भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् ९९ विदारिकन्दस्य रसं पिबेत्स्तन्यस्य वृद्धये । तच्चूर्णं तस्य वृद्ध्यर्थं पिबेद्वा क्षीरसंयुतम् ।।१५।। दूध की वृद्धि के लिये विदारीकन्द का रस अथवा विदारीकन्द का चूर्ण दूध में मिला कर पीवे ।।१५।। अथ स्तन्यस्य दुष्टताहेतुमाह- धात्र्या गुरुभिराहारविहारैर्दोषलस्तथा । देहे दोषाः प्रकुप्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ।।१६।। मिथ्याऽऽहारविहारिण्या दुष्टा वातादयः स्त्रियाः । दूषयन्ति पयस्तेन शरीरं व्याधयः शिशोः ।।१७।। दूध के दूषित होने के कारण—गुरु (देर में पचनेवाला) भोजन, दोषजनक भोजन तथा विहार करने से वातादि दोष धात्री (दूध पिलानेवाली धाई अथवा माता) के देह में प्रकुपित हो जाते हैं अत एव दूध दूषित हो जाता है । अवैध आहार तथा विहार करनेवाली स्त्री के वातादि दोष प्रकुपित होकर दूध को दूषित कर देते हैं और उसी दूषित दूध के पिलाने से बालक के शरीर में रोग पैदा होते हैं ।।१६-१७।। कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् । पित्तादम्लं च कटुकं राज्योऽम्भसि तु पीतिकाः ।।१८।। कफदुष्टं तु यत्तोये निमज्जति च पिच्छिलम् । द्वन्द्वजं तु द्विलिङ्गं स्यास्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ।।१९।। दूषित दूध के लक्षण—वात से दूषित दूध कषाय (कसैला) रस से युक्त तथा जल में डालने पर तैरनेवाला होता है और पित्त से दूषित दुग्ध अम्ल (खट्टा) तथा कटु (कड़वा) रस से युक्त होता है और जल में डालने पर उसमें पीली रेखाएँ दिखाई पड़ती हैं । कफ से दूषित जो दुग्ध होता है वह जल में डालने पर डूब जाता है तथा पिच्छिल (चिकनाहट से युक्त) होता है और जिसमें दो दोषों के लक्षण पाये जायें वह दो दोषों से दूषित होने से द्वन्द्वज और जिसमें तीन दोषों के लक्षण पाये जायें वह सान्निपातिक दूध कहलाता है ।।१८-१९।। अथ दुष्टस्तन्य शोधनविधिमाह- धात्री क्षीरविशुद्ध्यर्थं मुद्गयूषरसाशिनी । भार्गीदारुवचाः पिष्ट्वा पिबेत्साऽतिविषास्तथा ।।२०।। दूषित दुग्ध की शोधन विधि—दुग्ध दूषित होने पर उसकी शुद्धि के लिये धात्री को भोजन के साथ मूँग का यूष तथा मांलरस अर्थात् सुरुवा पीना चाहिये और भार्ङ्गी, देवदारु, वच और अतीस भी पीसकर पीना चाहिये ।।२०।। पाठामूर्वाऽब्दभूनिम्बदारुशुण्ठीकलिङ्गकैः । सारिवामत्स्यपित्ताऽख्यैः क्वाथः स्तन्यविशोधनः ।। पाठा, मूर्वा, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, सोंठ, इन्द्रजौ, सारिवा (अनन्त मूल) और कुटकी इन सब द्रव्यों का क्वाथ बनाकर पीने से भी दूध शुद्ध हो जाता है ।।२१।। ❖ मत्स्यपित्ता = कटुकी ।।२१।। 'मत्स्यपित्ता' से कुटकी का ग्रहण करना चाहिये ।।२१।। पटोलनिम्बासनदारुपाठा मूर्वा गुडूचीं कटुरोहिणीं च । १सनागरां च क्वथितां च तोये धात्री पिबेत्स्तन्यविशुद्धिहेतोः ।।२२।। परवल, नीम, असन, (पीतसाल), देवदारु, पाठा, मूर्वा, गिलोय (गुरुच)' कुटकी और सोंठ इन सबों का क्वाथ दूध को शुद्ध करने के लिये धात्री पीवे ।।२१-२२।। अथ शुद्धस्तन्यस्य लक्षणमाह- नीरे स्तन्यं यदेकि स्यादविवर्णमतन्तुमत् । पाण्डुरं तनु शीतं च तद्दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।।२३।। शुद्ध दूध के लक्षण—जो दूध जल में डालने पर जल के साथ मिल जाय और दूसरे रङ्ग का न हो तथा तार १. 'सनागरं च क्वथितं चे'ति पा. ।