भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् अथ देशमाह- भूमिदेशस्त्रिधाऽनूपो जांगलो मिश्रलक्षणः ॥१॥ देशों के भेद—पृथ्वी में देश तीन प्रकार के होते हैं (१) अनूप, (२) जाङ्गल और (३) मिश्रलक्षण (अनूप तथा जाङ्गल के लक्षणों से युक्त अर्थात् साधारण) ॥१॥ तत्रानूपलक्षणमाह- नदीपल्वलशैलाढ्यः फुल्लोत्पलकुलैर्युतः । हंससारसकारंडवचक्रवाकादिसेवितः ॥२॥ शशवाराहमहिषरुरुरोहित्कुलाकुलः । प्रभूतद्रुमपुष्पाढ्यो नीलशस्यफलान्वितः ॥३॥ अनेकशालिकेदारकदलीक्षुविभूषितः । अनूपदेशो ज्ञातव्यो वातश्लेष्मामयार्त्तिमान् ॥४॥ अनूपदेश के लक्षण—जो देश नदी, छोटे-छोटे जलाशय और पर्वतों से भरे हुए हैं तथा खिले हुये जल में उत्पन्न होनेवाले कमलादि पुष्पों से युक्त, हंस, सारस, कारण्डव (काक के समान चोंच, लम्बे पाँववाले काले वर्ण के) पक्षी और चक्रवाक (चकवा) आदि पक्षियों से सेवित, शश (खरगोश), सूअर, भैंसा, रुरु (मृग विशेष) तथा रोहि (मृग विशेष) आदि पशुओं के कुलों से व्याप्त, अनेक प्रकार के वृक्ष, पुष्पों तथा हरे-हरे शस्य (धान्य विशेष) और फलों से युक्त एवं अनेक प्रकार के शालि (धान्यविशेष) के खेत तथा केले और ईख के वृक्षों से सुशोभित है उसे वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूपदेश समझना चाहिये ॥२-४॥ अथ जाङ्गललक्षणमाह- आकाशसम¹ उच्चश्च स्वल्पपानीयपादपः । शमीकरीरबिल्वार्कपीलुकर्कन्धुसङ्कुलः ॥५॥ हरिणैणर्क्षपृषतगोकर्णखरसङ्कुलः । सुस्वादुफलवान्देशो वातलो जाङ्गलः स्मृतः ॥६॥ जाङ्गल देश के लक्षण—जिस देश में आकाश के सदृश समतल और ऊँची जमीन थोड़े जल तथा वृक्षों से युक्त हो और शमी (छींकुर), करील, बेल, आक, (मदार), पीलु, तथा बेर के वृक्षों एवं हरिण, एण (कृष्ण मृग), रीछ, पृषत (श्वेतबिन्दु युक्त मृग), गोकर्ण (गौ के सदृश कानवाला) पशु और गदहा इन सबों से व्याप्त हो तथा जिसमें स्वादयुक्त (मीठे) फल लगे हों ऐसे देश को वातसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥५-६॥ तन्त्रान्तरे तु- बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान् । जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ॥७॥ दूसरे ग्रन्थों में अनूपादि देशों के विषय में यह लिखा है कि—जिसमें बहुतायत से जल तथा पर्वत हों उसे कफ तथा वायु सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूप देश समझना चाहिये और जहाँ थोड़े जल तथा वृक्ष हों उसे प्रधानरूप से पित्त, रुधिर तथा वायुसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥७॥ अथ साधारणलक्षणमाह- संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः । समाः साधारणे यस्माच्छीतवर्षोष्ममारुताः । समता तेन दोषाणां तस्मात्साधारणो वरः ॥८॥ साधारण देश के लक्षण—जिस देश में अनूप तथा जाङ्गल इन दोनों देशों के लक्षण पाये जायें, उसे साधारण १. 'आकाशशुभ्र' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA