भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आसन्न प्रसवा की परिचारिका—प्रसव कराने में चतुर अशङ्कनीय (साहस युक्त), हिताकाक्षिणी एवं वृद्धा जो हों ऐसी चार स्त्रियाँ अपने अपने हाथ के बढ़े हुये नखों को भली भाँति कटाकर पीड़ायुक्त आसन्नप्रसवा स्त्री की परिचर्या करें ॥३४६॥ अथ जनयित्रीकृत्यमाह- अपत्यमार्गं तैलेन समभ्यज्य समन्ततः । एका तु तासु सुभगे प्रवाहस्तेति तां वदेत् ।। ३४७।। अव्यथा मा प्रवाहिष्ठाः प्रवाहेथा व्यथा यदि । प्रवाहेथाः शनैः पूर्वं प्रगाढं च ततः परम् ।। ३४८ ।। ततो गाढतमं गर्भे योनिद्वारमुपागते । अपरासहितो गर्भो यावत्पतति भूतले ।। ३४९।। जनयित्री स्त्रियों के करने योग्य कर्म—गर्भिणी स्त्री के योनिमार्ग के चारों तरफ तैल लगाकर भली-भाँति चिकनाहट से युक्त कर के जनयित्रियों के मध्य में से एक स्त्री उन (गर्भिणी) से कहे 'हे सुभगे ! प्रवाहण कर अर्थात् काँखो, किन्तु प्रसव सम्बन्धिनी व्यथा शान्त होने पर मत काँखो, यदि प्रसवव्यथा उपस्थित हो तो अवश्य काँखो और पहले धीरे धीरे काँखो, तदुपरान्त कुछ जोर से काँखो तथा काँखने से योनि के मुख पर सन्तान के उपस्थित हो जाने पर जब तक वह अपरा (जेर के साथ साथ) पृथ्वी पर न गिर पड़े तब तक अत्यन्त जोर से काँखो'। ये सब बातें गर्भिणी को समझा दें ॥३४७-३४९॥ व्यथारहितायाः प्रवहणाद्वैगुण्यमाह- मूकं वा बधिरं कुब्जं श्वासकासक्षयान्वितम् । सूते स्रस्ततनुं बालमकाले तु प्रवहणात् ।। ३५० ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे गर्भप्रकरणं तृतीयम् ।। ३ ।। प्रसवव्यथा से रहित गर्भिणी के कांखने से वैगुण्य—प्रसवव्यथा न रहने पर भी यदि गर्भिणी स्त्री प्रसव के लिये काँखे तो वह मूक, बधिर, कुब्ज (कुबड़ा), श्वास, कास से युक्त या शिथिल शरीर वाला बालक पैदा करती है ॥३५०॥ इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां तृतीयगर्भप्रकरणम् समाप्तम् ।। ३ ।।