वा ।।६२।। ४नेत्राणि चैषां खरधूसराणि वृत्तान्यचारूणि मृतोपमानि । उन्मीलितानीव भवन्ति सुप्ते शैलद्रुमांस्ते गगनं च यान्ति ।।६३।। अधन्या मत्सराष्माताः स्तेना प्रोद्बद्धपिण्डिकाः । श्वशृगालोष्ट्रगृध्राखुकाकानूकाश्च वातिकाः ।।६४।। वाग्भटोक्त वात-प्रकृति के लक्षण-विभु (व्यापक) तथा शीघ्रकारी होने से एवं बली तथा दूसरे को कुपित करनेवाला और स्वतन्त्र तथा बहुत रोगों को उत्पन्न करनेवाला होने से सम्पूर्ण दोषों के मध्य में वायु सबसे प्रबल होता है, अत एव वात-प्रकृतिवाले मनुष्य प्रायः दोषों (अवगुणों) से युक्त होते हैं, उनके शरीर और केश फटे हुये तथा धूसर वर्ण के होते हैं और वे शीत से द्वेष रखने वाले होते हैं, उन सबों की धृति (धैर्य), शक्ति, बुद्धि, चेष्टा, मित्रता, दृष्टि और गति चञ्चल होती है, एवं वे बहुत बोलनेवाले होते हैं, उनमें पित्त, बल, जीवन और निद्रा ये सब थोड़ी मात्रा में होते हैं और वे सायँ-साँय टूटे फूटे, जल्दी से हकला कर बोलने वाले, नास्तिक, बहुत भोजन करने वाले, बिलास से युक्त, गान, हँसी (मजाक), शिकार, कलह, इन सबों में आसक्त होते हैं। उन सबों को मीठा, खट्टा, नमकीन और गर्म पदार्थ ही सात्म्य (हितकर) होते हैं तथा इन्हीं पदार्थों के खाने की इच्छा भी होती है। वे पतले तथा लम्बे शरीरवाले होते हैं और उनके चलने में शब्द होता है तथा वे न तो दृढ़, न जितेन्द्रिय, न सज्जन, न स्त्रियों के प्रिय और न बहुत सन्तानवाले ही होते हैं और उन सबों के नेत्र तीक्ष्ण धूसर वर्ण वाले, गोल, देखने में भयङ्कर तथा सोने पर भी मुर्दे के समान कुछ खुले हुये होते हैं और वे स्वप्न में पर्वत तथा वृक्ष के ऊपर एवं आकाश में गमन करते हैं। वे भाग्यहीन, मत्सरता से युक्त अर्थात् दूसरे का भला न देख सकनेवाले और चोर होते हैं तथा उनके पाँवों की पिण्डलियाँ गाँठदार होती हैं। वातप्रकृति वाले मनुष्यों का स्वभाव कुत्ता, स्यार, ऊँट, गृध्र, चूहा और उल्लू पक्षी के सदृश होता है। यहाँ पर सर्वत्र 'अनूक' पद का 'स्वभाव' अर्थ समझना चाहिये ॥५९-६४॥ १. 'कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः' । २. 'अल्पकोपनादि'ति पा. । ३. 'प्रायस्य एवे'ति पा. । ४. 'अक्षीणी'ति पा. ।

१०६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ पित्तप्रकृतिलक्षणान्याह- पित्तं वह्निर्वह्निजं वा यदस्मात्पित्तोद्रिक्तस्तीक्ष्णतृष्णाबुभुक्षः । गौरोष्णाङ्गस्ताम्रहस्ताङ्घ्रिवक्त्रः १ शूरो मानी पिङ्गकेशोऽल्परोमा ॥ ६५॥ दयितमाल्यविलेपनमण्डनः सुचरितः शुचिराश्रितवत्सलः । विभवसाहसबुद्धिबलान्वितो भवति भीषु गतिर्द्विषतामपि ॥६६॥ मेधावी प्रशथिलसन्धिबन्धमांसो नारीणामनभिमतोऽल्पशुक्रकामः । आवासः २ पलिततरंगनीलिकानां भुक्तान्नं मधुरकषायतिक्तशीतम् ॥ ६७॥ घर्मद्वेषी स्वेदनः पूतिगन्धिर्भूर्युच्चारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः । सुप्तं पश्येत्कर्णिकारान् पलाशान् दिग्दाहोल्काविद्युदर्कानलांश्च ॥ ६८॥ तनूनि पिङ्गानि चलानि चैषां तन्वल्पपक्षाणि हिमप्रियाणि । क्रोधेन मद्येन रवेश्च भासा रागं व्रजन्त्याशु विलोचनानि ॥६९॥ मध्यायुषो मध्यबलाः पण्डिताः क्लेशभीरवः । व्याघ्रर्क्षकपिमाजार्वृकानूकाश्र पैत्तिकाः ॥७०॥ वाग्भटोक्त पित्तप्रकृति के लक्षण—पित्त स्वयं अग्नि अथवा अग्नि से उत्पन्न है अतः पित्तप्रकृतिवालों को भूख- प्यास अधिक लगती है। वे गौर वर्ण तथा गरम शरीरवाले होते हैं, उनके हाथ पैर और मुख ताम्र वर्ण के होते हैं। वे शूर, मानी, पीले केशवाले तथा थोड़े रोगों से युक्त होते हैं और उनको पुष्पों की माला, चन्दनादि का लेप और आभूषण प्रिय लगते है। वे सुन्दर चरित्र वाले, पवित्र, आश्रितों के ऊपर पुत्र की भाँति प्रेम रखनेवाले, धन, साहस, बुद्धि तथा बल से युक्त, भय का विषय उपस्थित होने पर शत्रुओं को भी शरण देने वाले और मेधावी होते हैं। उनके मांस तथा सन्धियों के बन्धन शिथिल होते हैं, वे स्त्रियों के प्रिय नहीं होते, क्योंकि उनमें शुक्र तथा कामचेष्टा कम होती है और वे पलित (बालों की सफेदी), झुरीं, और नीलिका रोगों के निवासस्थान तथा मीठा, कसैला, तीता और शीतल भोजन करनेवाले एवं घर्म (धूप) के साथ द्वेष करनेवाले होते हैं और उनके शरीर से स्वेद (पसीना) अधिक निकलता है तथा दुर्गन्ध आता है। उनमें विष्ठादि मल, क्रोध, पान (मद्यादि का पीना), भोजन व ईर्ष्या इन सबों की मात्रा अधिक रहती है। वे स्वप्न में कनेर, पलाश, दिशाओं का जलना, उल्का, बिजली, सूर्य और अग्नि को देखते हैं उनके नेत्रों के पलकों के ऊपर के रोम पतले और थोड़े होते हैं। उनकी आँखें पीली, चञ्चल शीत को पसन्द करनेवाली लम्बी, क्रोध, मद्य, तथा सूर्य की किरणों से शीघ्र रक्त वर्ण हो जाने वाली होती है। वे मध्यम आयु तथा बलवाले, पण्डित, क्लेश से डरने वाले और व्याघ्र, भालू, बन्दर, बिलार तथा भेड़िया के सदृश स्वभाववाले होते हैं ॥ ६५-७०॥ अथ कफप्रकृतिलक्षणान्याह- श्लेष्मा सोमः श्लेष्मलस्तेन सौम्यो गूढस्निग्धश्लिष्टसन्ध्यस्थिमांसः । क्षुत्तृड्दुःखक्लेशघमैर्रतप्तो बुद्ध्या युक्तः सात्त्विकः सत्यसन्धः ॥ ७१॥ प्रियंगुदूर्वाशरकाण्डदर्भगोरोचनापद्मसुवर्णवर्णः । प्रलम्बबाहुः पृथुपीनवक्षामहाललाटो घननीलकेश ॥७२॥ मृद्वङ्गः समसुविभक्तचारुदेहो ३बह्वोजोरतिरसशुक्रपुत्रमृत्यः । धर्मात्मा वदति न निष्ठुरं च जातु प्रच्छन्नं वहति दृढं चिरं च वैरम् ॥ ७३॥ १. 'हस्तादियुग्म' इति 'हस्ताङ्घ्रिचक्षु'रिति च पा.। २. 'आवासः पलितव्यङ्गनीलिकानामि'ति पा.। ३. 'बह्वाजा रतिरसयुक्त सपुत्रभृत्य' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०७ समदद्विरेन्द्रतुल्ययातो जलदाम्भोधिमृदङ्गसिंहघोषः । स्मृतिमानभियोगवान्विनीतो न च बाल्येऽप्यतिरोदनो न लोलः ।।७४।। तिक्तं कषायं कटुकोष्णरूक्षमल्पं स भुंक्ते बलवांस्तथाऽपि । रक्तान्तसुस्निग्धविशालदीर्घसुव्यक्तशुक्लासितपक्ष्मलाक्षः ।।७५।। अल्पव्याहारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः प्राज्यायुर्वित्तो दीर्घदर्शी वदान्यः । श्राद्धो गम्भीरः स्थूललक्ष्यः क्षमाया-नार्योन्निद्रालुर्दीर्घसूत्रः कृतज्ञः ।।७६।। ऋजुर्विपश्चित्सुभगः सलज्जो भक्तो गुरूणां स्थिरसौहृदश्च । स्वप्ने सपद्मान्सविहङ्गमालास्तोथाशयान्यश्यति तोयदांश्च ।।७७।। ब्रह्मरुद्रेन्द्रवरुणतार्क्ष्यहंसगजाधिपैः । श्लेष्मप्रकृतस्तुल्यास्तथा सिंहाश्वगोवृषः ।।७८।। वाग्भटोक्त कफप्रकृतिवालों के लक्षण- कफ सोमात्मक पदार्थ है, अतः कफ प्रकृति वाला मनुष्य सौम्य होता है। उसके सन्धि, अस्थि और मांस गूढ, स्निग्ध और परस्पर मिले हुये रहते हैं और वह भूख, प्यास, दुःख और क्लेश के धर्मों से सन्तप्त नहीं होता, वह बुद्धि से युक्त, सत्त्व गुण वाला, सत्यप्रतिज्ञ (अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने वाला) होता है। उसका वर्ण प्रियङ्गु, दूब, मूंज, कुशा, गोरोचन, कमल और सुवर्ण के समान होता है। उसकी बाहें लम्बी, ललाट चौड़ा और वक्षःस्थल चौड़ा तथा मोटा, केश घने तथा काले, अङ्ग कोमल और शरीर सम, सुविभक्त (अच्छी तरह से प्रत्येक अवयवों का विभाग हुआ) और सुन्दर होता है। उसमें ओज, रति, रस, शुक्र, पुत्र और भृत्य इनका आधिक्य रहता है। वह धर्मात्मा, कभी निष्ठुर वचन नहीं बोलने वाला दृढ़ तथा चिरकाल तक गुप्त रूप से वैर रखनेवाला होता है। उसका गमन मतवाले हाथी के समान, कण्ठस्वर मेघ, समुद्र, मृदङ्ग और सिंह के शब्द के समान गम्भीर होता है। वह स्मरण शक्ति-वाला, उद्योगी, विनय से युक्त और लड़कपन में भी न अत्यन्त रोने वाला और न चञ्चलता से रहने वाला होता है। वह यद्यपि तीता, कसैला, कड़ुआ, गरम, रूखा तथा थोड़ा भोजन करता है तथाऽपि बलवान् होता है। उसके दोनों नेत्र प्रान्त भागों में रक्त वर्ण से युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, बड़े और लम्बे शुक्ल तथा कृष्ण मण्डल जिसमें भलीभाँति से व्यक्त हो रहे हैं तथा सुन्दर नेत्र-लोमों (बरौनी) से युक्त होते हैं। वह बातचीत, क्रोध, पान, भोजन और ईर्ष्या इन सबों की थोड़ी मात्रा में करता है। वह बहुत आयु तथा धन से युक्त, दूर तक विचार करने वाला, उदार, श्रद्धा से युक्त, गम्भीर, क्षमाशील, श्रेष्ठ, अधिक सोनेवाला, दीर्घसूत्र (प्रारम्भ किये हुये कर्म को बहुत देर में समाप्त करने वाला) और कृतज्ञ होता है। वह सरल चित्त, विद्वान्, सुभग (देखने में सुन्दर या अच्छा ऐश्वर्यवान्), गुरुजनों की भक्ति रखनेवाला, स्थिर मंत्री रखने वाला, स्वप्न में कमल और पक्षियों के वृन्द से युक्त जलाशय तथा मेघ को देखने वाला होता है और कफ-प्रकृतिवाले मनुष्य ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, गरुड़, हंस, गजेन्द्र, सिंह, घोड़ा, गौ और बैल के सदृश स्वभाव से युक्त होते हैं ॥७१-७८॥ ननु प्रकृतिहेतूनां मध्ये योऽधिकः स स्वव्याधीन्कथं न करोतीत्याशंकायामाह- विषजाता यथा कीटो न विषेण प्रबाध्यते । तद्वत्प्रकृतयो मर्त्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ।।७९।। प्रकृति के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं, उनके मध्य में जो अधिक होता है उसी के अनुसार प्रकृति होती है तो वही दोष अपनी प्रकृतिवाले मनुष्यों में अपने से उत्पन्न होनेवाली व्याधियों को क्यों नहीं उत्पन्न करता ? इस शङ्का का उत्तर यह है कि-विष से उत्पन्न हुये कीड़े जैसे विष से पीड़ित नहीं होते, उसी प्रकार वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को वातादि दोष पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं ।।७९।। ❖ एतौ द्वौ नञौ अपि ईषदर्थे । तेन विषेण विषजदाहादिना ईषत् प्रबाध्यते, न तु भृशम् । तथा च प्रकृतयः प्रकृतिहेतवो दोषा बाधितुं न शक्नुवन्ति । करचरणस्फुटितत्व स्वेदनिद्राऽऽधिक्यादिना ईषद्व बाधितुं शक्नुवन्त्येव, न ज्वरादिभिः ।।७९।।

१०८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ पर मूल में जो दो स्थलों पर 'नञ्' (नहीं) शब्द का प्रयोग आया है वहाँ पर उन दोनों को 'थोड़े' इस अर्थ में प्रयोग हुआ है ऐसा समझना चाहिये, अत एव 'विष से पीड़ित तो नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'विष से होनेवाले दाहादिक से किञ्चिन्मात्र ही पीड़ित होते हैं न कि अधिक मात्रा में ऐसा समझना चाहिये । तथा 'वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को तत्तत् प्रकृतियों के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं वे पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'हाथपैर का फटना, पसीने का अधिक निकलता और अधिक नींद आना इत्यादि से तो थोड़ी मात्रा में पीड़ित करने के लिये अवश्य ही समर्थ होते हैं न कि ज्वरादिकों से पीड़ित करने के लिये समर्थ होते हैं' ऐसा समझना चाहिये ॥७९॥ प्रकोपो वाऽन्यभावो वा शमो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥८०॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे बालप्रकरणं चतुर्थम् ॥४॥ वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों के शरीर में स्वभाव से ही वातादि दोषों का प्रकोप, अन्यभाव (बदल जाना), अथवा उपशम कभी होता ही नहीं यदि होता है तो उन्ही लोगों को जिन लोगों की आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् जो जल्द मरने वाले हैं ॥८०॥ इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायं चतुर्थबालप्रकरणम् समाप्तम् ॥४॥

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् अथ देशमाह- भूमिदेशस्त्रिधाऽनूपो जांगलो मिश्रलक्षणः ॥१॥ देशों के भेद—पृथ्वी में देश तीन प्रकार के होते हैं (१) अनूप, (२) जाङ्गल और (३) मिश्रलक्षण (अनूप तथा जाङ्गल के लक्षणों से युक्त अर्थात् साधारण) ॥१॥ तत्रानूपलक्षणमाह- नदीपल्वलशैलाढ्यः फुल्लोत्पलकुलैर्युतः । हंससारसकारंडवचक्रवाकादिसेवितः ॥२॥ शशवाराहमहिषरुरुरोहित्कुलाकुलः । प्रभूतद्रुमपुष्पाढ्यो नीलशस्यफलान्वितः ॥३॥ अनेकशालिकेदारकदलीक्षुविभूषितः । अनूपदेशो ज्ञातव्यो वातश्लेष्मामयार्त्तिमान् ॥४॥ अनूपदेश के लक्षण—जो देश नदी, छोटे-छोटे जलाशय और पर्वतों से भरे हुए हैं तथा खिले हुये जल में उत्पन्न होनेवाले कमलादि पुष्पों से युक्त, हंस, सारस, कारण्डव (काक के समान चोंच, लम्बे पाँववाले काले वर्ण के) पक्षी और चक्रवाक (चकवा) आदि पक्षियों से सेवित, शश (खरगोश), सूअर, भैंसा, रुरु (मृग विशेष) तथा रोहि (मृग विशेष) आदि पशुओं के कुलों से व्याप्त, अनेक प्रकार के वृक्ष, पुष्पों तथा हरे-हरे शस्य (धान्य विशेष) और फलों से युक्त एवं अनेक प्रकार के शालि (धान्यविशेष) के खेत तथा केले और ईख के वृक्षों से सुशोभित है उसे वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूपदेश समझना चाहिये ॥२-४॥ अथ जाङ्गललक्षणमाह- आकाशसम¹ उच्चश्च स्वल्पपानीयपादपः । शमीकरीरबिल्वार्कपीलुकर्कन्धुसङ्कुलः ॥५॥ हरिणैणर्क्षपृषतगोकर्णखरसङ्कुलः । सुस्वादुफलवान्देशो वातलो जाङ्गलः स्मृतः ॥६॥ जाङ्गल देश के लक्षण—जिस देश में आकाश के सदृश समतल और ऊँची जमीन थोड़े जल तथा वृक्षों से युक्त हो और शमी (छींकुर), करील, बेल, आक, (मदार), पीलु, तथा बेर के वृक्षों एवं हरिण, एण (कृष्ण मृग), रीछ, पृषत (श्वेतबिन्दु युक्त मृग), गोकर्ण (गौ के सदृश कानवाला) पशु और गदहा इन सबों से व्याप्त हो तथा जिसमें स्वादयुक्त (मीठे) फल लगे हों ऐसे देश को वातसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥५-६॥ तन्त्रान्तरे तु- बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान् । जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ॥७॥ दूसरे ग्रन्थों में अनूपादि देशों के विषय में यह लिखा है कि—जिसमें बहुतायत से जल तथा पर्वत हों उसे कफ तथा वायु सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूप देश समझना चाहिये और जहाँ थोड़े जल तथा वृक्ष हों उसे प्रधानरूप से पित्त, रुधिर तथा वायुसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥७॥ अथ साधारणलक्षणमाह- संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः । समाः साधारणे यस्माच्छीतवर्षोष्ममारुताः । समता तेन दोषाणां तस्मात्साधारणो वरः ॥८॥ साधारण देश के लक्षण—जिस देश में अनूप तथा जाङ्गल इन दोनों देशों के लक्षण पाये जायें, उसे साधारण १. 'आकाशशुभ्र' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे देश समझना चाहिये। साधारण देश में शीत, वर्षा, गर्मी और वायु समान रूप से होते हैं अत एव वात, पित्त और कफ इन दोषों की वहाँ पर समता होने से वह (साधारण) देश सब से उत्तम कहा गया है ॥८॥ सुश्रुतः- उचिते वर्तमानस्य नास्ति दुर्देशजं भयम्। आहारस्वप्नचेष्टाऽऽदौ तद्देशस्य कृते सति ॥९।। सुश्रुत में कहा है कि—किसी भी दुर्देश (जहाँ का जल, वायु अपने अनुकूल न हों उस देश) में जाने पर यदि आहार, विहार, निद्रा आदि के विषय में उचित आचरण किया जाय तो दुर्देश सम्बन्धी रोगादि का भय नहीं होता है ॥