भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १११ और उस समय सम्पूर्ण पापों को शान्त करने के लिये मधुसूदन भगवान् का स्मरण करे और उसे उचित है कि वह प्रथम दही, घी, दर्पण, पीली सरसों, बेल, गोरोचन तथा पुष्पमाला का दर्शन तथा स्पर्श करे, क्योंकि यह शुभदायक होता है ॥१५-१६॥ स्वमाननं घृते पश्येद् यदिच्छेच्चिरजीवितम् । आयुष्यमुषसि प्रोक्तं मलादीनां विसर्जनम्। तदन्त्रकूजनाध्मानोदरगौरववारणम् ॥१७॥ यदि दीर्घ जीवन लाभ करने की अभिलाषा हो तो अपने मुख को घृत में देखे और प्रातः काल में मल-मूत्रादि का त्याग करना आयुष्य (आयु के लिये हितकर) तथा आँत का गुड़गुड़ाना, अफारा तथा पेट का भारीपन इन सबों का दूर करनेवाला कहा हुआ है ॥१७॥ ❖ आदिशब्देन वातमूत्रादीनां ग्रहणम् ॥१७॥ 'मलादि' में वात (अधोवायु) मूत्र आदि का ग्रहण करना चाहिये ॥१७॥ अथ पुरीषवेगाभिघाताद्बाधानिमाह- आटोपशूलौ परिकर्त्तिका च सङ्गः पुरीषस्य तथोर्ध्ववातः । पुरीषमास्यादथवा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥१८॥ शौच की चेष्टा रोकने से हानि—पुरीष का वेग अर्थात् शौच की चेष्टा रोकने पर मनुष्य को आटोप (पेट में वेदना युक्त गुड़गुड़ शब्द का होना), शूल और 'परिकर्तिका' (गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा) ये सब रोग होते हैं तथा मल का अवरोध और ऊर्ध्ववात अथवा मुख से मल निकलना, इन सबों में से कोई-न-कोई होने लगता है ॥१८॥ ❖ परिकर्तिका=गुदे परिकर्तनवत्पीडा । पुरीषस्य सङ्गः=निरोधः । ऊर्ध्ववातः=उद्गारबाहुल्यम् ॥१८॥ 'परिकर्तिका' का 'गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा' 'पुरीषस्य सङ्गः' का 'मलका अवरोध' तथा 'ऊर्ध्ववात' का अधिक उद्गार (डकार) आना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८॥ अथ वातनिग्रहजान् दोषानाह- वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥१९॥ अधोवायु रोकने से हानि—अधोवायु रोकने से वात, मूत्र और मल का अवरोध, अफारा, क्लान्ति, पीड़ा एवं उदर में वायु से उत्पन्न होने वाले अन्यान्य रोग भी होते हैं ॥१९॥ अथ मूत्रनिग्रहजान् दोषानाह- बस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥२०॥ मूत्र के वेग रोकने से हानि—मूत्र के वेग रोकने से मूत्राशय तथा लिङ्ग में शूल, मूत्रकृच्छ्र, शिर में दर्द, विनाम तथा वङ्क्षणानाह, ये सब रोग होने लगते हैं ॥२०॥ ❖ विनामः=शरीरस्य नम्रता । वङ्क्षणानाहः=वङ्क्षणस्याकर्षणवत्पीडा ॥२०॥ 'विनाम' पद से 'पीड़ा होने से शरीर का झुक जाना' तथा 'वङ्क्षणानाह' पद से 'वङ्क्षण अर्थात् दोनों ऊरुओं के सन्धिस्थानों के खींचने की भाँति पीड़ा होना, यह अर्थ समझना चाहिये ॥२०॥ न वेगतोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद्वलात् । कामशोकभयक्रोधान्मनोवेगान्विधारयेत् ॥२१॥ गुदादिमलमार्गाणां शौचं कान्तिबलप्रदम् । पवित्रकरमाख्यातमलक्ष्मीकलिपापहृत् ॥२२॥ प्रक्षालनं मतं पाण्योः पादयोः शुद्धिकारणम् । मलश्रमहरं वृष्यं चक्षुष्यं राजसापहम् ॥२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA