भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 1167 में से

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अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०३ है—(१) वृद्धि की अवस्था है, (२) युवावस्था, (३) पूर्णावस्था और, (४) क्षीणावस्था, इनमें से बीस वर्ष तक वीर्यादि की वृद्धि होने से यह वृद्धि की अवस्था कहलाती है तत्पश्चात्, तीस वर्ष तक की युवावस्था कहलाती है ॥४२-४५॥ चत्वारिंशत्समा यावत्तिष्ठेद्वीर्यादिपूरितः । ततः क्रमेण क्षीणः स्याद्यावद्भवति सप्ततिः ॥४६॥ ४० वर्ष तक पूर्णावस्था कहलाती है क्योंकि इस अवस्था तक शरीर में वीर्यादि पूर्ण बने रहते हैं । उसके बाद क्रम-क्रम से जब तक ७० वर्ष की अवस्था होती है तब तक वीर्यादि क्षीण हो जाते हैं अत एव यह क्षीणावस्था कहलाती है ॥४६॥ ❖ वीर्यादीत्यादिशब्देन रसादिसर्वधात्विन्द्रियबलोत्साहा उच्यन्ते । क्षीणः=सर्वधात्विन्द्रियब- लोत्साहैर्हीनः ।।४६।। ‘वीर्यादिपूरितः’ इस पद में स्थित ‘आदि’ शब्द से ‘रस रक्तादि सम्पूर्ण धातु, इन्द्रियों का बल और उत्साह पूर्ण बने रहते हैं’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये और ‘क्षीण’ पद से ‘सम्पूर्ण रसादि धातु तथा इन्द्रियों का बल एवं उत्साह से हीन’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४६॥ ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं क्षीणधातुरसादिकः । क्षीयमाणेन्द्रियबलः क्षीणरेता दिने दिने ॥४७॥ वलीप लितखालित्ययुक्तः कर्मसु चाक्षमः । कासश्वासादिभिः क्लिष्टो वृद्धो भवति मानवः ॥४८॥ उसके बाद ७० वर्ष से ऊपर की अवस्था होने पर मनुष्यों के धातु, रस रक्तादि क्षीण होते हैं और दिनों दिन इन्द्रियों का बल क्षीण होता जाता है तथा शुक्र भी क्षीण हो जाता है और तब वह बली (झुर्री) पलित (बालों का सफेद होना) और खालित्य (शिर के बालों का झड़जाना) से युक्त तथा इन्द्रियों के द्वारा कार्य करने में असमर्थ हो जाना है एवं कास, (खाँसी) और श्वास आदि रोगों से पीड़ित रहता है अतएव सत्तर वर्ष की अवस्था के बाद मनुष्य वृद्ध कहलाता हैं ॥४७-४८॥ बाल्ये विवर्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम् । वार्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।।४९।। बाल्यावस्था में कफ की वृद्धि रहती है, मध्यावस्था में पित्त का आधिक्य रहता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता है अत एव वैद्य को इसका विचार करके रोगी की चिकित्सा करनी चाहिए ॥४९॥ उपक्रमेत्=चिकित्सेत् ।।४९।। ‘उपक्रमेत्’ का ‘चिकित्सा करनी चाहिये’ ? यह अर्थ होता है ॥४९॥ तन्त्रान्तरे तु- १बाल्यं वृद्धिश्छविर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रंविक्रमौ । बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं२ दशतो ह्रसेत् ।।५०।। दूसरे ग्रन्थों में तो यह लिखा है कि—बाल्य (लड़कपन), वृद्धि (रस रक्तादि का बढ़ना), छवि (देह की कान्ति), मेधा (धारण करनेवाली बुद्धि), त्वक् (चमड़ा), दृष्टि (देखने की शक्ति), शुक्र, विक्रम, बुद्धि, कर्मेन्द्रिय (हाथ पैर आदि), चित्त और जीवन ये सब यथा क्रम से प्रति १० वर्ष के व्यतीत होने पर ह्रास को प्राप्त होते हैं अर्थात्-प्रथम दश वर्ष के बाद बाल्य द्वितीय दश (बीस) वर्ष बाद वृद्धि, तृतीय दश (तीस) वर्ष के बाद छवि इत्यादि क्रम से ह्रास को प्राप्त होते हैं ॥५०॥ अथ प्रकृतिलक्षणान्याह- सप्त प्रकृतयो नृणां वातात्पित्तात्कफात्तथा । संसर्गात्सन्निपाताच्च भवन्ति भिषजां मते ।।५१।। १. ‘बाल्यादि’ति पा. । २. ‘क्रमत’ इति पा. ।

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