९॥ वृद्धवाग्भटः- यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्। देशादन्यत्र वसत्तत्तुल्यगुणमौषधम् ।।१०।। स्वे देशे निचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपभागताः। बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ।।११।। 'वृद्ध वाग्भट' कहते हैं कि—जिस देश का रहनेवाला जो प्राणी हो उसे उसी देश में उत्पन्न हुई ओषधि हितकर हो सकती है। उस देश (स्वदेश) से अन्यत्र निवास करते हुए प्राणी के लिये स्वदेश में उत्पन्न हुई हितकर ओषधि के तुल्य गुणवाली अन्य देश की भी ओषधि हितकर होती है अपने देश में सञ्चित हुये दोष यदि दूसरे देश में कुपित होवें तो उतने बलवान् नहीं होते, चाहे वे जलप्राय अथवा स्थलप्राय देश में उत्पन्न होनेवाले रोग क्यों न हों। अर्थात् अनूप देश में रहनेवाले पुरुषों के सञ्चित हुये दोष जाङ्गल देश में जाने पर यदि कुपित हो जायँ तो भी वे अपने देश की भाँति बलवान् नहीं होते ॥१०-११॥ अथ दिनादिचर्याः- मानवो येन विधिना स्वस्थस्तिष्ठति सर्वदा। तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ॥१२।। दिनचर्या निशाचर्यामृतुचर्या यथोदिताम्। आचरन्पुरुषः स्वस्थः सदा तिष्ठति नान्यथा ॥१३॥ दिनादिचर्या—जैसा आहार विहारादि करने से मनुष्य सर्वदा स्वस्थ (नीरोग) रह सकता हो, वैद्य को उचित है कि- उसी विधि को उससे करावे। क्योंकि स्वस्वास्थ्य सभी को वांछनीय है। शास्त्र में दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या जिस प्रकार से कही हुई है। उसी प्रकार से दिनचर्यादि का आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। उसके विपरीत आचरण करने से स्वास्थ्य लाभ नहीं कर सकता है ॥१२-१३॥ तत्र स्वस्थस्य लक्षणमाह सुश्रुतः- समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥१४।। सुश्रुतोक्त स्वस्थ पुरुष का लक्षण—जिसके शरीर में वातादि दोष अग्नि, धातु (रसरक्तादि), मल और क्रिया समान रूप से हों तथा जो आत्मा, इन्द्रिय तथा मन से प्रसन्न रहता हो, उसे स्वस्थ कहते हैं ॥१४॥ ❖ क्रिया अत्र कर्म, तेन समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा ।।१४।। 'क्रिया' पद का अर्थ 'कर्म' है अतः 'समक्रिय' अर्थात् जिसके कर्म शरीर के अनुरूप होते हों ॥१४॥ अथ दिनचर्यामाह- ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षाऽर्थमायुषः। तत्र १सर्वाघशान्त्यर्थं स्मरेद्धि मधुसूदनम् ।।१५।। दध्याज्यादर्शसिद्धार्थ बिल्वगोरोचनस्रजाम्। दर्शनं स्पर्शनं कार्यं प्रबुद्धेन शुभावहम् ।।१६।। दिनचर्या—स्वस्थ पुरुष अपनी आयु की रक्षा के लिए ब्राह्ममुहूर्त्त में (सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पहले) सो कर उठे १. 'दुःखस्ये'ति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १११ और उस समय सम्पूर्ण पापों को शान्त करने के लिये मधुसूदन भगवान् का स्मरण करे और उसे उचित है कि वह प्रथम दही, घी, दर्पण, पीली सरसों, बेल, गोरोचन तथा पुष्पमाला का दर्शन तथा स्पर्श करे, क्योंकि यह शुभदायक होता है ॥१५-१६॥ स्वमाननं घृते पश्येद् यदिच्छेच्चिरजीवितम् । आयुष्यमुषसि प्रोक्तं मलादीनां विसर्जनम्। तदन्त्रकूजनाध्मानोदरगौरववारणम् ॥१७॥ यदि दीर्घ जीवन लाभ करने की अभिलाषा हो तो अपने मुख को घृत में देखे और प्रातः काल में मल-मूत्रादि का त्याग करना आयुष्य (आयु के लिये हितकर) तथा आँत का गुड़गुड़ाना, अफारा तथा पेट का भारीपन इन सबों का दूर करनेवाला कहा हुआ है ॥१७॥ ❖ आदिशब्देन वातमूत्रादीनां ग्रहणम् ॥१७॥ 'मलादि' में वात (अधोवायु) मूत्र आदि का ग्रहण करना चाहिये ॥१७॥ अथ पुरीषवेगाभिघाताद्बाधानिमाह- आटोपशूलौ परिकर्त्तिका च सङ्गः पुरीषस्य तथोर्ध्ववातः । पुरीषमास्यादथवा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥१८॥ शौच की चेष्टा रोकने से हानि—पुरीष का वेग अर्थात् शौच की चेष्टा रोकने पर मनुष्य को आटोप (पेट में वेदना युक्त गुड़गुड़ शब्द का होना), शूल और 'परिकर्तिका' (गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा) ये सब रोग होते हैं तथा मल का अवरोध और ऊर्ध्ववात अथवा मुख से मल निकलना, इन सबों में से कोई-न-कोई होने लगता है ॥१८॥ ❖ परिकर्तिका=गुदे परिकर्तनवत्पीडा । पुरीषस्य सङ्गः=निरोधः । ऊर्ध्ववातः=उद्गारबाहुल्यम् ॥१८॥ 'परिकर्तिका' का 'गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा' 'पुरीषस्य सङ्गः' का 'मलका अवरोध' तथा 'ऊर्ध्ववात' का अधिक उद्गार (डकार) आना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८॥ अथ वातनिग्रहजान् दोषानाह- वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥१९॥ अधोवायु रोकने से हानि—अधोवायु रोकने से वात, मूत्र और मल का अवरोध, अफारा, क्लान्ति, पीड़ा एवं उदर में वायु से उत्पन्न होने वाले अन्यान्य रोग भी होते हैं ॥१९॥ अथ मूत्रनिग्रहजान् दोषानाह- बस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥२०॥ मूत्र के वेग रोकने से हानि—मूत्र के वेग रोकने से मूत्राशय तथा लिङ्ग में शूल, मूत्रकृच्छ्र, शिर में दर्द, विनाम तथा वङ्क्षणानाह, ये सब रोग होने लगते हैं ॥२०॥ ❖ विनामः=शरीरस्य नम्रता । वङ्क्षणानाहः=वङ्क्षणस्याकर्षणवत्पीडा ॥२०॥ 'विनाम' पद से 'पीड़ा होने से शरीर का झुक जाना' तथा 'वङ्क्षणानाह' पद से 'वङ्क्षण अर्थात् दोनों ऊरुओं के सन्धिस्थानों के खींचने की भाँति पीड़ा होना, यह अर्थ समझना चाहिये ॥२०॥ न वेगतोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद्वलात् । कामशोकभयक्रोधान्मनोवेगान्विधारयेत् ॥२१॥ गुदादिमलमार्गाणां शौचं कान्तिबलप्रदम् । पवित्रकरमाख्यातमलक्ष्मीकलिपापहृत् ॥२२॥ प्रक्षालनं मतं पाण्योः पादयोः शुद्धिकारणम् । मलश्रमहरं वृष्यं चक्षुष्यं राजसापहम् ॥२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA