भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे शुक्रशोणितसंयोगे यो दोषस्तूतकटो भवेत्। प्रकृतिर्जायते तेन तस्या लक्षणमुच्यते ।।५२।। प्रकृतियों के लक्षण—वैद्यों के मत से सात प्रकार की मनुष्यों की प्रकृति होती है। उसमें वात से वात-प्रकृति १, पित्त से पित्त-प्रकृति २, कफ से कफ-प्रकृति ३, दो दोषों के मेल से द्वन्द्व-प्रकृति अर्थात् वातपित्त-प्रकृति ४, वातकफ-प्रकृति ६ और तीनों दोषों से सान्निपातिक-प्रकृति ७ होती है। गर्भाधान के समय माता पिता के शुक्र और रज के संयोगकाल में जिन दोषों की अधिकता रहती है उन्हीं दोषों के अनुसार मनुष्यों को प्रकृतियाँ होती हैं। अन्य प्रकृतियों के लक्षण आगे कहते हैं ।।५१-५२।। वाग्भटे तु आत्रेयादयः- शुक्रा सृग्गर्भिणीभोज्यचेष्टागर्भाशयार्त्तिषु¹। यः स्याद्दोषोऽधिकस्तेन ²प्रकृतिः सप्तधोदिता ।। इसी विषय में 'आत्रेयादि महर्षि' 'वाग्भट' नामक ग्रन्थ में तो ऐसा कहते हैं कि—शुक्र, शोणित (रज), गर्भिणी स्त्रियों के भोज्य पदार्थ और चेष्टायें तथा गर्भाशय की पीड़ा इन सबों में जिन दोषों की अधिकता होती है उन दोषों के अनुसार ही मनुष्यों की सात प्रकार की प्रकृति उत्पन्न होती है ।।५३।। ❖ सोऽपि दोषः स्वभावावस्थितो न तु दुष्टः, दुष्टेन तु शुक्रशोणितयोर्दुष्टौ शुद्धगर्भासम्भवात् ।।५३।। शुक्र शोणितादिगत जो अधिक दोष होते हैं उनके द्वारा प्रकृति का उत्पन्न होना जो कहा गया है उसमें दोष पद से दुष्टता की प्राप्त दोषों को नहीं समझना चाहिये किन्तु जो अपने स्वभाव में स्थित हों उन्हीं को प्रकृति का उत्पादक समझना चाहिये। क्योंकि दोषों के दुष्ट होने पर उनके द्वारा शुक्र और शोणित की भी दुष्टि हो जाती है और उन दोनों की दुष्टि से 'शुद्ध गर्भ की उत्पत्ति हो नहीं सकती अतः सर्वथा निर्दुष्ट दोषों ही को प्रकृति का उत्पादक समझना चाहिये ।।५३।। अथ वातादिप्रकृतयस्तत्रादौ वातप्रकृतिलक्षणमाह- जागरूकोऽल्पकेशश्च स्फुटिताङ्घ्रिकरः कृशः। शीघ्रगो बहुवाग्रूक्षः स्वप्ने वियति गच्छति ।। एवंविधः स विज्ञेयो वातप्रकृतिको नरः ।।५४।। वात-प्रकृति के लक्षण—जागनेवाला, अल्पकेशों से युक्त, फटे हुये हाथ-पैरवाला, दुबला-पतला, शीघ्र चलनेवाला तथा बहुत बोलनेवाला एवं रूखे शरीर वाला और स्वप्न में आकाश में गमन करनेवाला जो मनुष्य होता है उसे वात-प्रकृति वाला समझना चाहिये ।।५४।। अथ पित्तप्रकृतिलक्षणमाह- पित्तप्रकृतिको लोको यादृशोऽथ निगद्यते । अकालपलितो गौरः क्रोधी स्वेदी च बुद्धिमान् ।।५५।। बहुभुक्ताम्रनेत्रश्च³ स्वप्ने ज्योतींषि पश्यति। एवंविधो भवेद्यस्तु पित्तप्रकृतिको नरः ।।५६।। पित्त प्रकृति के लक्षण—बिना वृद्धावस्था आये ही जिसके बाल सफेद हो जायँ, और जो गौर वर्ण का तथा क्रोधी हो, शरीर से पसीना अधिक निकले, बुद्धिमान्, बहुत भोजन करने वाला, ताम्र के वर्ण के समान नेत्रवाला और स्वप्न में सूर्य, बिजली आदि ज्योति से युक्त पदार्थों का देखनेवाला हो उसे पित्त प्रकृति वाला समझना चाहिये ।।५५-५६।। १. 'गर्भाशयान्तरे' इति पा.। २. 'सर्वथोदिते'ति पा.। ३. 'बहुभोक्ताऽस्रे'ति पा.।