भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९५ और यदि करे भी तो बहुत थोड़ा और कोमल गद्दा वगैरह बिछाकर सोवे और शय्या तथा आसन अत्यन्त ऊँचा न रखे, अर्थात् ऐसा रखे कि जिस पर आराम से चढ़कर बैठ सके। गर्भिणी स्त्री अति यत्नपूर्वक पूर्वोक्त इन सब नियमों का पालन करे ।।३३२-३३९।। अथ प्रसवमासानाह- नवमे दशमे मासि नारी गर्भं प्रसूयते । एकादशे द्वादशे वा ततोऽन्यत्र विकारतः ।।३४०।। प्रसब का समय—नवम या दशवें मास में गर्भिणी स्त्री सन्तान प्रसव करती है और कभी-कभी ग्यारहवें या बारहवें मास में भी प्रसव करती है। यदि इससे अधिक समय हो जाय तो यह समझना चाहिये कि किसी रोगवश विलम्ब हो रहा है अर्थात् या तो गर्भ की जगह कोई रोग है अथवा गर्भ में कोई विकार हो गया है ।।३४०।। अथ सूतिकागृहाकृतिमाह- अष्टहस्तायतं चारुचतुर्हस्तविशालकम्। प्राचीद्वारमुदग्द्वारं¹ विदध्यात्सूतिकागृहम् ।।३४१।। प्रसूतिकागृह का स्वरूप—आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौड़ा एवं पूर्व अथवा उत्तर द्वार वाला देखने में सुन्दर सूतिका गृह का निर्माण करना चाहिये ।।३४१।। आसन्नप्रसवाया लक्षणमाह- जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघने नारी विज्ञेया प्रसवोत्सुका ।।३४२।। आसन्नप्रसवायास्तु कटीपृष्ठं तु सव्यथम् । भवेन्मुहुः प्रवृत्तिश्च मूत्रस्य च मलस्य च ।।३४३।। आसन्नप्रसवा के लक्षण—कुक्षि (कोख) शिथिल होने पर तथा हृदयबन्धन (सन्तान की नाभि-नाड़ी के साथ माता की रसवहन करनेवाली नाड़ी का बंधन) मुक्त होने पर एवं जघन-प्रदेश (स्त्री के कटि के नीचे का भाग) शूल की भाँति पीड़ा से युक्त होने पर गर्भिणी स्त्री प्रसव करने के लिये उत्सुक है ऐसा समझना चाहिये । आसन्नप्रसवा स्त्री की कमर और पीठ पीड़ा से युक्त होने लगती है तथा उसके मल और मूत्र की बारंबार प्रवृत्ति होती है ।।३४२-३४३।। अथासन्नप्रसवाया उपचारमाह- तैलेनाभ्यक्तगात्रान्तां संस्नातामुष्णवारिणा । यवागूं पाययेत्कोष्णां मात्रया घृतसंयुताम् ।।३४४।। आसन्नप्रसवा स्त्री के उपचार—आसन्नप्रसवा स्त्री के शरीर में भली-भाँति तैल की मालिश करके तथा गरम जल से स्नान करा के यथोचित मात्रा के साथ उसे कुछ कुछ गरम घी से युक्त यवागू पिलावे ।।३४४।। कृतोपधाने² मृदुनि विस्तीर्णे शयने शनैः । अभुग्नसक्थी चोत्ताना नारी तिष्ठेद्यथाऽन्विता ।। प्रसवव्यथा उपस्थित होने पर गर्भिणी स्त्री तकिया लगे हुये विस्तीर्ण कोमल शय्या पर दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से अर्थात् सटे हुए न रखकर उत्तान (चित) होकर धीरे-धीरे लेट जाय ।।३४५।। ❖ अभुग्नसक्थी=असङ्कोचितोरुः ।।३४५।। ‘अभुग्नसक्थी’ अर्थात् 'दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से रखकर' ।।३४५।। अथ जनयित्र्य आह- चतस्रोऽशंकनीयाश्च स्त्रावणे कुशला हिताः । वृद्धाः परिचरेयुस्ताः सम्यक्छिन्ननखाः स्त्रियः ।। १. 'प्राचीनद्वारान्युदग्द्वारमि'ति पा. । २. 'मृदुभिरि'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA