भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ अयोगात्=ईषद्योगात् ।।३२८।। 'अयोग' पद का 'स्वल्प योग (संयोग)' अर्थ समझना ।।३२८।। गर्भरोदने कारणमाह- जरायुणा मुखे छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते । वायुमार्गनिरोधाच्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ।।३२९।। गर्भस्थ सन्तान के रोदन न करने के कारण—गर्भस्थ सन्तान का मुख जरायु (गर्भ को वेष्टित करनेवाली झिल्ली) के द्वारा ढका रहने से तथा कण्ठ कफ से भरा रहने से वायु के आने-जाने का मार्ग रुका रहता है अत एव गर्भस्थ सन्तान रोदन नहीं करती है ।।३२९।। अथ गर्भवतीकृत्याकृत्यानि । तत्रादौ गर्भिणीकृत्यान्याह- गर्भिणी प्रथमार्दहः प्रहृष्टा भूषिता शुचिः । भवेच्छुक्लाम्बरधरा गुरुविप्रार्चने रता ।।३३०।। भोज्यं तु मधुरप्रायं स्निग्धं हृद्यं द्रवं लघु । संस्कृतं दीपनीयं तु नित्यमेवोपयोजयेत् ।।३३१।। गर्भवती स्त्रियों के कर्म—गर्भिणी स्त्री गर्भ के प्रथम दिन ही से प्रसन्न चित्त, भूषणों से भूषित, पवित्र और स्वच्छ वस्त्र को धारण करनेवाली और गुरुजन तथा ब्राह्मणों के पूजन में रत रहे और नित्य ही मधुर रस से युक्त स्निग्ध (घृतादिमिश्रित), हृदय को प्रिय, द्रव (पतला) लघु, संस्कृत (भली-भाँति हिंग, जीरा आदि से छौंक कर उत्तम बनाये हुये) और अग्नि को दीपन करने वाले भोज्य पदार्थों का भोजन करे ।।३३०-३३१।। अथ गर्भिण्या अकृत्यान्याह- गर्भिणी न तु कुर्वीत व्यायाममपतर्पणम् । व्यवायं च न सेवत न कुर्यादतितर्पणम् ।।३३२।। रात्रौ जागरणं शोकं यानस्यारोहणं तथा । रक्तमोक्षं वेगरोधं न कुर्यादुत्कटासनम् ।।३३३।। दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते । स स भागः शिशोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ।।३३४।। मलिनां विकृताकारां हीनाङ्गीं न स्पृशेत्स्त्रियम् । न जिघ्रेदपि दुर्गन्धं न पश्येन्नयनाप्रियम् ।।३३५।।