भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०१ अथ स्तन्याभिमन्त्रणमाह- क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः । सदैव सुभगो बालो भवत्वेष महाबलः ।।३३।। पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने ! । दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राप्यामृतं यथा ।।३४।। दूध अभिमन्त्रित करने के उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ- क्षीर समुद्र तुम्हारे दोनों स्तनों में दूध भरनेवाला हो तथा उसी दूध के पीने से यह बालक सदा सौभाग्यशाली और अत्यन्त बलवान् होवे और हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता लोगों ने अमृतपान करके दीर्घ आयु प्राप्त किया, उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी अमृत के समान इस दूध को पीकर दीर्घ आयु को प्राप्त करे ।।३३-३४।। इमौ मन्त्रौ पित्रा अन्येन वा ब्राह्मणेन पठनीयौ । यावत् मन्त्रपाठस्तावद् मात्रा धात्र्या वा दक्षिणहस्तेन ('दक्षिण) स्तनस्पर्शः कार्यः ।।३३-३४।। उपर्युक्त दोनों मन्त्रों का पिता अथवा दूसरा कोई ब्राह्मण पाठ करे और जब तक मन्त्र का पाठ हो तब तक माता या धात्री जो हो वह दक्षिण हाथ से दक्षिण स्तन का स्पर्श करती रहे ।।३३-३४।। क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा । दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।।३५।। स्तन्य के अभाव में गो अथवा बकरी के दुग्ध- यदि माता के स्तन में दूध न हो तथा कोई धात्री भी न मिले तो जितने दिन तक माता के स्तनों में अच्छी तरह दूध न उतर आवे अथवा जब तक दूध पीने की योग्यता होवे तब तक उपयुक्त मात्रा में बालक को बकरी अथवा गाय का दूध पिलावे, क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य (प्रकृत्यनुकूल) होता है ।।३५।। ❖ क्षीरसात्म्यतयेति । यतः शिशोः क्षीरमेव सात्म्यं भवति न त्वन्नादिकम् । आस्तन्यपर्याप्तेरिति । यावत् स्त्रियाः स्तन्यस्य समन्ततोभावेन प्राप्तिर्भवति । अथवा यावत् स्तन्यपानस्य योग्यता भवेदित्यर्थः ।।३५।। 'बालक को बकरी या गाय का दूध ही पिलाना चाहिये क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य होता है न कि अन्नादि' इसी भाव को व्यक्त करने के लिये मूल में 'क्षीरसात्म्यतया' यह पद दिया गया है तथा 'जब तक स्त्री के स्तनों में भली भाँति दूध न उत्तर आवे और जब तक दूध पीने की योग्यता रहे' यह भाव व्यक्त करने के लिये 'आस्तन्यप्राप्तेः' यह पद दिया गया है ।।३५।। अथ बालस्यान्नप्राशनसमयमाह- यथोक्तविधिना बालं मासि षष्ठेऽष्टमेऽपि च । अन्नं सम्प्राशयेत्किञ्चित्ततस्तद्वर्धयेत्क्रमात् ।।३६।। अन्नप्राशन का समय- छठें अथवा आठवें मास में शास्त्रोक्त विधि से बालक को थोड़ा सा अन्न प्रथम चटावे, उसके बाद अवस्था वृद्धि के अनुसार अन्न की मात्रा थोड़ी थोड़ी बढ़ावे ।।३६।। अथ बालस्य परिचर्याविधिमाह- बालमङ्कं सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत्क्वचित् । सहसा बोधयेन्नैव नायोग्वमुपवेशयेत् ।।३७।। बालक की परिचर्या- बालक को जिस तरह से दुःख न हो उस तरह उठा कर गोदी में रखे और उसको कभी नहीं डरावे तथा सोते हुये उसको सहसा जगावे भी नहीं और यदि अयोग्य हो तो बैठावे भी नहीं ।।३७।। अयोग्यमुपवेशनासमर्थम् ।।३७।। 'अयोग्य' पद का 'बैठने में असमर्थ' यह अर्थ करना चाहिये ।।३७।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।