भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०७ समदद्विरेन्द्रतुल्ययातो जलदाम्भोधिमृदङ्गसिंहघोषः । स्मृतिमानभियोगवान्विनीतो न च बाल्येऽप्यतिरोदनो न लोलः ।।७४।। तिक्तं कषायं कटुकोष्णरूक्षमल्पं स भुंक्ते बलवांस्तथाऽपि । रक्तान्तसुस्निग्धविशालदीर्घसुव्यक्तशुक्लासितपक्ष्मलाक्षः ।।७५।। अल्पव्याहारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः प्राज्यायुर्वित्तो दीर्घदर्शी वदान्यः । श्राद्धो गम्भीरः स्थूललक्ष्यः क्षमाया-नार्योन्निद्रालुर्दीर्घसूत्रः कृतज्ञः ।।७६।। ऋजुर्विपश्चित्सुभगः सलज्जो भक्तो गुरूणां स्थिरसौहृदश्च । स्वप्ने सपद्मान्सविहङ्गमालास्तोथाशयान्यश्यति तोयदांश्च ।।७७।। ब्रह्मरुद्रेन्द्रवरुणतार्क्ष्यहंसगजाधिपैः । श्लेष्मप्रकृतस्तुल्यास्तथा सिंहाश्वगोवृषः ।।७८।। वाग्भटोक्त कफप्रकृतिवालों के लक्षण- कफ सोमात्मक पदार्थ है, अतः कफ प्रकृति वाला मनुष्य सौम्य होता है। उसके सन्धि, अस्थि और मांस गूढ, स्निग्ध और परस्पर मिले हुये रहते हैं और वह भूख, प्यास, दुःख और क्लेश के धर्मों से सन्तप्त नहीं होता, वह बुद्धि से युक्त, सत्त्व गुण वाला, सत्यप्रतिज्ञ (अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने वाला) होता है। उसका वर्ण प्रियङ्गु, दूब, मूंज, कुशा, गोरोचन, कमल और सुवर्ण के समान होता है। उसकी बाहें लम्बी, ललाट चौड़ा और वक्षःस्थल चौड़ा तथा मोटा, केश घने तथा काले, अङ्ग कोमल और शरीर सम, सुविभक्त (अच्छी तरह से प्रत्येक अवयवों का विभाग हुआ) और सुन्दर होता है। उसमें ओज, रति, रस, शुक्र, पुत्र और भृत्य इनका आधिक्य रहता है। वह धर्मात्मा, कभी निष्ठुर वचन नहीं बोलने वाला दृढ़ तथा चिरकाल तक गुप्त रूप से वैर रखनेवाला होता है। उसका गमन मतवाले हाथी के समान, कण्ठस्वर मेघ, समुद्र, मृदङ्ग और सिंह के शब्द के समान गम्भीर होता है। वह स्मरण शक्ति-वाला, उद्योगी, विनय से युक्त और लड़कपन में भी न अत्यन्त रोने वाला और न चञ्चलता से रहने वाला होता है। वह यद्यपि तीता, कसैला, कड़ुआ, गरम, रूखा तथा थोड़ा भोजन करता है तथाऽपि बलवान् होता है। उसके दोनों नेत्र प्रान्त भागों में रक्त वर्ण से युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, बड़े और लम्बे शुक्ल तथा कृष्ण मण्डल जिसमें भलीभाँति से व्यक्त हो रहे हैं तथा सुन्दर नेत्र-लोमों (बरौनी) से युक्त होते हैं। वह बातचीत, क्रोध, पान, भोजन और ईर्ष्या इन सबों की थोड़ी मात्रा में करता है। वह बहुत आयु तथा धन से युक्त, दूर तक विचार करने वाला, उदार, श्रद्धा से युक्त, गम्भीर, क्षमाशील, श्रेष्ठ, अधिक सोनेवाला, दीर्घसूत्र (प्रारम्भ किये हुये कर्म को बहुत देर में समाप्त करने वाला) और कृतज्ञ होता है। वह सरल चित्त, विद्वान्, सुभग (देखने में सुन्दर या अच्छा ऐश्वर्यवान्), गुरुजनों की भक्ति रखनेवाला, स्थिर मंत्री रखने वाला, स्वप्न में कमल और पक्षियों के वृन्द से युक्त जलाशय तथा मेघ को देखने वाला होता है और कफ-प्रकृतिवाले मनुष्य ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, गरुड़, हंस, गजेन्द्र, सिंह, घोड़ा, गौ और बैल के सदृश स्वभाव से युक्त होते हैं ॥७१-७८॥ ननु प्रकृतिहेतूनां मध्ये योऽधिकः स स्वव्याधीन्कथं न करोतीत्याशंकायामाह- विषजाता यथा कीटो न विषेण प्रबाध्यते । तद्वत्प्रकृतयो मर्त्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ।।७९।। प्रकृति के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं, उनके मध्य में जो अधिक होता है उसी के अनुसार प्रकृति होती है तो वही दोष अपनी प्रकृतिवाले मनुष्यों में अपने से उत्पन्न होनेवाली व्याधियों को क्यों नहीं उत्पन्न करता ? इस शङ्का का उत्तर यह है कि-विष से उत्पन्न हुये कीड़े जैसे विष से पीड़ित नहीं होते, उसी प्रकार वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को वातादि दोष पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं ।।७९।। ❖ एतौ द्वौ नञौ अपि ईषदर्थे । तेन विषेण विषजदाहादिना ईषत् प्रबाध्यते, न तु भृशम् । तथा च प्रकृतयः प्रकृतिहेतवो दोषा बाधितुं न शक्नुवन्ति । करचरणस्फुटितत्व स्वेदनिद्राऽऽधिक्यादिना ईषद्व बाधितुं शक्नुवन्त्येव, न ज्वरादिभिः ।।७९।।