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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८३ ❖ अस्यायमर्थः-धमन्यः कथम्भूताः पञ्चाभिभूताः, पञ्चभ्य आकाशादिमहाभूतेभ्यः, अभिसमन्ताद् भूताः । पञ्चेन्द्रियम्=पञ्च इन्द्रियाणि उभयात्मकं मनश्च यस्य तं पञ्चेन्द्रियं जीवात्मानम् । पञ्चसु=इन्द्रियाधिष्ठानेषु श्रोत्रादिषु । पञ्चकृत्वः=पञ्चवारान्, पर्यायेण न तु एकदैव, भावयन्ति=प्रापयन्ति । पञ्चेन्द्रियं=पञ्चानाभिन्द्रियाणां समाहारः पञ्चेन्द्रियं श्रोत्रादि तदुपलक्षितं कर्मेन्द्रियं मनश्च । पञ्चसु=पृथिव्यादिषु बुद्धीन्द्रियविषयेषु तदुपलक्षितेषु हस्तादिषु कर्मेन्द्रियविषयेषु मन्तव्ये मनोविषये च । भावयित्वा=प्राप्य, संयोज्येति यावत् । विनाशकाले पञ्चत्वमाकाशादिभावमायान्ति प्राप्नुवन्तीत्यर्थः ।।२६६।। उपर्युक्त श्लोक स्थित पदों की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि-'धमनियां कैसी हैं कि-'पञ्चाभिभूताः' अर्थात् आकाशादि पञ्चमहाभूतों से अभिभूत (सर्वतोभाव से उत्पन्न) हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँच श्रोत्रादि इन्द्रियाँ तथा उभयात्मक (बुद्धीन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय स्वरूप) मन जिसकी इन्द्रियाँ हैं ऐसे जीवात्मा को। 'पञ्चसु' अर्थात् श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठानों में । 'पञ्चकृत्वः' अर्थात् पाँच बार पर्याय से (क्रम से) न कि एक समय में ही। 'भावयन्ति' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) करती हैं। 'पञ्चेन्द्रियम्' अर्थात् पाँचों इन्द्रियों के समूह जो श्रोत्रादि बुद्धीन्द्रियाँ तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियाँ एवं मन हैं उन सबों को । 'पञ्चसु' अर्थात् पृथिव्यादि सम्बन्धी जो बुद्धीन्द्रियों के गन्धादि विषय हैं तथा उनसे उपलक्षित हस्तादि कर्मेन्द्रियों के भी जो ग्राह्यादि (सृष्टिप्रकरणोक्त) विषय हैं, एवं मन के भी जो मन्तव्य अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियों के विषयों का ज्ञानरूप विषय हैं उन सबों में 'भावयित्वा' अर्थात् प्राप्त (संयोजित) कर के । विनाश का काल उपस्थित होने पर 'पञ्चत्वम्' अर्थात् आकाशादि ५ महाभूतों के भाव को प्राप्त करती हैं—पञ्च महाभूतों के रूप में मिल जाती हैं ।।२६६।। अथ कण्डराः- महत्यः स्नायवः प्रोक्ताः कण्डरास्तास्तु षोडश । प्रसारणाकुञ्चनयोर्द्दष्टं तासां प्रयोजनम् ।। चतस्रो हस्तयोस्तासां तावत्यः१ पादयोः स्मृताः । ग्रीवायामपि तावत्यस्तावत्यः२ पृष्ठसङ्गताः ।।२६७।। कण्डराओं के स्वरूप और स्थान—बड़ी-बड़ी स्नायुओं को 'कण्डरा' कहते हैं, वे १६ हैं। कण्डराओं के द्वारा शरीर के अवयवों का फैलाना और सिकोड़ना क्रिया सम्पन्न होती हैं। उन १६ कण्डराओं में से चार कण्डरायें दोनों हाथों में, चार दोनों पैरों में, चार गर्दन में और चार ही पीठ में होती हैं ।।२६७।। तत्र पादहस्तगतानां कण्डराणां नखाः प्ररोहाः । ग्रीवानिबन्धनानामधोभागगतानां प्ररोहो मेढ्रः । पृष्ठनिबन्धनानां प्ररोहा ३नितम्बमूर्धोरुवक्षोऽक्षितनपिण्डाः ।।२६८।। उनमें से जो हाथों और पैरों में रहनेवाली कण्डरायें हैं उनके प्ररोह (अङ्कुर) भाग नख हैं। गर्दन में बंधी हुई और नीचे की ओर गई हुई कण्डराओं का प्ररोह (अङ्कुर) भाग मेढ्र (लिङ्ग) है। और पीठ में बंधी हुई कण्डराओं के प्ररोह (अङ्कुर) भाग नितम्ब, मस्तक, ऊरु, वक्षःस्थल, नेत्र और स्तनपिण्ड हैं ।।२६८।। अथ रन्ध्राणि- नेत्रश्रवणनासानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते । मुखमेहनपायूनामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।।२६९।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः । स्त्रीणामन्यानि च त्रीणि स्तनयोर्गर्भवर्त्मनि ।।२७०।। रन्ध्रों की संख्या और स्थान—नेत्र, कान, नाक, में दो-दो, मुख, लिङ्ग तथा गुदा में एक-एक और मस्तक १. 'तावन्त्य' इति पा. । २. 'तावन्त्यस्तावन्त्य' इति पा. । ३. 'मूर्ध्नो'रिति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे में एक छिद्र होता है। इस प्रकार पुरुषों के शरीर में १० छिद्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में दोनों स्तनों में दो और गर्भाशय में एक इस प्रकार तीन छिद्र अधिक होते हैं ॥२६९-२७०॥ अथ स्रोतांसि- मनःप्राणान्नपानीयदोषधातुपधातवः । धातूनां च मला मूत्रं मलमित्यादयस्तनौ ।। २७१।। सञ्चरन्ति हि यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सङ्गगुः । बहूनि तानि संख्याय शक्यन्ते नैव भाषितुम् ।। २७२।। स्रोतों के लक्षण—जिन मार्गों से मन, प्राण, अन्न, जल, दोष धातु, उपधातु, धातुओं के मल, मूत्र और विष्ठा आदि पदार्थ शरीर में सञ्चार करते हैं उन्हीं मार्गों को स्रोत कहते हैं। वे इतने अधिक हैं कि गिन नहीं सकते अर्थात् असंख्य हैं ॥२७१-२७२॥ अथ जालानि- जालानि तु शिरास्नायुमांसास्थ्नामुद्भवन्ति हि । तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश ।। २७३।। जालों के लक्षण और संख्या—शिरा (नसें), स्नायु, मांस और हड्डी इनका जाल होता है अर्थात् इन्हीं से जालों की उत्पत्ति होती है। वे जाल प्रत्येक शिरा आदि में चार-चार हैं अत एव सब मिल कर सोलह हैं ॥२७३॥ ❖ निरन्तररन्ध्रानि१ करकलितानि समूहितानि च जालानीव जालानि । तानि मणिबन्धगुल्फसंश्रितानि२ परस्परनिबद्धानि परस्परसंश्लिष्टानि परस्परगवाक्षितानि चेति, यैर्गवाक्षितमिदं शरीरम् । निरन्तर (सघन) छिद्रसमूहों से बने हुये समूह युक्त जाल की भाँति होने से ये जाल कहलाते हैं। ये मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (पादग्रन्थि) में स्थित परस्पर बँधे हुये तथा परस्पर मिले हुये हैं अत एव गवाक्ष (जालीदार खिड़की) की भाँति छिद्रयुक्त होते हैं। जिन (जालों) से यह शरीर गवाक्षित (जालीदार खिड़की की भाँति) होता है। ❖ अयमर्थः-एकस्मिन् मणिबन्धे एकं जालं शिरायाः, अपरं स्नायोः, तृतीयं मांसस्य, चतुर्थमस्थ्नः, एवं चत्वारि जालानि । एतेनेतरमणिबन्धो गुल्फौ च व्याख्यातौ । गवाक्षितं विरचितनिरन्तरजालाका- रन्ध्रनिकरपरिकलितमित्यर्थः ।। २७३।। स्पष्ट अभिप्राय यह है कि—एक मणिबन्ध में एक जाल शिराओं का, दूसरा स्नायुओं का, तीसरा मांस का, चौथा हड्डियों का, इस प्रकार चार जाल हैं। इसी प्रकार दूसरे मणिबन्ध तथा दोनों गुल्फों (पैर की एड़ी) में चार २ जाल कहे हुये हैं तथा इन जालों से यह शरीर गवाक्षित अर्थात्—सघन बुने हुये जाल के आकार की भाँति छिद्रसमूहों से व्याप्त रहता है ॥२७३॥ अथ कूर्चाः- कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि । ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ्रे सर्वेऽपि षट् स्मृताः । कूर्चा अपि शिरास्नायुमांसास्थिप्रभवाः३ स्मृताः ।।२७४।। कूर्चों के लक्षण और संख्या—दोनों हाथों में दो, दोनों पैरों में दो, ग्रीवा में एक और मेढ्र में एक, इस प्रकार सब मिलकर छै कूर्च हैं, कूर्च शिरा, स्नायु, मांस तथा अस्थियों से ही बने होते हैं। कूर्च (कूँचा) के समान आकृति होने से ये कूर्च कहलाते हैं ॥२७४॥ १. ‘रन्ध्राणि करे’ति पा. । २. ‘संसृते’ति पाठान्तरं सार्वत्रिकं सुश्रुतासम्मतम् । ३. ‘प्रभव’ इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८५ अथ रज्जवः- पृष्ठवंशस्योभयत्र महत्यो मांसरज्जवः। चतस्रो मांसपेशीनां बन्धनं तत्प्रयोजनम् ।।२७५।। रज्जुओं के लक्षण और संख्या-पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों तरफ बड़ी-बड़ी चार मांस की रज्जु (डोरियाँ) हैं, उनमें से दो बाहर की तथा दो भीतर की हैं। इनका प्रयोजन केवल यह है कि मांसपेशियों को ऊपर नीचे से अस्थियों में बाँध कर रखें जिससे बिखर न जायें ।।२७५।। अथ सेवन्यः- सेवन्यः सप्त तासां तु भवेयुः पञ्च मस्तके। एका शेफसि जिह्वायामेका विध्येन्न ताः क्वचित् ।। सेवनियों के लक्षण और संख्या-शरीर में सेवनी सात होती हैं, उनमें पाँच मस्तक में, एक लिङ्ग में तथा एक जीभ में होती है। सेवनियों का कभी शस्त्रादि से वेध नहीं करना चाहिये। सिले हुए की भाँति जो स्थान होता है उसी को सेवनी समझना चाहिये ।।२७६।। अथ सङ्घाताः- चतुर्दशास्थां सङ्घातास्तेषां त्रयो गुल्फजानुवंक्षणेषु। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ त्रिकशिरसोरेकैकम्¹ ।।२७७।। सङ्घातों की संख्या-हड्डियों के संघात (तक जगह रहना) शरीर में १४ हैं। उनमें से तीन सङ्घात गुल्फ (एड़ी), जानु और वङ्क्षण (ऊरुसन्धि) में हैं, इसी तरह दूसरे पैर के भी गुल्फ, जानु तथा वङ्क्षण में तीन सङ्घात हैं। तथा दोनों बाहुओं में भी तीन-तीन सङ्घात हैं अर्थात् दोनों बाहुओं के मणिबन्ध, कूर्पर (केहुनी) तथा वंक्षण (बगल) में भी तीन-तीन कुल छै सङ्घात हैं और त्रिकस्थान में एक तथा शिर में भी एक सङ्घात है ।।२७७।। ❖ अत्र तु त्रिकपदेन, बाहुग्रीवास्थिसङ्घात उच्यते ।।२७७।। 'त्रिक' पद से ग्रीवा और दोनों बाहुओं के मध्य में स्थित अस्थिसङ्घात को समझना चाहिये ।।२७७।। अथ सीमन्ताः- चतुर्दशैव सीमन्ताः कथिता मुनिपुङ्गवैः। सङ्घाताः सीविता यैस्तु सीमन्तास्ते प्रकीर्तिताः ।।२७८।। सीमन्तों के लक्षण और संख्या-मुनिश्रेष्ठों ने शरीर में चौदह सीमन्त कहे हैं। जिनसे अस्थियों के सङ्घात परस्पर जोड़े जाते हैं, वे सीमन्त कहलाते हैं ।।२७८।। ❖ यैः-अस्थिभिः ।।२७८।। अथ त्वचः- क्षीरस्य पच्यमानस्य यथा सन्तानिका भवेत्। पच्यमानस्य शुक्रस्य रजसश्च तथा त्वचः ।। पूर्वावभासिनी तासां सिध्मस्थानं च सा स्मृता ।।२७९।। त्वचाओं के लक्षण और संख्या-जिस प्रकार अग्नि पर दूध के पकाये जाने पर उसके ऊपर सन्तानिका (मलाई) पड़ जाती है, उसी भाँति धातुस्थित अग्नि से पकते हुए शुक्र तथा रज से भी जो उत्पन्न होता है वही त्वचा कहलाती है और एक के ऊपर दूसरी इस प्रकार से सब मिलकर सात प्रकार की त्वचायें हैं उनमें से सबसे पहली अवभासिनी नाम की त्वचा है, जो सिध्म नामक कोढ़ विशेष के उत्पन्न होने का स्थान है ।।२७९।। १. 'रैकैक' इति पा. । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचिरकः।

८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ अथावभासिनी-भ्राजकेन पित्तेनावभासनात् । परिणाहेन विस्तारितस्य व्रीहे (२विंशतिभागेष्व) द्वादशो भागःप्रमाणं यस्याः । व्रीहिरत्रयवः, सा सिध्मपद्मकण्टकयोरधिष्ठानम् ।। त्वचा का जो 'अवभासिनी' नाम है वह भ्राजक नामक पित्त से अवभासित (दीप्त) होने से ही है। परिणाह अर्थात् चौड़ाई में फैलाये हुये व्रीहि का (जब की चौड़ाई का) बीस भाग करने पर उनमें से केवल १८ भागों को मिला कर जितनी चौड़ाई होती है उतने प्रमाण इस त्वचा की मुटाई होती है। यहाँ पर 'व्रीहि' इस पद से जब नामक अन्न का ग्रहण करना चाहिये । यह केवल 'सिध्म' उत्पन्न होने का स्थान नहीं है, बल्कि 'सिध्म' और 'पद्मकण्टक' दोनों ही का उत्पत्तिस्थान है। द्वितीया लोहिता ज्ञेया तिलकालकजन्मभूः ।।२८०।। दूसरी त्वचा का नाम 'लोहिता' है यह 'तिलकालक' का उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।। ❖ द्वितीया यवषोडशभागप्रमाणा तिलकालकन्यच्छव्यङ्गानामधिष्ठानम् ।।२८०।। दूसरी त्वचा की मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से १६ भागों के बराबर होती है। यह केवल तिलकालक का ही नहीं किन्तु न्यच्छ और व्यङ्ग (झाईं) रोगों का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।। तृतीया तु भवेच्छ्वेता स्थानं चर्मदलस्य सा ।।२८१।। तीसरी त्वचा श्वेता नाम की होती है जो चर्मदल नामक रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।। ❖ सा यवद्वादशभागप्रमाणा चर्मदलाजगल्लिकामशकानामधिष्ठानम् ।।२८१।। तीसरी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के २० भागों में से १२ भागों के बराबर होती है और वह केवल चर्मदल का ही नहीं, किन्तु अजगल्लिका और मस्सा का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।। ताम्रा चतुर्थी विज्ञेया किलाश्वित्रभूमिका ।।२८२।। चौथी त्वचा का नाम ताम्रा है, वह किलास तथा श्वित्र नामक कोढ़ का उत्पत्तिस्थान है ।।२८२।। चतुर्थी यवाष्टभागप्रमाणा ।।२८२।। चौथी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के बीस भागों में से ८ भागों के बराबर होती है ।।२८२।। पञ्चमी१ वेदिनी नाम्ना पञ्चभागप्रमाणिका । विसर्पकुष्ठाधिष्ठाना ज्ञेया षष्ठी तु रोहिणी ।। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः ।।२८३।। पाँचवीं त्वचा वेदिनी नाम की होती है। इसकी मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से पाँच भागों के बराबर होती है। यह विसर्प तथा कुष्ठों का उत्पत्तिस्थान है। छठी त्वचा रोहिणी नाम से प्रसिद्ध है, यह गाँठ, अपची और गलगण्ड रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।। ❖ २व्रीहिमात्रप्रमाणा सा रोहिणी ग्रन्थ्यपचीगलगण्ड (३गण्ड) मालाऽर्बुदश्लीपदानाम्धिष्ठानम् ।।२८३।। 'रोहिणी' नाम की जो छठीं त्वचा है, उसकी मुटाई एक जौ की चौड़ाई के बराबर है। वह केवल गाँठ, अपची और गलगण्ड का ही नहीं किन्तु गण्डमाला, अर्बुद और श्लीपद रोग का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।। १. एतत्कोष्ठस्थपाठस्थाने क्वचित् 'पञ्चमी वेदिनी नाम्ना सर्वकुष्ठोद्भवा तु सा। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः' उति पाठो लभ्यते। २. 'सा पञ्चमी वेदिनी यवपञ्चभागप्रमाणिका। सा षष्ठी रोहिणी व्रीहिप्रमाणे'ति पाठान्तरम्। ३. क्वचिन्नाप्युपलभ्यते कोष्ठस्थः पाठः।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८७ स्थूला त्वक्सप्तमी ख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्च सा ।।२८४।। सातवीं त्वचा स्थूला नाम से प्रसिद्ध है और वह विद्रधि आदि रोगों का उत्पत्तिस्थान है ।।२८४।। ❖ सा सप्तमी व्रीहिद्वयप्रमाणा ।। अत¹ एवोक्तं शार्ङ्गधरेण-स्थूला व्रीहिद्विमात्राचेति । सप्तापि त्वचः समुदिता विंशतितमभागोनषड्यवप्रमाणाः । षड्यवप्रमाणं तु अङ्गुष्ठोदरतुल्यम् । यत उक्तम्-‘एतत् प्रमाणं मांसलेषु स्थलेषु बोद्धव्यम्, न तु ललाटसूक्ष्माङ्गुल्यादिषु उदरे ²त्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति ।।२८४।। सातवीं स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जौ की चौड़ाई की भाँति होती है। क्योंकि 'शार्ङ्गधर' ने भी कहा है कि— 'स्थूला नामक त्वचा की मुटाई दो जब के बराबर है' और इन सातों त्वचाओं की मुटाई सब मिलकर एक जौ के बीस भागों में से बीसवाँ भाग (अर्थात् एक भाग) कम छः जौ के चौड़ाई के भाँति है। छः जौ की चौड़ाई तो हाथ के अंगूठे के उदर भाग की चौड़ाई के बराबर होती है। किन्तु यह प्रमाण (चौड़ाई) मांसल (मांस से भरे हुए) स्थूल भागों में ही जानना चाहिये; न कि ललाट, तथा पतली अंगुली आदि भागों में। क्योंकि कहा भी है कि 'पेट में यदि शस्त्र से वेध (छेदन) करना हो तो अंगूठे के उदर की चौड़ाई के बराबर गहरा छेदन करना चाहिये ।।२८४।। अथ लोमानि लोमकूपाश्च- अस्थ्नो मलानि लोमनि चासंख्यानि भवन्ति हि । सन्ति यावन्ति लोमानि तावन्तो लोमकूपकाः ।।२८५।। रोम तथा रोमकूप—रोम हड्डियों के मल से उत्पन्न होते हैं और वे असङ्ख्य हैं। तथा शरीर में जितने रोम हैं उतने ही रोमकूप (छिद्र) भी हैं ।।२८५।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तिः स्वभावादेव जायते । सन्निवेशश्च गात्राणां नात्रास्ते कारणान्तरम् ।।२८६।। अङ्ग और प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति तथा इन सबों का भिन्न-भिन्न प्रकार की बनावट स्वभाव से ही होती है। इसमें दूसरा कारण कोई नहीं है ।।२८६।। ❖ निर्वृत्तिः=सिद्धिः । स्वभावात्=ईश्वरात् । सन्निवेशो=रचनाविशेषः ।।२८६।। 'निर्वृत्ति' पद से सिद्धि अर्थात् उत्पत्ति और स्वभाव' पद से 'ईश्वर की इच्छा' तथा 'सन्निवेश' पद से 'रचना विशेष' अर्थात् 'बनावट' समझना चाहिये ।।२८६।। अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तौ ये भवन्त्यगुणा गुणाः ! ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ।।२८७।। दन्तानां पतनं जन्म पुनः पाते त्वसम्भवः । तलेष्वनुद्भवो लोम्नामेतत्सर्वं स्वभावतः ।।२८८।। गर्भ के अङ्ग तथा उपाङ्गों के बनने में जो गुण अथवा अवगुण (दोष) हो जाते हैं वे उसी गर्भस्थ जीव के धर्म तथा अधर्म के निमित्त.से ही होते हैं। बाल्यावस्था में दाँतों का गिरना तथा उसके बाद पुनः जमना और दुबारा जमे हुए दाँतों के गिरने पर पुनर्बार न जमना, एवं हथेली तथा तलुए में रोगों का न होना, ये सब स्वभाव (ईश्वरेच्छा) से होते हैं, इनमें कोई दूसरा कारण नहीं है ।।२८७-२८८।। गर्भे मासि मासि यद्भवति तदाह- गर्भाशये निपतितं यादृक्शुक्रं तथाऽऽर्तवम् । तादृगेव द्रवीभूतं प्रथमे मासि तिष्ठति ।।२८९।। प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था—गर्भाशय में जैसी अवस्था में शुक्र तथा रज गिरता है पहले महीने में वह वैसी (द्रवरूप में) ही रहता है ।।२८९।। १. 'तत' इति पाठान्तरम् । २. 'उदरेष्वङ्गुष्ठप्रमाणमेव गाढं विध्येदि'ति पा. ।'

८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मारुतपित्तकफैस्तस्तथैः पच्यमानो द्वितीयके। 'कललस्थमहाभूतसमुदायो घनीभवेत् ।।२९०।। दूसरे मास में गर्भाशय में स्थित वायु, पित्त और कफ की ऊष्मा से पकता हुआ कलल में स्थित पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों से बना हुआ कललस्वरूप शुक्र और रज घन हो जाता है ।।२९०।।

  • अत्र मरुत्कफयोरपि पाकहेतुत्वमेव तयोरप्यूष्मणोऽधिकरणत्वात् । यत उक्तं चरके 'भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसीः' इति ।। २९० ।। यहाँ पित्त की भाँति वायु और कफ को भी पाक का कारण समझना चाहिये क्योंकि इन दोनों में भी ऊष्मा होती है। अतएव चरक में भी कहा है कि - 'भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश में रहनेवाली भी पाँच ऊष्मा हैं' ।। २९० ।। तृतीये मासि शिरसो हस्तयोः पादयोस्तथा । पिण्डकाः पञ्च सिध्यन्ति सूक्ष्माङ्गावयवास्तनोः ।।२९१।। तीसरे मास में शिर, दोनों हाथ और दोनों पैर इन पाँच अवयवों के स्थान में पाँच पिण्ड और शरीर के सूक्ष्मभाव से अङ्गों के अवयव भी निकलते हैं ।।२९१।। सर्वाण्यङ्गान्युपाङ्गानि चतुर्थे स्युः स्फुटानि हि । हृदयव्यक्तभावेन व्यज्यते चेतनाऽपि च ।।२९२।। तस्माच्चतुर्थ गर्भस्तु नाना वस्तूिन वाञ्छति । ततो द्विहृदया यत्स्यान्नारी दौहृदिनी मता ।।२९३।। दौहृदावज्ञया कुब्जं कुणि षण्ढं च वामनम् । विकृताक्षमनक्षं वा पुत्रं नारी प्रसूयते ।।२९४।। यतः स्त्री दौहृदं प्राप्य वीर्यवन्तं चिरायुषम् । पुत्रं प्रसूयते तस्मात्तस्यै वाञ्छितमर्पयेत् ।। २९५ ।। चौथे मास में जितने अङ्ग और उपाङ्ग हैं वे सभी स्फुट (साफ-साफ प्रगट) हो जाते हैं और साथ-साथ हृदय के व्यक्त हो जाने से चेतना भी व्यक्त हो जाती है। इसी से उस समय गर्भिणी स्त्री दो (एक अपना और दूसरा गर्भ का) हृदयवाली हो जाने से 'दौहृदिनी' कहलाने लगती है। अतएव दौहृद की अवज्ञा होने से अर्थात् गर्भिणी स्त्री अभिलषित वस्तु को न पाने से कुब्जा, लूला, नपुंसक, बौना, विकार से युक्त (बुरा) नेत्रोंवाला अथवा अन्धा बालक उत्पन्न करती है। क्योंकि गर्भिणी स्त्री दौहृद (अभिलषित वस्तु) पाकर के वीर्यशाली और दीर्घ आयुवाली सन्तान पैदा करती है, अतः गर्भिणी को जो वांछित वस्तु हो देवे ।।२९२-२९५।। इन्द्रियार्थांस्तु यान्यान्सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी । गर्भबाधाभयात्तांस्तान्भिषगाहृत्य दापयेत् ।।२९६।। गर्भिणी स्त्री आँख, कान आदि जिन-जिन इन्द्रियों के विषयों को भोगने की इच्छा करे उन-उन विषयों को न देने से भी गर्भ को बाधा पहुँचेगी इस भय से वैद्य मँगवा करके दिलावें ।।२९६।।
  • भोक्तुमुपभोक्तुमित्यर्थः ।। २९६ ।। 'भोग करने की' अर्थात् 'उपभोग करने की' ऐसा समझना चाहिये ।।२९६।। सा प्राप्तदौहृदा पुत्रं जनयेत्तु गुणान्वितम् । अलब्धदौहृदा गर्भे लभेतात्मनि वा भयम् ।। २९७।। इस प्रकार से अभिलषित वस्तु को प्राप्त किये हुई जो गर्भिणी स्त्री होती है वह गुण से युक्त सन्तान पैदा करती है और जो अभिलषित वस्तु को नहीं प्राप्त करती है वह अपने गर्भ अथवा शरीर के विषय में बाधा प्राप्त करती है ।। २९७।। येषु येष्विन्द्रियार्थेषु दौहृदे साऽवमानिता। प्रसूयते सुतं सार्ति तस्मिंस्तस्मिंस्तदिन्द्रिये ।।२९८।।
  • सार्ति= सव्यथम् ।। २९८ ।। १. 'पाच्यमानमि'ति पा.। २. 'कललस्थं महाभूतं समुदायंगि'ति पा.। ३. 'हेतुत्वे' इति पा.।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ८९ जिन-जिन इन्द्रियों के विषय शब्द स्पर्शादि अभिलाषित होते हुये भी यदि गर्भिणी को नहीं प्राप्त होते हैं तो वह उन-उन इन्द्रियों ही के सम्बन्ध में पीड़ा युक्त सन्तान पैदा करती है अर्थात् जैसे गर्भिणी की इत्र सूँघने की इच्छा हुई और उसे इत्र नहीं प्राप्त हुआ तो उसके जो सन्तान पैदा होगी उसके घ्राणेन्द्रिय (नासिका) में अवश्य किसी न किसी रोग से पीड़ा पहुँचेगी ॥२९८॥ दौहृदविशेषफलमाह- राजसन्दर्शने यस्या दौहृदं जायते स्त्रियाः। अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ।।२९९।। दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहृदात्। अलङ्कारेषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ।।३००।। गर्भिणी की इच्छा विशेष—जिस गर्भिणी स्त्री की अभिलाषा राजा के दर्शन करने की हो वह धनवान् और भाग्यशाली सन्तान पैदा करती है। यदि उत्तम सूती अथवा रेशमी वस्त्र तथा भूषणादि धारण करने की अभिलाषा हो तो वह अलङ्कारों (आभूषणों) को चाहने वाली सुन्दर सन्तान पैदा करती है ॥२९९-३००॥ आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते। देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पार्षदोपमम् ।।३०१।। यदि (तपस्वियों के) आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो तो मन को वश में रखने वाली धर्मशील सन्तान पैदा करती है। यदि देवताओं की प्रतिमा (मूर्ति) देखने अथवा पूजनादि करने की अभिलाषा हो तो पार्षद के समान सन्तान उत्पन्न करती है ॥३०१॥ ❖ आश्रमे = तपस्विनामाश्रमे दौहृदात्, पार्षदोपमं=प्रमथोपमम् ।।३०१।। 'आश्रमे' का अर्थ प्रकरण वश 'तपस्वियों के आश्रम देखने या वहाँ पर रहने के विषय में अभिलाषा हो' ऐसा किया गया है और 'पार्षदोपमम्' इस पद से प्रमथ (भगवान् शङ्कर के पार्षद) के समान ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥३०१॥ दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते। रक्ताक्षं लोमशं शूरं महिषामिषदौहृदात् ।।३०२।। वाराहमांसे स्वप्नालुं शूरं सञ्जनयेत्सुतम्। मृगमांसे तु जङ्घालं१ विक्रान्तं वनचारिणम् ।।३०३।। अतोऽनुक्तेषु या नारी दौहृदं विदधाति हि। शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ।।३०४।। पञ्चमे मानसं षष्ठे बुद्धिश्चातिप्रबुद्ध्यते। सर्वाण्यङ्गान्यपाङ्गानि भृशं व्यक्तानि सप्तमे ।।३०५।। ओजोऽष्टमे सञ्चरति माता पुत्रौ मुहुः क्रमात्। तेन तौ म्लानमुदितौ स्यातां जातो न जीवति ।।३०६।। यदि हिंस्रजातिवाले व्याघ्रादि जीवों के देखने के विषय में अभिलाषा हो तो हिंसाशील सन्तान पैदा करती है। महिष (भैंसा) के मांस खाने की अभिलाषा होने से लाल नेत्रवाली, बहुत रोयें से युक्त शरीर वाली और शूर (पराक्रमी) सन्तान पैदा करती है। सूअर के मांस खाने की अभिलाषा होने से अधिक सोनेवाली और शूर सन्तान पैदा करती है। हरिण के मांस खाने की अभिलाषा होने से जङ्घाल अर्थात् दौड़ लगानेवाली अथवा जङ्घा में अधिक ताकत रखनेवाली विक्रम से युक्त वन में विचरण करनेवाली सन्तान पैदा करती है। जो गर्भिणी स्त्री इन पूर्वोक्त जन्तुओं से भिन्न जन्तुओं के मांस खाने की इच्छा करे तो जैसा उस जन्तु का शरीर, आचरण और स्वभाव होगा उसी के समान शरीर, आचरण और स्वभाव रखनेवाली सन्तान पैदा करेगी। पाँचवें महीने में मन और छठें महीने में बुद्धि उत्पन्न होती हैं। जितने अङ्ग तथा उपाङ्ग हैं वे सब सातवें महीने में भली-भाँति व्यक्त हो जाते हैं और आठवें महीने में ओज उत्पन्न होता है। ओज माता तथा पुत्र (यहाँ पर 'पुत्र' शब्द उपलक्षणपरक है अतः सन्तान मात्र का बोधक समझना) दोनों में क्रम से बारंबार सञ्चार करता रहता है, अतः वे दोनों म्लान तथा हर्षित होते रहते हैं अर्थात् जिस समय ओज माता में सञ्चार करता है उस समय माता हर्षित और गर्भस्थ बालक म्लान हो जाता है; तथा जिस समय ओज बालक में सञ्चार करता है उस समय बालक हर्षित


१. 'तच्छायमि'ति पा.।

९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे और माता म्लान हो जाती है, और आठवें महीने में उत्पन्न हुआ बालक प्रायः जीवित नहीं रहता है क्योंकि उस महीने में ओज स्थिर नहीं रहता है। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि जिस समय ओज माता में चला गया होता है उस समय यदि बालक का जन्म होता है तो वह नहीं जीवित रहता है और यदि बालक ही में रहता है तो जन्म लेने पर जीवित रह सकता है ॥३०२-३०६॥ न जीवत्यष्टमे जातस्तत्रौजो न स्थिरं यतः। तथा नैर्ऋत्यभागत्वाद्दापयेत्तद्बलिं ततः ॥३०७॥ अष्टम मास में उत्पन्न हुई सन्तान के जीवित न रहने में एक यह भी कारण है कि नैर्ऋत्य नामक रुद्र के अनुचर का उस समय बालक के शरीर में अंश रहता है, अत एव वह अपनी पूजा प्राप्त करने की इच्छा से उस समय बालक को कष्ट देता है और पूजा न पाने पर मार डालता है, अतः उसकी शान्ति के लिये नैर्ऋत्य के उद्देश्य से बलि दिलानी चाहिये ॥३०७॥ नैर्ऋत्याय भागश्च बालेषु रुद्रेण दत्तः, यत उक्तं कुमारतन्त्रे='अष्टमे मासि नैर्ऋत्याय मांसोदनं बलिं दापयेदि'ति ॥३०७॥ रुद्रने बालकों के शरीर में नैर्ऋत्य का भाग निर्दिष्ट कर दिया है। क्योंकि 'कुमारतन्त्र' में कहा भी है कि—'आठवें महीने में नैर्ऋत्य के लिये मांस और भात की बलि दिलावे' ॥३०७॥ नवमे दशमे मासि नारी बालं प्रसूयते। एकादशे द्वादशे वा ततोऽन्यत्र विकारतः ॥३०८॥ गर्भिणी स्त्री नवें या दशवें महीने में सन्तान पैदा किया करती हैं और कभी-कभी ग्यारहवें और बारहवें महीने में भी प्रसव करती हैं, इससे अधिक समय यदि हो जावे और प्रसव न हो तो यह समझना चाहिये कि कोई विकार गर्भ को हो गया है जिससे प्रसव नहीं हो रहा है ॥३०८॥ गर्भे यदङ्गं प्रथमं भवति, तदाह- शिरो भवति चाङ्गस्य पूर्वमित्याह शौनकः। शिरस्येवोपजायन्ते प्रधानानीन्द्रियाणि यत् ॥३०९॥ हृदयं जायते पूर्वं कृतवीर्योऽवदन्मुनिः। बुद्धेश्च मनसश्चापि यतस्तत्स्थानमीरितम् ॥३१०॥ पाराशर्य इति प्राह पूर्व नाभिसमुद्भवः। प्राणो यत्र स्थितो देहं बर्द्धयत्यूष्मसंयुतः ॥३११॥ पाणिपादं भवेत्पूर्वं मार्कण्डेयमुनेर्मतम्। देहिनः सकलाश्चेष्टाः पाणिपादाश्रया यतः ॥३१२॥ प्रथमं जायते कोष्ठं ततः सर्वाङ्गसम्भवः। एतत्तु कथयामास गौतमो मुनिपुंगवः ॥३१३॥ सर्वाण्यङ्गान्युपाङ्गानि युगपत्सम्भवन्ति हि। सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥३१४॥ गर्भ में अङ्गोत्पत्ति—शौनक मुनि यह कहते हैं कि-सब अङ्गों से पहले शिर उत्पन्न होता है क्योंकि जितनी प्रधान- प्रधान इन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, रसना नाम की ज्ञानेन्द्रियाँ) हैं वे सब शिर में ही उत्पन्न होती हैं और 'कृतवीर्य मुनि' कहते हैं कि-'प्रथम हृदय उत्पन्न होता है क्योंकि उसी को बुद्धि और मन के रहने का स्थान कहा है' और 'पाराशर्य' मुनि यह कहते हैं कि-'पहले नाभि की उत्पत्ति होती है, क्योंकि उसी नाभि में स्थित हो कर ऊष्मा से युक्त होता हुआ प्राण शरीर को बढ़ाता है' यहाँ 'मार्कण्डेय' मुनि का मत यह है कि—'हाथ और पैर पहले उत्पन्न होता है क्योंकि-प्राणियों की जितनी चेष्टायें होती हैं, वे सब हाथ-पैर के सहारे से ही होती हैं' और मुनियों में श्रेष्ठ 'गौतम' मुनि ने तो इस विषय में यह कहा है कि—'पहले कोष्ठ (गर्दन से नीचे कमर तक के भाग) उत्पन्न होता है क्योंकि उसी कोष्ठ से सम्पूर्ण अङ्गों की उत्पत्ति होती है' किन्तु 'धन्वन्तरि' का मत यह है कि—'जितने अङ्ग तथा उपाङ्ग हैं वे सब साथ ही साथ उत्पन्न होते हैं किन्तु उस समय सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं पड़ते हैं' ॥३०९-३१४॥ आम्रस्याणुफले भवन्ति युगपन्मांसास्थिमज्जादयो लक्ष्यन्ते न पृथक्पृथक्तनुतया पुष्टास्त एव स्फुटाः। एवं गर्भसमुद्भवे त्ववयवाः सर्वे भवन्त्येकदा लक्ष्याः सूक्ष्मतया न ते प्रकटतामायान्ति वृद्धिं गताः ॥३१५॥

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९१ जैसे आम के अत्यन्त छोटे फल में मांस (गूदा), अस्थि (कुसुली) और मज्जा (मींगी) आदि साथ ही साथ रहते हैं और अत्यन्त सूक्ष्म होने से अलग २ दिखलाई नहीं पड़ते और पुष्ट होने पर वे ही दिखलाई पड़ने लगते हैं, उसी भाँति गर्भ रहने पर जितने अवयव हैं वे सभी एक साथ ही उसमें रहते हैं किन्तु सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं पड़ते और जब वे ही बढ़ जाते हैं तब साफ-साफ प्रकट हो जाते हैं ॥३१५॥ ❖ मज्जादय इत्यादिशब्देन त्वक्केशरमज्जत्वमङ्कुरवृन्तानि गृह्यन्ते ।।३१५।। 'मज्जादय' इस पद में आदि शब्द से छिल्का, केशर, मींगी के ऊपर का अत्यन्त पतला छिल्का, अङ्कुर, वृन्त (ढेपी) इन सबों का ग्रहण होता है ॥३१५॥ अथ शरीर पितृज-मातृज-रसजात्मजा भागा उच्यन्ते । तत्र- केशाः श्मश्रु च लोमानि नखा दन्ताः शिरास्तथा। धमन्यः स्नाववः शुक्रमेतानि पितृजानि हि ।।३१६।। मांसासृङ्‌मज्जमेदांसि यकृत्प्लीहान्त्रनाभयः । हृदयं च गुदं चापि भवन्त्येतानि मातृतः ।।३१७।। शरीरोपचयो वर्णो बलं देहस्थितितस्तथा। रसादेतानि जायन्ते भिषजो मुनयो जगुः ।।३१८।। पितृज-मातृज शरीराकृति—बाल, दाढ़ी, मूंछ, रोम, नख, दाँत, शिरा, धमनी, स्नायु और शुक्र ये सब पितृज (पिता से उत्पन्न हुये) कहलाते हैं। मांस, रक्त, मज्जा, मेदा, यकृत, प्लीहा, अँतड़ी, नाभि, हृदय और गुदा ये सब माता से उत्पन्न होते हैं अत एव मातृज कहलाते हैं । शरीर की वृद्धि, गौरादि वर्ण, बल और देह का स्थित रहना, ये सब रस से उत्पन्न होते हैं अत एव रसज कहलाते हैं ऐसा वैद्यक के जानकार मुनियों ने कहा है ॥३१६-३१८॥ ज्ञानं विज्ञानमायुश्च सुखदुःखादिकं तथा। इन्द्रियाणि च सर्वाणि भवन्त्येतानि चात्मनः ।।३१९।। ज्ञान, विज्ञान, आयु और सुख-दुःखादि तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ ये सब आत्मा से उत्पन्न होते हैं अत एव आत्मज कहलाते हैं ॥३१९॥ ❖ ('१सुख) दुःखादिकमित्यादिशब्देन नानायोनिजन्मादिकमुच्यते । आत्मनः = आत्मसन्निकर्षाद् न त्वात्मनो जायन्ते, आत्मनो निर्विकारात् प्रकृतिभावानुपपत्तेः ।।३१९।। 'सुखदुःखादिकम्' इस पद में स्थित आदि शब्द से अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेना आदि का भी ग्रहण करना चाहिये और 'आत्मा से उत्पन्न होते हैं' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि आत्मा के सम्बन्ध से उत्पन्न होते हैं न कि साक्षात् आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि-आत्मा निर्विकार है अत एव वह प्रकृति के भावों को नहीं प्राप्त कर सकता अर्थात् प्रकृति के जैसे १६ विकार होते हैं वैसे इसके कोई भी विकार नहीं होते ॥३१९॥ गर्भस्य किंकिं विशिष्टोपकारकं तदाह- अग्नीषोमौ मही वायुर्नभः सत्त्वं रजस्तमः । पञ्चेन्द्रियाणि भूतात्मा गर्भं सञ्जीवयन्ति हि ।।३२०।। ❖ गर्भ के विशेष उपकारक—अग्नि, सोम, पृथ्वी, वायु, आकाश, सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण, पाँच इन्द्रियाँ और भूतात्मा ये सब गर्भ का संजीवन करते हैं अर्थात् इन्हीं सबों से गर्भ उत्पन्न और रक्षित तथा वर्धित होता है ॥३२०॥ ❖ अग्निरत्र-पाचकालोचक रञ्जक भ्राजकसाधकानाम्; तथा पाञ्चभौतिकानां तथा सप्तधातुगतानामग्नीनां शक्तिरूपतयाऽवस्थितो वाचोऽधिदेवत्वं प्राप्तो बोद्धव्यः, सच पाचकादिकर्मणा जीवयति । सोमश्च- पञ्चात्मकश्लेष्मरसशुक्रादीनां २तोयात्मकानां भावानां रसनेन्द्रियस्य३ च शक्तिरूपतयाऽवस्थितो मनसश्चाधिदेवत्वं १. कोष्ठस्थः पाठ क्वाचित्कः । २. सोमे'ति पा.। ३. 'रसे'ति पा. ।

प्राप्तो बोद्धव्यः, स च सौम्यधातोरोजः प्रभृतेः पोषणेन पवनपावकसंशुष्कभागस्यार्द्रताविधानेन जीवयतीति शेषः । मही च-जलेन क्लिन्नस्यापि कठिनविधानेन । वायु-दोषधातुमलाङ्गोपाङ्गादीनां सञ्चारणेनोच्छ्वा- सनिःश्वासाभ्याञ्च । नभो-(१ऽनिलोनलविदारितस्रोतसामूर्ध्वाधस्तिर्यगवकाशदानेन । सत्वं रजस्तम इति-) मनोरूपतया परिणतं जीवात्मनः शरीरान्तरे जीवनग्रहणमोक्षणे हेतुरिति तदपि जीवयति । पञ्चेन्द्रियाणि- श्रोत्रत्वङ्नेत्रजिह्वाघ्राणानि, शब्दादिग्रहणकर्मणा । भूतात्मा-कर्मपुरुषः स चाशेषस्यैव राशेश्चैतन्य- हेतुर्जीवतीति ।। ३२० ।। 'अग्नि' पद से पाचक, आलोचक, रञ्जक, भ्राजक और साधक संज्ञक पाँच पित्त की ऊष्मा की तथा पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) सम्बन्धी अग्नि की और रस-रक्तादि सात धातुओं के मध्य में स्थित अग्नि की शक्तिरूप से अवस्थित एवं वाणी के अधिदेवत्व को प्राप्त हुआ अग्नि समझना चाहिये । वही अग्नि पाचकादि कर्म द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । और 'सोम' शब्द से पाँच प्रकार के श्लेष्मा, रस और शुक्रादि जितने जलात्मक भाव हैं उन सबों की तथा रसनेन्द्रिय की शक्तिरूप से अवस्थित एवं मन के अधिदेवत्व को प्राप्त हुए सोम को समझना चाहिये । वही सोम ओजः प्रभृति सौम्यधातु का पोषण करने से एवं वायु तथा अग्नि से शुष्क हुये भाग को आर्द्र करने से गर्भ को जीवित रखता है । पृथ्वी-जल से गीले हुये भाग को कठिन बनाने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती है । वायु-दोष, धातु, मल, अङ्ग और उपाङ्गादिकों का सञ्चारण (चलाने फिराने) के द्वारा तथा उच्छ्वास (साँस लेना) और निःश्वास (साँस छोड़ना) के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । आकाश-वायु और अग्नि से विदीर्ण किये हुये स्रोतों को ऊपर, नीचे और तिरछे (अगल बगल) अवकाश देने के द्वारा गर्भ को जीवित रखता है । सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये सब मन के रूप में परिणत होकर जीवात्मा का दूसरे शरीर में जीवन ग्रहण करने के अर्थात् दूसरे शरीर के धारण करने के तथा शरीरत्याग करने के कारण हैं, अत एव सत्त्वादि भी गर्भ को जीवित रखते हैं । पञ्चेन्द्रिय-अर्थात् कर्ण, त्वक्, नेत्र, जिह्वा और घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादिकों को ग्रहण करने के द्वारा गर्भ को जीवित रखती हैं । भूतात्मा-अर्थात् कर्मपुरुष सम्पूर्ण कर्मराशियों के ही चैतन्य का हेतु होकर गर्भ को जीवित रखता है । यह समझना चाहिये ।।३२०।। अपरं गर्भस्य जीवनोपायमाह- गर्भस्य नाभिनाड्या तु नाडी रसवहा स्त्रियाः । संलग्ना तेन गर्भस्य वृद्धिर्भवति नित्यशः ।।३२१।। गर्भ के जीवित रहने के हेतु-गर्भस्थ सन्तान की नाभि-नाडी के साथ माता की रस वहन करनेवाली नाड़ी मिली हुई रहती है, इसी से नित्य प्रति गर्भ की वृद्धि होती रहती है ।।३२१।। निःश्वासोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नांशान्सोऽधिगच्छति । मातुर्निःश्वसितोच्छ्वाससंक्षोभस्वप्नसंभवान् ।। ३२२ ।। माता के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ (सञ्चलन) और निन्द्रा से सन्तान के भी निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और निद्रासम्बन्धी सभी कार्य सम्पादित होते हैं ।।३२२।। ❖ संक्षोभः=सञ्चलनम्, माता निःश्वासादिकायाश्चेष्टाःकरोति तास्तागर्भोऽपि करोतीत्यर्थः ।।३२२।। 'संक्षोभ' पद से सञ्चलन अर्थ समझना चाहिये और सब का सारांश भी यही समझना चाहिये कि-माता जो-जो निःश्वासादि चेष्टायें करती है गर्भ भी उन्हीं-उन्हीं चेष्टाओं को करता है ।।३२२।। अथ गर्भवृद्धेर्हेतूपायमाह- गर्भस्य नाभिमध्ये तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् । तदा धमति वातश्च देहस्तेनास्य वर्धते ।।३२३।। ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुतः । ऊर्ध्वं तिर्यग्धस्ताच्च स्रोतांसि तु यथा तथा ।। ३२४ ।। १. कोष्ठस्थ पाठः क्वाचित्कः परन्तु समीचीनः।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९३ गर्भवृद्धि के हेतु—गर्भस्थ सन्तान के नाभिमध्य में एक ज्योतिःस्थान रहता है। वायु उसी स्थान को आध्मापित (उत्तेजित) किया करता है अत एव उस गर्भ की वृद्धि हुआ करती है। अर्थात्-वायु ऊष्मा से युक्त होकर आधमन (फूँक) के द्वारा सन्तान के सम्पूर्ण स्रोतों के ऊपर नीचे और इधर-उधर सभी भागों में जैसे-जैसे दारित (विस्तारित) करता जाता है वैसे-वैसे सन्तान के देह की भी वृद्धि हुआ करती है ॥३२३-३२४॥ ❖ यथा दारयति विस्तारयति १तथा देहो बर्धत इति पूर्वेणान्वयः ।।३२३-३२४।। यहाँ पर ३२४ के श्लोक की टीका में जो 'जैसे दारित अर्थात् विस्तारित करता जाता है वैसे सन्तान के' इतना अंश है इसका पूर्व में ३२३ के 'श्लोक की टीका में' जो 'देह की वृद्धि हुआ करती है' यह अंश है उसके साथ अन्वय है ऐसा समझना चाहिये ॥३२३-३२४॥ दृष्टिरोमकूपानामवृद्धिमाह- दृष्टिश्च रोमकूपाश्च न वर्धन्ते कदा च न । ध्रुवाण्येतानि मर्त्यानामिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।३२५।। दृष्टि मण्डल तथा रोमकूपों की वृद्धि निषेध—मनुष्यों के दृष्टिमण्डल तथा सम्पूर्ण रोमकूप, कभी नहीं बढ़ते अर्थात् अन्यान्य अङ्ग और उपाङ्ग सभी क्रमशः बढ़ते रहते हैं पर दृष्टिमण्डल तथा रोमकूप ये सब सदा एक भाव से ही रहते हैं। ऐसे 'धन्वन्तरि' भगवान् का मत है ॥३२५॥ नखकेशानां सदा वृद्धिमाह- शरीरे क्षीयमाणेऽपि वर्धेत द्वाविमौ सदा । स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ।।३२६।। नख और केशों की वृद्धि में हेतु—शरीर के क्षीण हो जाने पर भी नख और केश ये दोनों सदा बढ़ते ही रहते हैं क्योंकि इन दोनों की ऐसी ही स्थिति (मर्यादा) होती है कि—अपने-अपने स्वभाव को ही प्रकृति (कारण) करके नित्य बढ़ते रहते हैं। अर्थात् नख और केश के बढ़ने में उनका स्वभाव ही कारण है ॥३२६॥ ❖ प्रकृतिं कृत्वा=कारणं कृत्वा । स्थितिः=मर्यादा ।।३२६।। 'प्रकृतिं कृत्वा' से 'कारण करके' और 'स्थिति' से 'मर्यादा' अर्थ समझना चाहिये ॥३२६॥ चेतनाचेतनान्यङ्गान्याह- चेतनानामधिष्ठानां मनो देहश्च सेन्द्रियः । २केशलोमनखाग्रान्मलद्रवगुणैर्विना ।।३२७।। शरीर में चेतन तथा अचेतन अङ्ग—केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न के मल, द्रव (मल-मूत्रादि) और शब्दादि गुण को छोड़कर इन्द्रियों से युक्त समस्त देह और मन चेतना का अधिष्ठान है अर्थात् केशादि को छोड़कर इन्द्रिय, शरीर और मन में चेतना है ॥३२७॥ गर्भस्य वातविण्मूत्रोत्सगार्करणे कारणमाह- वाताल्पत्वादयोगाच्च वायोः पक्वाशयस्य च । वातमूत्रपुरीषाणि गर्भस्थो न विमुञ्चति ।।३२८।। गर्भ में मलादि त्याग न करने में कारण—वायु की अल्पता होने से तथा वायु और पक्वाशय का अयोग (स्वल्पसंयोग) होने से गर्भस्य सन्तान बात, मूत्र और पुरीष (मल) का त्याग नहीं करता है ॥३२८॥ १. 'तथा तथे'त्यधिकः पा.। २. 'केशलोमनखाग्रान्तर्मलद्रव्ये'ति पा.।

९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ अयोगात्=ईषद्योगात् ।।३२८।। 'अयोग' पद का 'स्वल्प योग (संयोग)' अर्थ समझना ।।३२८।। गर्भरोदने कारणमाह- जरायुणा मुखे छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते । वायुमार्गनिरोधाच्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ।।३२९।। गर्भस्थ सन्तान के रोदन न करने के कारण—गर्भस्थ सन्तान का मुख जरायु (गर्भ को वेष्टित करनेवाली झिल्ली) के द्वारा ढका रहने से तथा कण्ठ कफ से भरा रहने से वायु के आने-जाने का मार्ग रुका रहता है अत एव गर्भस्थ सन्तान रोदन नहीं करती है ।।३२९।। अथ गर्भवतीकृत्याकृत्यानि । तत्रादौ गर्भिणीकृत्यान्याह- गर्भिणी प्रथमार्दहः प्रहृष्टा भूषिता शुचिः । भवेच्छुक्लाम्बरधरा गुरुविप्रार्चने रता ।।३३०।। भोज्यं तु मधुरप्रायं स्निग्धं हृद्यं द्रवं लघु । संस्कृतं दीपनीयं तु नित्यमेवोपयोजयेत् ।।३३१।। गर्भवती स्त्रियों के कर्म—गर्भिणी स्त्री गर्भ के प्रथम दिन ही से प्रसन्न चित्त, भूषणों से भूषित, पवित्र और स्वच्छ वस्त्र को धारण करनेवाली और गुरुजन तथा ब्राह्मणों के पूजन में रत रहे और नित्य ही मधुर रस से युक्त स्निग्ध (घृतादिमिश्रित), हृदय को प्रिय, द्रव (पतला) लघु, संस्कृत (भली-भाँति हिंग, जीरा आदि से छौंक कर उत्तम बनाये हुये) और अग्नि को दीपन करने वाले भोज्य पदार्थों का भोजन करे ।।३३०-३३१।। अथ गर्भिण्या अकृत्यान्याह- गर्भिणी न तु कुर्वीत व्यायाममपतर्पणम् । व्यवायं च न सेवत न कुर्यादतितर्पणम् ।।३३२।। रात्रौ जागरणं शोकं यानस्यारोहणं तथा । रक्तमोक्षं वेगरोधं न कुर्यादुत्कटासनम् ।।३३३।। दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते । स स भागः शिशोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ।।३३४।। मलिनां विकृताकारां हीनाङ्गीं न स्पृशेत्स्त्रियम् । न जिघ्रेदपि दुर्गन्धं न पश्येन्नयनाप्रियम् ।।३३५।।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ९५ और यदि करे भी तो बहुत थोड़ा और कोमल गद्दा वगैरह बिछाकर सोवे और शय्या तथा आसन अत्यन्त ऊँचा न रखे, अर्थात् ऐसा रखे कि जिस पर आराम से चढ़कर बैठ सके। गर्भिणी स्त्री अति यत्नपूर्वक पूर्वोक्त इन सब नियमों का पालन करे ।।३३२-३३९।। अथ प्रसवमासानाह- नवमे दशमे मासि नारी गर्भं प्रसूयते । एकादशे द्वादशे वा ततोऽन्यत्र विकारतः ।।३४०।। प्रसब का समय—नवम या दशवें मास में गर्भिणी स्त्री सन्तान प्रसव करती है और कभी-कभी ग्यारहवें या बारहवें मास में भी प्रसव करती है। यदि इससे अधिक समय हो जाय तो यह समझना चाहिये कि किसी रोगवश विलम्ब हो रहा है अर्थात् या तो गर्भ की जगह कोई रोग है अथवा गर्भ में कोई विकार हो गया है ।।३४०।। अथ सूतिकागृहाकृतिमाह- अष्टहस्तायतं चारुचतुर्हस्तविशालकम्। प्राचीद्वारमुदग्द्वारं¹ विदध्यात्सूतिकागृहम् ।।३४१।। प्रसूतिकागृह का स्वरूप—आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौड़ा एवं पूर्व अथवा उत्तर द्वार वाला देखने में सुन्दर सूतिका गृह का निर्माण करना चाहिये ।।३४१।। आसन्नप्रसवाया लक्षणमाह- जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघने नारी विज्ञेया प्रसवोत्सुका ।।३४२।। आसन्नप्रसवायास्तु कटीपृष्ठं तु सव्यथम् । भवेन्मुहुः प्रवृत्तिश्च मूत्रस्य च मलस्य च ।।३४३।। आसन्नप्रसवा के लक्षण—कुक्षि (कोख) शिथिल होने पर तथा हृदयबन्धन (सन्तान की नाभि-नाड़ी के साथ माता की रसवहन करनेवाली नाड़ी का बंधन) मुक्त होने पर एवं जघन-प्रदेश (स्त्री के कटि के नीचे का भाग) शूल की भाँति पीड़ा से युक्त होने पर गर्भिणी स्त्री प्रसव करने के लिये उत्सुक है ऐसा समझना चाहिये । आसन्नप्रसवा स्त्री की कमर और पीठ पीड़ा से युक्त होने लगती है तथा उसके मल और मूत्र की बारंबार प्रवृत्ति होती है ।।३४२-३४३।। अथासन्नप्रसवाया उपचारमाह- तैलेनाभ्यक्तगात्रान्तां संस्नातामुष्णवारिणा । यवागूं पाययेत्कोष्णां मात्रया घृतसंयुताम् ।।३४४।। आसन्नप्रसवा स्त्री के उपचार—आसन्नप्रसवा स्त्री के शरीर में भली-भाँति तैल की मालिश करके तथा गरम जल से स्नान करा के यथोचित मात्रा के साथ उसे कुछ कुछ गरम घी से युक्त यवागू पिलावे ।।३४४।। कृतोपधाने² मृदुनि विस्तीर्णे शयने शनैः । अभुग्नसक्थी चोत्ताना नारी तिष्ठेद्यथाऽन्विता ।। प्रसवव्यथा उपस्थित होने पर गर्भिणी स्त्री तकिया लगे हुये विस्तीर्ण कोमल शय्या पर दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से अर्थात् सटे हुए न रखकर उत्तान (चित) होकर धीरे-धीरे लेट जाय ।।३४५।। ❖ अभुग्नसक्थी=असङ्कोचितोरुः ।।३४५।। ‘अभुग्नसक्थी’ अर्थात् 'दोनों ऊरुओं को असङ्कोचित भाव से रखकर' ।।३४५।। अथ जनयित्र्य आह- चतस्रोऽशंकनीयाश्च स्त्रावणे कुशला हिताः । वृद्धाः परिचरेयुस्ताः सम्यक्छिन्ननखाः स्त्रियः ।। १. 'प्राचीनद्वारान्युदग्द्वारमि'ति पा. । २. 'मृदुभिरि'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आसन्न प्रसवा की परिचारिका—प्रसव कराने में चतुर अशङ्कनीय (साहस युक्त), हिताकाक्षिणी एवं वृद्धा जो हों ऐसी चार स्त्रियाँ अपने अपने हाथ के बढ़े हुये नखों को भली भाँति कटाकर पीड़ायुक्त आसन्नप्रसवा स्त्री की परिचर्या करें ॥३४६॥ अथ जनयित्रीकृत्यमाह- अपत्यमार्गं तैलेन समभ्यज्य समन्ततः । एका तु तासु सुभगे प्रवाहस्तेति तां वदेत् ।। ३४७।। अव्यथा मा प्रवाहिष्ठाः प्रवाहेथा व्यथा यदि । प्रवाहेथाः शनैः पूर्वं प्रगाढं च ततः परम् ।। ३४८ ।। ततो गाढतमं गर्भे योनिद्वारमुपागते । अपरासहितो गर्भो यावत्पतति भूतले ।। ३४९।। जनयित्री स्त्रियों के करने योग्य कर्म—गर्भिणी स्त्री के योनिमार्ग के चारों तरफ तैल लगाकर भली-भाँति चिकनाहट से युक्त कर के जनयित्रियों के मध्य में से एक स्त्री उन (गर्भिणी) से कहे 'हे सुभगे ! प्रवाहण कर अर्थात् काँखो, किन्तु प्रसव सम्बन्धिनी व्यथा शान्त होने पर मत काँखो, यदि प्रसवव्यथा उपस्थित हो तो अवश्य काँखो और पहले धीरे धीरे काँखो, तदुपरान्त कुछ जोर से काँखो तथा काँखने से योनि के मुख पर सन्तान के उपस्थित हो जाने पर जब तक वह अपरा (जेर के साथ साथ) पृथ्वी पर न गिर पड़े तब तक अत्यन्त जोर से काँखो'। ये सब बातें गर्भिणी को समझा दें ॥३४७-३४९॥ व्यथारहितायाः प्रवहणाद्वैगुण्यमाह- मूकं वा बधिरं कुब्जं श्वासकासक्षयान्वितम् । सूते स्रस्ततनुं बालमकाले तु प्रवहणात् ।। ३५० ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे गर्भप्रकरणं तृतीयम् ।। ३ ।। प्रसवव्यथा से रहित गर्भिणी के कांखने से वैगुण्य—प्रसवव्यथा न रहने पर भी यदि गर्भिणी स्त्री प्रसव के लिये काँखे तो वह मूक, बधिर, कुब्ज (कुबड़ा), श्वास, कास से युक्त या शिथिल शरीर वाला बालक पैदा करती है ॥३५०॥ इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां तृतीयगर्भप्रकरणम् समाप्तम् ।। ३ ।।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् अथ बालस्यजन्मोत्तरविधिः- अथ बाले समुत्पन्ने विदधीत विधिं तथा¹। यथैव ²कुलवृद्धस्त्रीव्यवहारपरम्परा ।।१।। बालक के जन्म होने के बाद की विधि—बालक के उत्पन्न होने पर अपने कुल की वृद्धा स्त्रियों की जैसी उस समय व्यवहार करने की परम्परा हो उसके अनुरूप विधि करे ॥१॥ प्रसूता हितमाहारं विहारं च समाचरेत्। व्यायामं मैथुनं क्रोधं शीतसेवां विवर्जयेत् ।।२।। मिथ्याचारात्सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते। स कृच्छ्रसाध्योऽसाध्यो वा भवेत्तत्पथ्यमाचरेत् ।।३।। प्रसूता स्त्री के नियम—प्रसूता स्त्री हितकर आहार-विहार करे और व्यायाम (परिश्रम युक्त कार्य), मैथुन, क्रोध और शीतल उपचार का परित्याग करे। क्योंकि उपर्युक्त नियमों का पालन न करने से प्रसूता स्त्री को जो व्याधि उत्पन्न होती है वह कृच्छ्रसाध्य (कठिनता से दूर होनेवाली) अथवा असाध्य हो जाती है। अत एव प्रसूता स्त्री जो पथ्य हो उसी का सेवन करे ।।२-३।। अथ बालस्यजन्मोत्तरविधिः- सर्वतः परिशुद्धा स्यात्स्निग्धपथ्याऽल्पभोजना। स्वेदाभ्यङ्गपरा नित्यं भवेन्मासमतन्द्रिता ।। प्रसूता स्त्री के नियम पालन करने का समय—प्रसूता स्त्री को प्रसव होने के बाद एक मास तक अत्यन्त सावधानी से शुद्ध होकर रहना चाहिये अर्थात् वस्त्रादिकों में लगे हुये जो खराब रक्तादि हों उसे भली-भाँति साफ करके सदा स्वच्छ रहना चाहिये तथा स्निग्ध और पथ्य भोज्य पदार्थों का अल्प मात्रा में भोजन करना चाहिये और नित्य तेल की मालिश तथा स्वेद निकलवाना चाहिये ।।४।। ❖ सर्वतः परिशुद्धा तु अनवसृष्टदुष्टरुधिरा, अतन्द्रिता=सावधाना ।।४।। 'सर्वतः परिशुद्धा' का यह अर्थ है कि—धोने वगैरह से वस्त्र में लगे हुये खराब रक्त को दूर करके सदा स्वच्छ रहे और 'अतन्द्रिता' का 'सावधानी से युक्त रहे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥४॥ प्रसूता सार्धमासान्ते दृष्टे वा पुनरार्त्तवे। सूतिकानामहीना स्यादिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।५।। व्युपद्रवां विशुद्धां च विज्ञाय वरवर्णिनीम्। ऊर्ध्वं चतुर्भ्यो मासेभ्यो नियमं परिहारयेत् ।।६।। प्रसव होने के डेढ़ महीने बाद अथवा पुनर्वार रजःस्राव दिखाई पड़ने के बाद प्रसूता स्त्री का 'सूतिका' यह नाम नहीं रह जाता ऐसा 'धन्वन्तरि' का मत है। प्रसव के चार महीना के बाद जब यह समझ पड़े कि प्रसूता स्त्री शुद्ध तथा उपद्रव से रहित हो गई है तो फिर उससे प्रसूता सम्बन्धी नियमों का पालन कराना बन्द कर देवें अर्थात् उसको यथेच्छ आहार-विहार करने दे ।।५-६।। अथ स्तन्यस्वरूपमाह- रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः। कृत्स्नाद्देहात्स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते ।।७।। दूध का स्वरूप—परिपक्व आहार से उत्पन्न हुआ एवं मधुर रस से युक्त जो रस का सार भाग है वही देह के सम्पूर्ण भागों से धमनियों द्वारा दोनों स्तनों में प्राप्त होकर दूध होता है अत एव वही 'स्तन्य' कहलाता है ॥७॥ १. 'तत' इति पा.। २. 'कुलवृद्धा स्त्री व्यवहारपरम्परे'ति पा.। १० भाव.I

९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ रसप्रसादः = रसस्य सारः ।।७।। 'रसप्रसादः' का अर्थ है 'रस का सार भाग' ॥७॥ अथ स्तन्यस्य प्रवृत्त्यवधिमाह- स्तन्यं त्रिरात्रात्स्त्रीणां वा चतुरात्रादनन्तरम्। प्रवर्तयन्ति विवृता धमन्यो हृदये स्थिताः ।।८।। प्रसूता स्त्रियों के स्तनों से दूध उतरने का समय—प्रसव होने के तीन अथवा चार रात्रि व्यतीत होने पर प्रसूता के हृदय में स्थित दूध को वहन करनेवाली धमनियों का मुख खुल जाने पर उनसे दूध निकलने लगता है ॥८॥ अथ स्तन्यप्रवृत्तिमाह- पयः पुत्रस्य संस्पर्शाद्दर्शनात्स्मरणादपि। ग्रहणादप्युरोजस्य शुक्रवत्सम्प्रवर्तते। स्नेहो निरन्तरस्तस्य प्रवाहे हेतुरुच्यते ।।९।। दूध निकलने के कारण—अभिलषित स्त्रियों का दर्शन अथवा स्पर्शादि करने से जिस प्रकार शुक्र का क्षरण होता है उसी प्रकार पुत्र का भी दर्शन, स्पर्श अथवा स्मरण करने से तथा स्तनों को पकड़ने से भी माता का दूध निकलने लगता है। सुतरां दूध के निकलने में माता का प्रगाढ़ स्नेह ही कारण होता है ॥९॥ अथ स्तन्यस्याल्पताहेतुमाह- अवात्सल्याद्भयाच्छोकात्क्रोधादत्यपतर्पणात्। स्त्रीणां स्तन्यं भवेत्स्वल्पं गर्भान्तरविधारणात् ।।१०।। दूध के कम निकलने के कारण—अवात्सल्य (वात्सल्यहीनता) अर्थात् पुत्र में स्नेह न होना, भय, शोक, अत्यन्त अपतर्पण (भोजनादि से तृप्त न रहना) अथवा दूसरा गर्भ धारण करना, इन सब कारणों से स्त्रियों के कम दूध निकलने लगता है ॥१०॥ अथ स्तन्यस्य वृद्धिहेतुमाह- शालिषष्टिकगोधूममांसक्षुद्रझषानपि। कालशाकमलाबूं च नारिकेलं कसेरुकम् ।।११।। शृङ्गाटकं वरीं चापि विदारीकन्दमेव च। लशुनं दुग्धवृद्ध्यै स्त्री सेवेत सुमना भवेत् ।।१२।। कलमस्य तण्डुलानां कल्कं या क्षीरपेषितं पिबति। सा भवति भृशं तरुणी क्षीरभारेणैव तुङ्गकुचयुगला ।।१३।। दूध के बढ़ने के कारण—शालि (अगहनी) और षष्टिक (साठी) धान्य, गेहूँ, मांस, क्षुद्रमत्स्य (छोटी-छोटी मछलियाँ), कालशाक (नरिचा), अलाबू (लौआ या लौकी), नारियल, कसेरू सिंघाड़ा, शतावर, विदारीकन्द और लहसुन इन सब द्रव्यों को दूध बढ़ने के लिये प्रसूता स्त्री सेवन करे और सुमना (प्रसन्न चित्त) रहे अर्थात् शालि, षष्टिकादि द्रव्यों के सेवन से दूध की वृद्धि होती है तथा माता का चित्त प्रसन्न रहने से भी दूध की वृद्धि होती है। 'कलम' नामक धान्य विशेष का चावल दूध के साथ पीस कर उसका कल्क (चटनी) बनाकर जो तरुणी स्त्री भक्षण करती है, वह दूध के भार से अत्यन्त उन्नत कुचोंवाली हो जाती है ॥११-१३॥ कलमो धान्यविशेषस्तस्य लक्षणमाह- कलमः कलिविख्यातो जायते स बृहद्ह्रदे¹। काश्मीरदेश एवोक्त महातण्डुलसंज्ञकः ।।१४।। कलम नामक धान्यविशेष का लक्षण—कलम नामक जो धान्य कलि में विख्यात है वह बड़े भारी हृद (जलाशय में) उत्पन्न होता है, उसी को काश्मीर देश में महातण्डुल नाम से कहते हैं ॥ १. 'बृहद्धने' इति पा.।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् ९९ विदारिकन्दस्य रसं पिबेत्स्तन्यस्य वृद्धये । तच्चूर्णं तस्य वृद्ध्यर्थं पिबेद्वा क्षीरसंयुतम् ।।१५।। दूध की वृद्धि के लिये विदारीकन्द का रस अथवा विदारीकन्द का चूर्ण दूध में मिला कर पीवे ।।१५।। अथ स्तन्यस्य दुष्टताहेतुमाह- धात्र्या गुरुभिराहारविहारैर्दोषलस्तथा । देहे दोषाः प्रकुप्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ।।१६।। मिथ्याऽऽहारविहारिण्या दुष्टा वातादयः स्त्रियाः । दूषयन्ति पयस्तेन शरीरं व्याधयः शिशोः ।।१७।। दूध के दूषित होने के कारण—गुरु (देर में पचनेवाला) भोजन, दोषजनक भोजन तथा विहार करने से वातादि दोष धात्री (दूध पिलानेवाली धाई अथवा माता) के देह में प्रकुपित हो जाते हैं अत एव दूध दूषित हो जाता है । अवैध आहार तथा विहार करनेवाली स्त्री के वातादि दोष प्रकुपित होकर दूध को दूषित कर देते हैं और उसी दूषित दूध के पिलाने से बालक के शरीर में रोग पैदा होते हैं ।।१६-१७।। कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् । पित्तादम्लं च कटुकं राज्योऽम्भसि तु पीतिकाः ।।१८।। कफदुष्टं तु यत्तोये निमज्जति च पिच्छिलम् । द्वन्द्वजं तु द्विलिङ्गं स्यास्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ।।१९।। दूषित दूध के लक्षण—वात से दूषित दूध कषाय (कसैला) रस से युक्त तथा जल में डालने पर तैरनेवाला होता है और पित्त से दूषित दुग्ध अम्ल (खट्टा) तथा कटु (कड़वा) रस से युक्त होता है और जल में डालने पर उसमें पीली रेखाएँ दिखाई पड़ती हैं । कफ से दूषित जो दुग्ध होता है वह जल में डालने पर डूब जाता है तथा पिच्छिल (चिकनाहट से युक्त) होता है और जिसमें दो दोषों के लक्षण पाये जायें वह दो दोषों से दूषित होने से द्वन्द्वज और जिसमें तीन दोषों के लक्षण पाये जायें वह सान्निपातिक दूध कहलाता है ।।१८-१९।। अथ दुष्टस्तन्य शोधनविधिमाह- धात्री क्षीरविशुद्ध्यर्थं मुद्गयूषरसाशिनी । भार्गीदारुवचाः पिष्ट्वा पिबेत्साऽतिविषास्तथा ।।२०।। दूषित दुग्ध की शोधन विधि—दुग्ध दूषित होने पर उसकी शुद्धि के लिये धात्री को भोजन के साथ मूँग का यूष तथा मांलरस अर्थात् सुरुवा पीना चाहिये और भार्ङ्गी, देवदारु, वच और अतीस भी पीसकर पीना चाहिये ।।२०।। पाठामूर्वाऽब्दभूनिम्बदारुशुण्ठीकलिङ्गकैः । सारिवामत्स्यपित्ताऽख्यैः क्वाथः स्तन्यविशोधनः ।। पाठा, मूर्वा, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, सोंठ, इन्द्रजौ, सारिवा (अनन्त मूल) और कुटकी इन सब द्रव्यों का क्वाथ बनाकर पीने से भी दूध शुद्ध हो जाता है ।।२१।। ❖ मत्स्यपित्ता = कटुकी ।।२१।। 'मत्स्यपित्ता' से कुटकी का ग्रहण करना चाहिये ।।२१।। पटोलनिम्बासनदारुपाठा मूर्वा गुडूचीं कटुरोहिणीं च । १सनागरां च क्वथितां च तोये धात्री पिबेत्स्तन्यविशुद्धिहेतोः ।।२२।। परवल, नीम, असन, (पीतसाल), देवदारु, पाठा, मूर्वा, गिलोय (गुरुच)' कुटकी और सोंठ इन सबों का क्वाथ दूध को शुद्ध करने के लिये धात्री पीवे ।।२१-२२।। अथ शुद्धस्तन्यस्य लक्षणमाह- नीरे स्तन्यं यदेकि स्यादविवर्णमतन्तुमत् । पाण्डुरं तनु शीतं च तद्दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।।२३।। शुद्ध दूध के लक्षण—जो दूध जल में डालने पर जल के साथ मिल जाय और दूसरे रङ्ग का न हो तथा तार १. 'सनागरं च क्वथितं चे'ति पा. ।

१०० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे न छूटे और देखने में पाण्डुर (पीत मिश्रित शुक्ल) वर्ण का हो तथा पतला और शीतल हो उसे शुद्ध समझना चाहिये ॥२३॥ धात्रीलक्षणमाह- पीताय यदि बालस्य विदध्यादुपमातरम्। सुविचार्य गुणान्दोषान्कुर्याद्धात्रीं तदेदृशीम् ॥२४॥ सवर्णां मध्यवयसां सच्छीलां मुदितां सदा। शुद्धदुग्धां बहुक्षीरां सवत्सामतिवत्सलाम् ॥२५॥ स्वाधीनामल्पसन्तुष्टां कुलीनां सज्जनात्मजाम्। कैतवेन परित्यक्तां निजपुत्रशदृशं शिशौ ॥२६॥ धात्री के लक्षण—बालक को दूध पिलाने के लिये यदि उपमाता (धाई) रखी जाय तो उसके गुण-दोषों को भली- भाँति विचार कर ऐसी धाई रखे जो अपनी जाति की हो तथा मध्य अवस्था वाली, सुशीला, सदा प्रसन्न चित्त रहनेवाली, शुद्ध तथा अधिक दूधवाली, पुत्र से युक्त, बालकों पर अत्यन्त प्रेम रखनेवाली, अपने अधीन रहनेवाली, अल्प द्रव्यादि देने से भी सन्तुष्ट रहनेवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, सज्जन की पुत्री, कपट से रहित तथा बालक को अपने पुत्र ही की भाँति देखनेवाली हो ॥२४-२६॥ अथ निषिद्धां धात्रीमाह- शोकाकुलाक्षुधार्ता च श्रान्ताव्याधिमती सदा। अत्युच्चा नितरां नीचा स्थूलातीव भृशं कृशा ॥२७॥ गर्भिणी ज्वरिणी चापि लम्बोन्नतपयोधरा। अजीर्णभोजिनी चापि तथा पथ्यविवर्जिता ॥२८॥ आसक्ता क्षुद्रकार्येषु दुःखार्ता चञ्चलाऽपि च। एतासां स्तन्यपानेन शिशुर्भवति सामयः ॥२९॥ दूध पिलाने के अयोग्य धात्री के लक्षण—शोक से व्याकुल चित्तवाली, भूख से पीड़ित, थकी हुई, सदा रोग से घिरी हुई, अत्यन्त लम्बी, अत्यन्त नीची, अत्यन्त मोटी, अत्यन्त दुबली, गर्भिणी, ज्वर से युक्त, लम्बे तथा ऊँचे स्तनोंवाली, अजीर्ण होने पर भी भोजन करने वाली, कुपथ्य भोजनादि सेवन करनेवाली, क्षुद्र (नीच) कार्यों के करने में आसक्त चित्त वाली, दुःख से पीड़ित और चञ्चल चित्तवाली ऐसी धाइयों के दूध पीने से बालक रोगी हो जाता है ॥२७-२९॥ अथ बालस्य स्तन्यपानविधिमाह- तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी। उपविश्यासने सम्यग्दक्षिणं स्तनमम्बुना ॥३०॥ प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्। उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धाय पाययेत् ॥३१॥ बालकों को दूध पिलाने की विधि—बालक को दूध पिलाने के समय माता या धाई जो कोई हो वह अपने अङ्गों को स्नानादि से स्वच्छ सुन्दर वस्त्र पहने पूर्व की ओर मुख करके अच्छी तरह से आसन पर बैठे और प्रथम दक्षिण स्तन को जल से खूब धोकर थोड़ा सा दूध उसमें से निकाल कर फेंक दे। उसके बाद आगे लिखे हुये दो मन्त्रों से स्तन को अभिमन्त्रित करके बालक का मुख गोदी में उत्तर ओर रखकर धीरे से उसके मुख में स्तन देकर दूध पिलावे ॥३०-३१॥ ❖ माता=इत्युपलक्षणम्। धात्री चेष्परिस्राव्य ॥३१॥ “माता' यह उपलक्षण है। अतएव धात्री को भी उचित है कि—दूध पिलाने के समय स्तन को धोकर उससे थोड़ा सा दूध निकाल कर फेंक देवे ॥३१॥ अन्यथा वैगुण्यमाह सुश्रुतः- अस्रावितं स्तनं बालः पिबन्स्तन्येन भूयसा। पूर्णस्रोता वमीकासश्वासैर्भवति पीडितः ॥३२॥ अविधि स्तनपान कराने का दोष—यदि दूध पिलाने के पहले स्तन से कुछ दूध निकाल कर बिना फेंके ही उसको बालक पीवे तो अधिक दूध मुख में चले जाने के कारण मुख में ऊपर का स्रोत भर जाने से बालक वमन, कास और श्वासरोग से पीड़ित होता है ॥३२॥

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०१ अथ स्तन्याभिमन्त्रणमाह- क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः । सदैव सुभगो बालो भवत्वेष महाबलः ।।३३।। पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने ! । दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राप्यामृतं यथा ।।३४।। दूध अभिमन्त्रित करने के उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ- क्षीर समुद्र तुम्हारे दोनों स्तनों में दूध भरनेवाला हो तथा उसी दूध के पीने से यह बालक सदा सौभाग्यशाली और अत्यन्त बलवान् होवे और हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता लोगों ने अमृतपान करके दीर्घ आयु प्राप्त किया, उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी अमृत के समान इस दूध को पीकर दीर्घ आयु को प्राप्त करे ।।३३-३४।। इमौ मन्त्रौ पित्रा अन्येन वा ब्राह्मणेन पठनीयौ । यावत् मन्त्रपाठस्तावद् मात्रा धात्र्या वा दक्षिणहस्तेन ('दक्षिण) स्तनस्पर्शः कार्यः ।।३३-३४।। उपर्युक्त दोनों मन्त्रों का पिता अथवा दूसरा कोई ब्राह्मण पाठ करे और जब तक मन्त्र का पाठ हो तब तक माता या धात्री जो हो वह दक्षिण हाथ से दक्षिण स्तन का स्पर्श करती रहे ।।३३-३४।। क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा । दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।।३५।। स्तन्य के अभाव में गो अथवा बकरी के दुग्ध- यदि माता के स्तन में दूध न हो तथा कोई धात्री भी न मिले तो जितने दिन तक माता के स्तनों में अच्छी तरह दूध न उतर आवे अथवा जब तक दूध पीने की योग्यता होवे तब तक उपयुक्त मात्रा में बालक को बकरी अथवा गाय का दूध पिलावे, क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य (प्रकृत्यनुकूल) होता है ।।३५।। ❖ क्षीरसात्म्यतयेति । यतः शिशोः क्षीरमेव सात्म्यं भवति न त्वन्नादिकम् । आस्तन्यपर्याप्तेरिति । यावत् स्त्रियाः स्तन्यस्य समन्ततोभावेन प्राप्तिर्भवति । अथवा यावत् स्तन्यपानस्य योग्यता भवेदित्यर्थः ।।३५।। 'बालक को बकरी या गाय का दूध ही पिलाना चाहिये क्योंकि बालक को दूध ही सात्म्य होता है न कि अन्नादि' इसी भाव को व्यक्त करने के लिये मूल में 'क्षीरसात्म्यतया' यह पद दिया गया है तथा 'जब तक स्त्री के स्तनों में भली भाँति दूध न उत्तर आवे और जब तक दूध पीने की योग्यता रहे' यह भाव व्यक्त करने के लिये 'आस्तन्यप्राप्तेः' यह पद दिया गया है ।।३५।। अथ बालस्यान्नप्राशनसमयमाह- यथोक्तविधिना बालं मासि षष्ठेऽष्टमेऽपि च । अन्नं सम्प्राशयेत्किञ्चित्ततस्तद्वर्धयेत्क्रमात् ।।३६।। अन्नप्राशन का समय- छठें अथवा आठवें मास में शास्त्रोक्त विधि से बालक को थोड़ा सा अन्न प्रथम चटावे, उसके बाद अवस्था वृद्धि के अनुसार अन्न की मात्रा थोड़ी थोड़ी बढ़ावे ।।३६।। अथ बालस्य परिचर्याविधिमाह- बालमङ्कं सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत्क्वचित् । सहसा बोधयेन्नैव नायोग्वमुपवेशयेत् ।।३७।। बालक की परिचर्या- बालक को जिस तरह से दुःख न हो उस तरह उठा कर गोदी में रखे और उसको कभी नहीं डरावे तथा सोते हुये उसको सहसा जगावे भी नहीं और यदि अयोग्य हो तो बैठावे भी नहीं ।।३७।। अयोग्यमुपवेशनासमर्थम् ।।३७।। 'अयोग्य' पद का 'बैठने में असमर्थ' यह अर्थ करना चाहिये ।।३७।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

१०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नाकृष्य स्थापयेत्क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित्कार्ये विधिमावश्यकं विना।।३८।। बालक को खींच कर गोद में न लेवे तथा जल्दी से शय्या पर सुलावे, आवश्यक कार्य (तैल मालिश आदि) के विना किसी कार्य में कभी न रुलावे ॥३८॥ ❖ आवश्यको विधिः=भेषजदानतैलाभ्यङ्गोद्वर्त्तनादिः ।।३८।। 'आवश्यको विधिः' अर्थात् 'औषध देना, तेल लगाना, उबटन लगाना' आदि ।।३८।। तच्चित्तमनुवर्तेत तं सदैव fly/अनुमोदयेत्। (१वातातपतडिद्वृष्टिधूम्रानलजलादितः) निम्नोच्चस्थानतश्चापि रक्षेद्बालं प्रयत्नतः ।।३९।। बालक के मन के अनुसार चले तथा उसे सदा प्रसन्न रखे एवं वायु, घाम, बिजली, वर्षा, धूम, अग्नि, जल आदि से तथा नीचे-ऊँचे स्थानों से भी उसे यत्न पूर्वक बचाता रहे ॥३९॥ अथ बालस्य स्वभावतो हितान्याह- अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानं नेत्रयोरञ्जनं तथा- वसनं मृदु यत्तच्च तथा मृद्वनुलेपनम्। जन्मप्रभृति पथ्यानि बालस्यैतानि सर्वथा ।।४०।। बालकों के लिये हितकर—तेल मालिश करना, उबटन लगाना, नहलाना, नेत्रों में अञ्जन लगाना, कोमल वस्त्र पहराना और मृदु पदार्थों का लेप करना, ये सब बालकों के लिये जन्म से ही हितकर होते हैं ।।४०।। अथ बालस्य कवलादेः समयमाह- कवलः पञ्चमाद्वर्षादष्टमान्नास्यकर्म च। विरेकः षोडशाद्वर्षाद्विंशतेश्चैव मैथुनम् ।।४१।। बालकों के कवलादि करने का समय—पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने के उपरान्त औषधों का कवल धारण करने का समय होता है तथा आठ वर्ष की अवस्था के बाद नास लेने का, सोलह वर्ष की अवस्था के बाद विरेचन (जुलाब लेने) का और बीस २० वर्ष की अवस्था के बाद मैथुन करने का समय प्रशस्त होता है। इन समयों से पहले यदि पूर्वोक्त कवलादिकों का प्रयोग कराया जाय तो हानि होती है ।।४१।। अथ बाल्यादेरवधिमाह सुश्रुतः- वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।।४२।। त्रिविधः सोऽपि दुग्धाशी दुग्धान्नाशी तथाऽन्नभुक्। दुग्धाशी वर्षपर्यन्तं दुग्धान्नाशी शरद्द्वयम् ।।४३।। तदुत्तरं स्यादश्नाशी एवं बालस्त्रिधा मतः। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः ।।४४।। २चतुर्धा मध्यमं वृद्धिद्युवपूर्णक्षयान्वितम्। भवेदाविंशतेर्वृद्धिर्युवा त्वान्त्रिंशतो मतः ।।४५।। सुश्रुतोक्त बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा—अवस्था तीन प्रकार की होती है, (१) बाल्यावस्था, (२) मध्यावस्था और (३) वृद्धावस्था, उनमें मनुष्य जब तक सोलह वर्ष से कम अवस्था का होता है तब तक उसकी बाल्यावस्था कहलाती है अतः वह बालक कहा जाता है और वह बालक भी तीन प्रकार का होता है, (१) दूध पीने वाला, (२) दूध पीने और अन्न खाने वाला तथा (३) केवल अन्न खानेवाला, उसमें एक वर्ष तक केवल दूध पीने वाला, दो वर्ष तक दूध तथा अन्न खानेवाला और उसके बाद १५ वर्ष तक केवल अन्न खाने वाला, इस प्रकार के बालक होते हैं। पण्डित लोग १६ वर्ष से लेकर ७० वर्ष के मध्य की अवस्था को मध्यावस्था कहते हैं। वह चार प्रकार की होती १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. क्वचित् 'चतुर्धा मध्यमं प्राह युव द्वात्रिंशतो मतः' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA