भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे देश समझना चाहिये। साधारण देश में शीत, वर्षा, गर्मी और वायु समान रूप से होते हैं अत एव वात, पित्त और कफ इन दोषों की वहाँ पर समता होने से वह (साधारण) देश सब से उत्तम कहा गया है ॥८॥ सुश्रुतः- उचिते वर्तमानस्य नास्ति दुर्देशजं भयम्। आहारस्वप्नचेष्टाऽऽदौ तद्देशस्य कृते सति ॥९।। सुश्रुत में कहा है कि—किसी भी दुर्देश (जहाँ का जल, वायु अपने अनुकूल न हों उस देश) में जाने पर यदि आहार, विहार, निद्रा आदि के विषय में उचित आचरण किया जाय तो दुर्देश सम्बन्धी रोगादि का भय नहीं होता है ॥९॥ वृद्धवाग्भटः- यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्। देशादन्यत्र वसत्तत्तुल्यगुणमौषधम् ।।१०।। स्वे देशे निचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपभागताः। बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ।।११।। 'वृद्ध वाग्भट' कहते हैं कि—जिस देश का रहनेवाला जो प्राणी हो उसे उसी देश में उत्पन्न हुई ओषधि हितकर हो सकती है। उस देश (स्वदेश) से अन्यत्र निवास करते हुए प्राणी के लिये स्वदेश में उत्पन्न हुई हितकर ओषधि के तुल्य गुणवाली अन्य देश की भी ओषधि हितकर होती है अपने देश में सञ्चित हुये दोष यदि दूसरे देश में कुपित होवें तो उतने बलवान् नहीं होते, चाहे वे जलप्राय अथवा स्थलप्राय देश में उत्पन्न होनेवाले रोग क्यों न हों। अर्थात् अनूप देश में रहनेवाले पुरुषों के सञ्चित हुये दोष जाङ्गल देश में जाने पर यदि कुपित हो जायँ तो भी वे अपने देश की भाँति बलवान् नहीं होते ॥१०-११॥ अथ दिनादिचर्याः- मानवो येन विधिना स्वस्थस्तिष्ठति सर्वदा। तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ॥१२।। दिनचर्या निशाचर्यामृतुचर्या यथोदिताम्। आचरन्पुरुषः स्वस्थः सदा तिष्ठति नान्यथा ॥१३॥ दिनादिचर्या—जैसा आहार विहारादि करने से मनुष्य सर्वदा स्वस्थ (नीरोग) रह सकता हो, वैद्य को उचित है कि- उसी विधि को उससे करावे। क्योंकि स्वस्वास्थ्य सभी को वांछनीय है। शास्त्र में दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या जिस प्रकार से कही हुई है। उसी प्रकार से दिनचर्यादि का आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। उसके विपरीत आचरण करने से स्वास्थ्य लाभ नहीं कर सकता है ॥१२-१३॥ तत्र स्वस्थस्य लक्षणमाह सुश्रुतः- समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥१४।। सुश्रुतोक्त स्वस्थ पुरुष का लक्षण—जिसके शरीर में वातादि दोष अग्नि, धातु (रसरक्तादि), मल और क्रिया समान रूप से हों तथा जो आत्मा, इन्द्रिय तथा मन से प्रसन्न रहता हो, उसे स्वस्थ कहते हैं ॥१४॥ ❖ क्रिया अत्र कर्म, तेन समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा ।।१४।। 'क्रिया' पद का अर्थ 'कर्म' है अतः 'समक्रिय' अर्थात् जिसके कर्म शरीर के अनुरूप होते हों ॥१४॥ अथ दिनचर्यामाह- ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षाऽर्थमायुषः। तत्र १सर्वाघशान्त्यर्थं स्मरेद्धि मधुसूदनम् ।।१५।। दध्याज्यादर्शसिद्धार्थ बिल्वगोरोचनस्रजाम्। दर्शनं स्पर्शनं कार्यं प्रबुद्धेन शुभावहम् ।।१६।। दिनचर्या—स्वस्थ पुरुष अपनी आयु की रक्षा के लिए ब्राह्ममुहूर्त्त में (सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पहले) सो कर उठे १. 'दुःखस्ये'ति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA