भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नाकृष्य स्थापयेत्क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित्कार्ये विधिमावश्यकं विना।।३८।। बालक को खींच कर गोद में न लेवे तथा जल्दी से शय्या पर सुलावे, आवश्यक कार्य (तैल मालिश आदि) के विना किसी कार्य में कभी न रुलावे ॥३८॥ ❖ आवश्यको विधिः=भेषजदानतैलाभ्यङ्गोद्वर्त्तनादिः ।।३८।। 'आवश्यको विधिः' अर्थात् 'औषध देना, तेल लगाना, उबटन लगाना' आदि ।।३८।। तच्चित्तमनुवर्तेत तं सदैव fly/अनुमोदयेत्। (१वातातपतडिद्वृष्टिधूम्रानलजलादितः) निम्नोच्चस्थानतश्चापि रक्षेद्बालं प्रयत्नतः ।।३९।। बालक के मन के अनुसार चले तथा उसे सदा प्रसन्न रखे एवं वायु, घाम, बिजली, वर्षा, धूम, अग्नि, जल आदि से तथा नीचे-ऊँचे स्थानों से भी उसे यत्न पूर्वक बचाता रहे ॥३९॥ अथ बालस्य स्वभावतो हितान्याह- अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानं नेत्रयोरञ्जनं तथा- वसनं मृदु यत्तच्च तथा मृद्वनुलेपनम्। जन्मप्रभृति पथ्यानि बालस्यैतानि सर्वथा ।।४०।। बालकों के लिये हितकर—तेल मालिश करना, उबटन लगाना, नहलाना, नेत्रों में अञ्जन लगाना, कोमल वस्त्र पहराना और मृदु पदार्थों का लेप करना, ये सब बालकों के लिये जन्म से ही हितकर होते हैं ।।४०।। अथ बालस्य कवलादेः समयमाह- कवलः पञ्चमाद्वर्षादष्टमान्नास्यकर्म च। विरेकः षोडशाद्वर्षाद्विंशतेश्चैव मैथुनम् ।।४१।। बालकों के कवलादि करने का समय—पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने के उपरान्त औषधों का कवल धारण करने का समय होता है तथा आठ वर्ष की अवस्था के बाद नास लेने का, सोलह वर्ष की अवस्था के बाद विरेचन (जुलाब लेने) का और बीस २० वर्ष की अवस्था के बाद मैथुन करने का समय प्रशस्त होता है। इन समयों से पहले यदि पूर्वोक्त कवलादिकों का प्रयोग कराया जाय तो हानि होती है ।।४१।। अथ बाल्यादेरवधिमाह सुश्रुतः- वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।।४२।। त्रिविधः सोऽपि दुग्धाशी दुग्धान्नाशी तथाऽन्नभुक्। दुग्धाशी वर्षपर्यन्तं दुग्धान्नाशी शरद्द्वयम् ।।४३।। तदुत्तरं स्यादश्नाशी एवं बालस्त्रिधा मतः। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः ।।४४।। २चतुर्धा मध्यमं वृद्धिद्युवपूर्णक्षयान्वितम्। भवेदाविंशतेर्वृद्धिर्युवा त्वान्त्रिंशतो मतः ।।४५।। सुश्रुतोक्त बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा—अवस्था तीन प्रकार की होती है, (१) बाल्यावस्था, (२) मध्यावस्था और (३) वृद्धावस्था, उनमें मनुष्य जब तक सोलह वर्ष से कम अवस्था का होता है तब तक उसकी बाल्यावस्था कहलाती है अतः वह बालक कहा जाता है और वह बालक भी तीन प्रकार का होता है, (१) दूध पीने वाला, (२) दूध पीने और अन्न खाने वाला तथा (३) केवल अन्न खानेवाला, उसमें एक वर्ष तक केवल दूध पीने वाला, दो वर्ष तक दूध तथा अन्न खानेवाला और उसके बाद १५ वर्ष तक केवल अन्न खाने वाला, इस प्रकार के बालक होते हैं। पण्डित लोग १६ वर्ष से लेकर ७० वर्ष के मध्य की अवस्था को मध्यावस्था कहते हैं। वह चार प्रकार की होती १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. क्वचित् 'चतुर्धा मध्यमं प्राह युव द्वात्रिंशतो मतः' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA