भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९१ जैसे आम के अत्यन्त छोटे फल में मांस (गूदा), अस्थि (कुसुली) और मज्जा (मींगी) आदि साथ ही साथ रहते हैं और अत्यन्त सूक्ष्म होने से अलग २ दिखलाई नहीं पड़ते और पुष्ट होने पर वे ही दिखलाई पड़ने लगते हैं, उसी भाँति गर्भ रहने पर जितने अवयव हैं वे सभी एक साथ ही उसमें रहते हैं किन्तु सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं पड़ते और जब वे ही बढ़ जाते हैं तब साफ-साफ प्रकट हो जाते हैं ॥३१५॥ ❖ मज्जादय इत्यादिशब्देन त्वक्केशरमज्जत्वमङ्कुरवृन्तानि गृह्यन्ते ।।३१५।। 'मज्जादय' इस पद में आदि शब्द से छिल्का, केशर, मींगी के ऊपर का अत्यन्त पतला छिल्का, अङ्कुर, वृन्त (ढेपी) इन सबों का ग्रहण होता है ॥३१५॥ अथ शरीर पितृज-मातृज-रसजात्मजा भागा उच्यन्ते । तत्र- केशाः श्मश्रु च लोमानि नखा दन्ताः शिरास्तथा। धमन्यः स्नाववः शुक्रमेतानि पितृजानि हि ।।३१६।। मांसासृङ्मज्जमेदांसि यकृत्प्लीहान्त्रनाभयः । हृदयं च गुदं चापि भवन्त्येतानि मातृतः ।।३१७।। शरीरोपचयो वर्णो बलं देहस्थितितस्तथा। रसादेतानि जायन्ते भिषजो मुनयो जगुः ।।३१८।। पितृज-मातृज शरीराकृति—बाल, दाढ़ी, मूंछ, रोम, नख, दाँत, शिरा, धमनी, स्नायु और शुक्र ये सब पितृज (पिता से उत्पन्न हुये) कहलाते हैं। मांस, रक्त, मज्जा, मेदा, यकृत, प्लीहा, अँतड़ी, नाभि, हृदय और गुदा ये सब माता से उत्पन्न होते हैं अत एव मातृज कहलाते हैं । शरीर की वृद्धि, गौरादि वर्ण, बल और देह का स्थित रहना, ये सब रस से उत्पन्न होते हैं अत एव रसज कहलाते हैं ऐसा वैद्यक के जानकार मुनियों ने कहा है ॥३१६-३१८॥ ज्ञानं विज्ञानमायुश्च सुखदुःखादिकं तथा। इन्द्रियाणि च सर्वाणि भवन्त्येतानि चात्मनः ।।३१९।। ज्ञान, विज्ञान, आयु और सुख-दुःखादि तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ ये सब आत्मा से उत्पन्न होते हैं अत एव आत्मज कहलाते हैं ॥३१९॥ ❖ ('१सुख) दुःखादिकमित्यादिशब्देन नानायोनिजन्मादिकमुच्यते । आत्मनः = आत्मसन्निकर्षाद् न त्वात्मनो जायन्ते, आत्मनो निर्विकारात् प्रकृतिभावानुपपत्तेः ।।३१९।। 'सुखदुःखादिकम्' इस पद में स्थित आदि शब्द से अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेना आदि का भी ग्रहण करना चाहिये और 'आत्मा से उत्पन्न होते हैं' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि आत्मा के सम्बन्ध से उत्पन्न होते हैं न कि साक्षात् आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि-आत्मा निर्विकार है अत एव वह प्रकृति के भावों को नहीं प्राप्त कर सकता अर्थात् प्रकृति के जैसे १६ विकार होते हैं वैसे इसके कोई भी विकार नहीं होते ॥३१९॥ गर्भस्य किंकिं विशिष्टोपकारकं तदाह- अग्नीषोमौ मही वायुर्नभः सत्त्वं रजस्तमः । पञ्चेन्द्रियाणि भूतात्मा गर्भं सञ्जीवयन्ति हि ।।३२०।। ❖ गर्भ के विशेष उपकारक—अग्नि, सोम, पृथ्वी, वायु, आकाश, सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण, पाँच इन्द्रियाँ और भूतात्मा ये सब गर्भ का संजीवन करते हैं अर्थात् इन्हीं सबों से गर्भ उत्पन्न और रक्षित तथा वर्धित होता है ॥३२०॥ ❖ अग्निरत्र-पाचकालोचक रञ्जक भ्राजकसाधकानाम्; तथा पाञ्चभौतिकानां तथा सप्तधातुगतानामग्नीनां शक्तिरूपतयाऽवस्थितो वाचोऽधिदेवत्वं प्राप्तो बोद्धव्यः, सच पाचकादिकर्मणा जीवयति । सोमश्च- पञ्चात्मकश्लेष्मरसशुक्रादीनां २तोयात्मकानां भावानां रसनेन्द्रियस्य३ च शक्तिरूपतयाऽवस्थितो मनसश्चाधिदेवत्वं १. कोष्ठस्थः पाठ क्वाचित्कः । २. सोमे'ति पा.। ३. 'रसे'ति पा. ।