भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९३ गर्भवृद्धि के हेतु—गर्भस्थ सन्तान के नाभिमध्य में एक ज्योतिःस्थान रहता है। वायु उसी स्थान को आध्मापित (उत्तेजित) किया करता है अत एव उस गर्भ की वृद्धि हुआ करती है। अर्थात्-वायु ऊष्मा से युक्त होकर आधमन (फूँक) के द्वारा सन्तान के सम्पूर्ण स्रोतों के ऊपर नीचे और इधर-उधर सभी भागों में जैसे-जैसे दारित (विस्तारित) करता जाता है वैसे-वैसे सन्तान के देह की भी वृद्धि हुआ करती है ॥३२३-३२४॥ ❖ यथा दारयति विस्तारयति १तथा देहो बर्धत इति पूर्वेणान्वयः ।।३२३-३२४।। यहाँ पर ३२४ के श्लोक की टीका में जो 'जैसे दारित अर्थात् विस्तारित करता जाता है वैसे सन्तान के' इतना अंश है इसका पूर्व में ३२३ के 'श्लोक की टीका में' जो 'देह की वृद्धि हुआ करती है' यह अंश है उसके साथ अन्वय है ऐसा समझना चाहिये ॥३२३-३२४॥ दृष्टिरोमकूपानामवृद्धिमाह- दृष्टिश्च रोमकूपाश्च न वर्धन्ते कदा च न । ध्रुवाण्येतानि मर्त्यानामिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।३२५।। दृष्टि मण्डल तथा रोमकूपों की वृद्धि निषेध—मनुष्यों के दृष्टिमण्डल तथा सम्पूर्ण रोमकूप, कभी नहीं बढ़ते अर्थात् अन्यान्य अङ्ग और उपाङ्ग सभी क्रमशः बढ़ते रहते हैं पर दृष्टिमण्डल तथा रोमकूप ये सब सदा एक भाव से ही रहते हैं। ऐसे 'धन्वन्तरि' भगवान् का मत है ॥३२५॥ नखकेशानां सदा वृद्धिमाह- शरीरे क्षीयमाणेऽपि वर्धेत द्वाविमौ सदा । स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ।।३२६।। नख और केशों की वृद्धि में हेतु—शरीर के क्षीण हो जाने पर भी नख और केश ये दोनों सदा बढ़ते ही रहते हैं क्योंकि इन दोनों की ऐसी ही स्थिति (मर्यादा) होती है कि—अपने-अपने स्वभाव को ही प्रकृति (कारण) करके नित्य बढ़ते रहते हैं। अर्थात् नख और केश के बढ़ने में उनका स्वभाव ही कारण है ॥३२६॥ ❖ प्रकृतिं कृत्वा=कारणं कृत्वा । स्थितिः=मर्यादा ।।३२६।। 'प्रकृतिं कृत्वा' से 'कारण करके' और 'स्थिति' से 'मर्यादा' अर्थ समझना चाहिये ॥३२६॥ चेतनाचेतनान्यङ्गान्याह- चेतनानामधिष्ठानां मनो देहश्च सेन्द्रियः । २केशलोमनखाग्रान्मलद्रवगुणैर्विना ।।३२७।। शरीर में चेतन तथा अचेतन अङ्ग—केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न के मल, द्रव (मल-मूत्रादि) और शब्दादि गुण को छोड़कर इन्द्रियों से युक्त समस्त देह और मन चेतना का अधिष्ठान है अर्थात् केशादि को छोड़कर इन्द्रिय, शरीर और मन में चेतना है ॥३२७॥ गर्भस्य वातविण्मूत्रोत्सगार्करणे कारणमाह- वाताल्पत्वादयोगाच्च वायोः पक्वाशयस्य च । वातमूत्रपुरीषाणि गर्भस्थो न विमुञ्चति ।।३२८।। गर्भ में मलादि त्याग न करने में कारण—वायु की अल्पता होने से तथा वायु और पक्वाशय का अयोग (स्वल्पसंयोग) होने से गर्भस्य सन्तान बात, मूत्र और पुरीष (मल) का त्याग नहीं करता है ॥३२८॥ १. 'तथा तथे'त्यधिकः पा.। २. 'केशलोमनखाग्रान्तर्मलद्रव्ये'ति पा.।