भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०५ अथ श्लेष्मप्रकृतिलक्षणमाह- श्यामकेशः क्षमी स्थूलो बहुवीर्यो महाबलः । स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः ॥५७॥ कफ प्रकृति के लक्षण-काले बालों वाला, क्षमाशील, स्थूल शरीरवाला, वीर्यशाली, अत्यन्त बलवान् और स्वप्न में जलाशय (नदी, तालाब आदि) को देखनेवाला, जो मनुष्य हो उसे कफ प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५७॥ अथ द्वन्द्वजत्रिदोषजप्रकृतिलक्षणमाह- दृश्यते प्रकृतौ यत्र रूपं दोषद्वयस्य तु । द्विसंसर्गेण जानीयात्सर्वलिङ्गैस्त्रिदोषजम् ।।५८।। द्वन्द्वज तथा त्रिदोषज प्रकृति के लक्षण-जिसकी प्रवृत्ति में दो दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे द्वन्द्वज और जिसकी प्रकृति में तीन दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे त्रिदोषज-प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५८॥ अथ वातप्रकृतिलक्षणानि वाग्भटे- १विभुत्वादाशुकारित्वाद्बलित्वादन्यकोपनात्२ । स्वातन्त्र्याद्बहुरोगत्वाद्दोषणां प्रबलोऽनिलः ।।५९।। प्रायोऽत३ एव पवनाध्युषिता मनुष्या दोषात्मकाः स्फुटितधूसरकेशगात्राः ।। शीतद्विषश्चलधृतिस्मृतिबुद्धिचेष्टासौहार्ददृष्टिगतयोऽतिबहुप्रलापाः ।।६०।। अल्पपित्तबलजीवितनिद्राः सन्नसक्तचलजर्जरवाचः । नास्तिका बहुभुजः सविलासा गीतहास्यमृगयाकलिलोलाः ।।६१।। मधुराम्लपटूष्णसात्म्यकांक्षाः कृशदीर्घकृतयः सशब्दयाताः । न दृढा न जितेन्द्रिया न चार्या न च कान्तादयिता बहुप्रजा वा ।।६२।। ४नेत्राणि चैषां खरधूसराणि वृत्तान्यचारूणि मृतोपमानि । उन्मीलितानीव भवन्ति सुप्ते शैलद्रुमांस्ते गगनं च यान्ति ।।६३।। अधन्या मत्सराष्माताः स्तेना प्रोद्बद्धपिण्डिकाः । श्वशृगालोष्ट्रगृध्राखुकाकानूकाश्च वातिकाः ।।६४।। वाग्भटोक्त वात-प्रकृति के लक्षण-विभु (व्यापक) तथा शीघ्रकारी होने से एवं बली तथा दूसरे को कुपित करनेवाला और स्वतन्त्र तथा बहुत रोगों को उत्पन्न करनेवाला होने से सम्पूर्ण दोषों के मध्य में वायु सबसे प्रबल होता है, अत एव वात-प्रकृतिवाले मनुष्य प्रायः दोषों (अवगुणों) से युक्त होते हैं, उनके शरीर और केश फटे हुये तथा धूसर वर्ण के होते हैं और वे शीत से द्वेष रखने वाले होते हैं, उन सबों की धृति (धैर्य), शक्ति, बुद्धि, चेष्टा, मित्रता, दृष्टि और गति चञ्चल होती है, एवं वे बहुत बोलनेवाले होते हैं, उनमें पित्त, बल, जीवन और निद्रा ये सब थोड़ी मात्रा में होते हैं और वे सायँ-साँय टूटे फूटे, जल्दी से हकला कर बोलने वाले, नास्तिक, बहुत भोजन करने वाले, बिलास से युक्त, गान, हँसी (मजाक), शिकार, कलह, इन सबों में आसक्त होते हैं। उन सबों को मीठा, खट्टा, नमकीन और गर्म पदार्थ ही सात्म्य (हितकर) होते हैं तथा इन्हीं पदार्थों के खाने की इच्छा भी होती है। वे पतले तथा लम्बे शरीरवाले होते हैं और उनके चलने में शब्द होता है तथा वे न तो दृढ़, न जितेन्द्रिय, न सज्जन, न स्त्रियों के प्रिय और न बहुत सन्तानवाले ही होते हैं और उन सबों के नेत्र तीक्ष्ण धूसर वर्ण वाले, गोल, देखने में भयङ्कर तथा सोने पर भी मुर्दे के समान कुछ खुले हुये होते हैं और वे स्वप्न में पर्वत तथा वृक्ष के ऊपर एवं आकाश में गमन करते हैं। वे भाग्यहीन, मत्सरता से युक्त अर्थात् दूसरे का भला न देख सकनेवाले और चोर होते हैं तथा उनके पाँवों की पिण्डलियाँ गाँठदार होती हैं। वातप्रकृति वाले मनुष्यों का स्वभाव कुत्ता, स्यार, ऊँट, गृध्र, चूहा और उल्लू पक्षी के सदृश होता है। यहाँ पर सर्वत्र 'अनूक' पद का 'स्वभाव' अर्थ समझना चाहिये ॥५९-६४॥ १. 'कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः' । २. 'अल्पकोपनादि'ति पा. । ३. 'प्रायस्य एवे'ति पा. । ४. 'अक्षीणी'ति पा. ।