भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राप्तो बोद्धव्यः, स च सौम्यधातोरोजः प्रभृतेः पोषणेन पवनपावकसंशुष्कभागस्यार्द्रताविधानेन जीवयतीति शेषः । मही च-जलेन क्लिन्नस्यापि कठिनविधानेन । वायु-दोषधातुमलाङ्गोपाङ्गादीनां सञ्चारणेनोच्छ्वा- सनिःश्वासाभ्याञ्च । नभो-(१ऽनिलोनलविदारितस्रोतसामूर्ध्वाधस्तिर्यगवकाशदानेन । सत्वं रजस्तम इति-) मनोरूपतया परिणतं जीवात्मनः शरीरान्तरे जीवनग्रहणमोक्षणे हेतुरिति तदपि जीवयति । पञ्चेन्द्रियाणि- श्रोत्रत्वङ्नेत्रजिह्वाघ्राणानि, शब्दादिग्रहणकर्मणा । भूतात्मा-कर्मपुरुषः स चाशेषस्यैव राशेश्चैतन्य- हेतुर्जीवतीति ।। ३२० ।। 'अग्नि' पद से पाचक, आलोचक, रञ्जक, भ्राजक और साधक संज्ञक पाँच पित्त की ऊष्मा की तथा पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) सम्बन्धी अग्नि की और रस-रक्तादि सात धातुओं के मध्य में स्थित अग्नि की शक्तिरूप से अवस्थित एवं वाणी के अधिदेवत्व को प्राप्त हुआ अग्नि समझना चाहिये । वही अग्नि पाचकादि कर्म द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । और 'सोम' शब्द से पाँच प्रकार के श्लेष्मा, रस और शुक्रादि जितने जलात्मक भाव हैं उन सबों की तथा रसनेन्द्रिय की शक्तिरूप से अवस्थित एवं मन के अधिदेवत्व को प्राप्त हुए सोम को समझना चाहिये । वही सोम ओजः प्रभृति सौम्यधातु का पोषण करने से एवं वायु तथा अग्नि से शुष्क हुये भाग को आर्द्र करने से गर्भ को जीवित रखता है । पृथ्वी-जल से गीले हुये भाग को कठिन बनाने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती है । वायु-दोष, धातु, मल, अङ्ग और उपाङ्गादिकों का सञ्चारण (चलाने फिराने) के द्वारा तथा उच्छ्वास (साँस लेना) और निःश्वास (साँस छोड़ना) के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । आकाश-वायु और अग्नि से विदीर्ण किये हुये स्रोतों को ऊपर, नीचे और तिरछे (अगल बगल) अवकाश देने के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये सब मन के रूप में परिणत होकर जीवात्मा का दूसरे शरीर में जीवन ग्रहण करने के अर्थात् दूसरे शरीर के धारण करने के तथा शरीरत्याग करने के कारण हैं, अत एव सत्त्वादि भी गर्भ को जीवित रखते हैं । पञ्चेन्द्रिय-अर्थात् कर्ण, त्वक्, नेत्र, जिह्वा और घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादिकों को ग्रहण करने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती हैं । भूतात्मा-अर्थात् कर्मपुरुष सम्पूर्ण कर्मराशियों के ही चैतन्य का हेतु होकर गर्भ को जीवित रखता है । यह समझना चाहिये ।।३२०।। अपरं गर्भस्य जीवनोपायमाह- गर्भस्य नाभिनाड्या तु नाडी रसवहा स्त्रियाः । संलग्ना तेन गर्भस्य वृद्धिर्भवति नित्यशः ।।३२१।। गर्भ के जीवित रहने के हेतु-गर्भस्थ सन्तान की नाभि-नाडी के साथ माता की रस वहन करनेवाली नाड़ी मिली हुई रहती है, इसी से नित्य प्रति गर्भ की वृद्धि होती रहती है ।।३२१।। निःश्वासोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नांशान्सोऽधिगच्छति । मातुर्निःश्वसितोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नसंभवान् ।। ३२२ ।। माता के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ (सञ्चलन) और निन्द्रा से सन्तान के भी निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और निद्रासम्बन्धी सभी कार्य सम्पादित होते हैं ।।३२२।। ❖ संक्षोभः=सञ्चलनम्, माता निःश्वासादिकायाश्चेष्टाःकरोति तास्तागर्भोऽपि करोतीत्यर्थः ।।३२२।। 'संक्षोभ' पद से सञ्चलन अर्थ समझना चाहिये और सब का सारांश भी यही समझना चाहिये कि-माता जो-जो निःश्वासादि चेष्टायें करती है गर्भ भी उन्हीं-उन्हीं चेष्टाओं को करता है ।।३२२।। अथ गर्भवृद्धेर्हेतूपायमाह- गर्भस्य नाभिमध्ये तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् । तदा धमति वातश्च देहस्तेनास्य वर्धते ।।३२३।। ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुतः । ऊर्ध्वं तिर्यग्धस्ताच्च स्रोतांसि तु यथा तथा ।। ३२४ ।। १. कोष्ठस्थ पाठः क्वाचित्कः परन्तु समीचीनः।