भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१०८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ पर मूल में जो दो स्थलों पर 'नञ्' (नहीं) शब्द का प्रयोग आया है वहाँ पर उन दोनों को 'थोड़े' इस अर्थ में प्रयोग हुआ है ऐसा समझना चाहिये, अत एव 'विष से पीड़ित तो नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'विष से होनेवाले दाहादिक से किञ्चिन्मात्र ही पीड़ित होते हैं न कि अधिक मात्रा में ऐसा समझना चाहिये । तथा 'वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को तत्तत् प्रकृतियों के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं वे पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'हाथपैर का फटना, पसीने का अधिक निकलता और अधिक नींद आना इत्यादि से तो थोड़ी मात्रा में पीड़ित करने के लिये अवश्य ही समर्थ होते हैं न कि ज्वरादिकों से पीड़ित करने के लिये समर्थ होते हैं' ऐसा समझना चाहिये ॥७९॥ प्रकोपो वाऽन्यभावो वा शमो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥८०॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे बालप्रकरणं चतुर्थम् ॥४॥ वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों के शरीर में स्वभाव से ही वातादि दोषों का प्रकोप, अन्यभाव (बदल जाना), अथवा उपशम कभी होता ही नहीं यदि होता है तो उन्ही लोगों को जिन लोगों की आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् जो जल्द मरने वाले हैं ॥८०॥ इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायं चतुर्थबालप्रकरणम् समाप्तम् ॥४॥