भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८३ ❖ अस्यायमर्थः-धमन्यः कथम्भूताः पञ्चाभिभूताः, पञ्चभ्य आकाशादिमहाभूतेभ्यः, अभिसमन्ताद् भूताः । पञ्चेन्द्रियम्=पञ्च इन्द्रियाणि उभयात्मकं मनश्च यस्य तं पञ्चेन्द्रियं जीवात्मानम् । पञ्चसु=इन्द्रियाधिष्ठानेषु श्रोत्रादिषु । पञ्चकृत्वः=पञ्चवारान्, पर्यायेण न तु एकदैव, भावयन्ति=प्रापयन्ति । पञ्चेन्द्रियं=पञ्चानाभिन्द्रियाणां समाहारः पञ्चेन्द्रियं श्रोत्रादि तदुपलक्षितं कर्मेन्द्रियं मनश्च । पञ्चसु=पृथिव्यादिषु बुद्धीन्द्रियविषयेषु तदुपलक्षितेषु हस्तादिषु कर्मेन्द्रियविषयेषु मन्तव्ये मनोविषये च । भावयित्वा=प्राप्य, संयोज्येति यावत् । विनाशकाले पञ्चत्वमाकाशादिभावमायान्ति प्राप्नुवन्तीत्यर्थः ।।२६६।। उपर्युक्त श्लोक स्थित पदों की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि-'धमनियां कैसी हैं कि-'पञ्चाभिभूताः' अर्थात् आकाशादि पञ्चमहाभूतों से अभिभूत (सर्वतोभाव से उत्पन्न) हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँच श्रोत्रादि इन्द्रियाँ तथा उभयात्मक (बुद्धीन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय स्वरूप) मन जिसकी इन्द्रियाँ हैं ऐसे जीवात्मा को। 'पञ्चसु' अर्थात् श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठानों में । 'पञ्चकृत्वः' अर्थात् पाँच बार पर्याय से (क्रम से) न कि एक समय में ही। 'भावयन्ति' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) करती हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँचों इन्द्रियों के समूह जो श्रोत्रादि बुद्धीन्द्रियाँ तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियाँ एवं मन हैं उन सबों को । 'पञ्चसु' अर्थात् पृथिव्यादि सम्बन्धी जो बुद्धीन्द्रियों के गन्धादि विषय हैं तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियों के भी जो ग्राह्यादि (सृष्टिप्रकरणोक्त) विषय हैं, एवं मन के भी जो मन्तव्य अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियों के विषयों का ज्ञानरूप विषय हैं उन सबों में 'भावयित्वा' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) कर के । विनाश का काल उपस्थित होने पर 'पञ्चत्वम्' अर्थात् आकाशादि ५ महाभूतों के भाव को प्राप्त करती हैं—पञ्च महाभूतों के रूप में मिल जाती हैं ।।२६६।। अथ कण्डराः- महत्यः स्नायवः प्रोक्ताः कण्डरास्तास्तु षोडश । प्रसारणाकुञ्चनयोर्द्दष्टं तासां प्रयोजनम् ।। चतस्रो हस्तयोस्तासां तावत्यः१ पादयोः स्मृताः । ग्रीवायामपि तावत्यस्तावत्यः२ पृष्ठसङ्गताः ।।२६७।। कण्डराओं के स्वरूप और स्थान—बड़ी-बड़ी स्नायुओं को 'कण्डरा' कहते हैं, वे १६ हैं। कण्डराओं के द्वारा शरीर के अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना क्रिया सम्पन्न होती हैं। उन १६ कण्डराओं में से चार कण्डरायें दोनों हाथों में, चार दोनों पैरों में, चार गर्दन में और चार ही पीठ में होती हैं ।।२६७।। तत्र पादहस्तगतानां कण्डराणां नखाः प्ररोहाः । ग्रीवानिबन्धनानामधोभागगतानां प्ररोहो मेढ्रः । पृष्ठनिबन्धनानां प्ररोहा ३नितम्बमूर्धोरुवक्षोऽक्षितनपिण्डाः ।।२६८।। उनमें से जो हाथों और पैरों में रहनेवाली कण्डरायें हैं उनके प्ररोह (अङ्कुर) भाग नख हैं। गर्दन में बंधी हुई और नीचे की ओर गई हुई कण्डराओं का प्ररोह (अङ्कुर) भाग मेढ्र (लिङ्ग) है। और पीठ में बंधी हुई कण्डराओं के प्ररोह (अङ्कुर) भाग नितम्ब, मस्तक, ऊरु, वक्षःस्थल, नेत्र और स्तनपिण्ड हैं ।।२६८।। अथ रन्ध्राणि- नेत्रश्रवणनासानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते । मुखमेहनपायूनामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।।२६९।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः । स्त्रीणामन्यानि च त्रीणि स्तनयोर्गर्भवर्त्मनि ।।२७०।। रन्ध्रों की संख्या और स्थान—नेत्र, कान, नाक, में दो-दो, मुख, लिङ्ग तथा गुदा में एक-एक और मस्तक १. 'तावन्त्य' इति पा. । २. 'तावन्त्यस्तावन्त्य' इति पा. । ३. 'मूर्ध्नो'रिति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA