भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ पित्तप्रकृतिलक्षणान्याह- पित्तं वह्निर्वह्निजं वा यदस्मात्पित्तोद्रिक्तस्तीक्ष्णतृष्णाबुभुक्षः । गौरोष्णाङ्गस्ताम्रहस्ताङ्घ्रिवक्त्रः १ शूरो मानी पिङ्गकेशोऽल्परोमा ॥ ६५॥ दयितमाल्यविलेपनमण्डनः सुचरितः शुचिराश्रितवत्सलः । विभवसाहसबुद्धिबलान्वितो भवति भीषु गतिर्द्विषतामपि ॥६६॥ मेधावी प्रशथिलसन्धिबन्धमांसो नारीणामनभिमतोऽल्पशुक्रकामः । आवासः २ पलिततरंगनीलिकानां भुक्तान्नं मधुरकषायतिक्तशीतम् ॥ ६७॥ घर्मद्वेषी स्वेदनः पूतिगन्धिर्भूर्युच्चारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः । सुप्तं पश्येत्कर्णिकारान् पलाशान् दिग्दाहोल्काविद्युदर्कानलांश्च ॥ ६८॥ तनूनि पिङ्गानि चलानि चैषां तन्वल्पपक्षाणि हिमप्रियाणि । क्रोधेन मद्येन रवेश्च भासा रागं व्रजन्त्याशु विलोचनानि ॥६९॥ मध्यायुषो मध्यबलाः पण्डिताः क्लेशभीरवः । व्याघ्रर्क्षकपिमाजार्वृकानूकाश्र पैत्तिकाः ॥७०॥ वाग्भटोक्त पित्तप्रकृति के लक्षण—पित्त स्वयं अग्नि अथवा अग्नि से उत्पन्न है अतः पित्तप्रकृतिवालों को भूख- प्यास अधिक लगती है। वे गौर वर्ण तथा गरम शरीरवाले होते हैं, उनके हाथ पैर और मुख ताम्र वर्ण के होते हैं। वे शूर, मानी, पीले केशवाले तथा थोड़े रोगों से युक्त होते हैं और उनको पुष्पों की माला, चन्दनादि का लेप और आभूषण प्रिय लगते है। वे सुन्दर चरित्र वाले, पवित्र, आश्रितों के ऊपर पुत्र की भाँति प्रेम रखनेवाले, धन, साहस, बुद्धि तथा बल से युक्त, भय का विषय उपस्थित होने पर शत्रुओं को भी शरण देने वाले और मेधावी होते हैं। उनके मांस तथा सन्धियों के बन्धन शिथिल होते हैं, वे स्त्रियों के प्रिय नहीं होते, क्योंकि उनमें शुक्र तथा कामचेष्टा कम होती है और वे पलित (बालों की सफेदी), झुरीं, और नीलिका रोगों के निवासस्थान तथा मीठा, कसैला, तीता और शीतल भोजन करनेवाले एवं घर्म (धूप) के साथ द्वेष करनेवाले होते हैं और उनके शरीर से स्वेद (पसीना) अधिक निकलता है तथा दुर्गन्ध आता है। उनमें विष्ठादि मल, क्रोध, पान (मद्यादि का पीना), भोजन व ईर्ष्या इन सबों की मात्रा अधिक रहती है। वे स्वप्न में कनेर, पलाश, दिशाओं का जलना, उल्का, बिजली, सूर्य और अग्नि को देखते हैं उनके नेत्रों के पलकों के ऊपर के रोम पतले और थोड़े होते हैं। उनकी आँखें पीली, चञ्चल शीत को पसन्द करनेवाली लम्बी, क्रोध, मद्य, तथा सूर्य की किरणों से शीघ्र रक्त वर्ण हो जाने वाली होती है। वे मध्यम आयु तथा बलवाले, पण्डित, क्लेश से डरने वाले और व्याघ्र, भालू, बन्दर, बिलार तथा भेड़िया के सदृश स्वभाववाले होते हैं ॥ ६५-७०॥ अथ कफप्रकृतिलक्षणान्याह- श्लेष्मा सोमः श्लेष्मलस्तेन सौम्यो गूढस्निग्धश्लिष्टसन्ध्यस्थिमांसः । क्षुत्तृड्दुःखक्लेशघमैर्रतप्तो बुद्ध्या युक्तः सात्त्विकः सत्यसन्धः ॥ ७१॥ प्रियंगुदूर्वाशरकाण्डदर्भगोरोचनापद्मसुवर्णवर्णः । प्रलम्बबाहुः पृथुपीनवक्षामहाललाटो घननीलकेश ॥७२॥ मृद्वङ्गः समसुविभक्तचारुदेहो ३बह्वोजोरतिरसशुक्रपुत्रमृत्यः । धर्मात्मा वदति न निष्ठुरं च जातु प्रच्छन्नं वहति दृढं चिरं च वैरम् ॥ ७३॥ १. 'हस्तादियुग्म' इति 'हस्ताङ्घ्रिचक्षु'रिति च पा.। २. 'आवासः पलितव्यङ्गनीलिकानामि'ति पा.। ३. 'बह्वाजा रतिरसयुक्त सपुत्रभृत्य' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA