भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे में एक छिद्र होता है। इस प्रकार पुरुषों के शरीर में १० छिद्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में दोनों स्तनों में दो और गर्भाशय में एक इस प्रकार तीन छिद्र अधिक होते हैं ॥२६९-२७०॥ अथ स्रोतांसि- मनःप्राणान्नपानीयदोषधातुपधातवः । धातूनां च मला मूत्रं मलमित्यादयस्तनौ ।। २७१।। सञ्चरन्ति हि यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सङ्गगुः । बहूनि तानि संख्याय शक्यन्ते नैव भाषितुम् ।। २७२।। स्रोतों के लक्षण—जिन मार्गों से मन, प्राण, अन्न, जल, दोष धातु, उपधातु, धातुओं के मल, मूत्र और विष्ठा आदि पदार्थ शरीर में सञ्चार करते हैं उन्हीं मार्गों को स्रोत कहते हैं। वे इतने अधिक हैं कि गिन नहीं सकते अर्थात् असंख्य हैं ॥२७१-२७२॥ अथ जालानि- जालानि तु शिरास्नायुमांसास्थ्नामुद्भवन्ति हि । तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश ।। २७३।। जालों के लक्षण और संख्या—शिरा (नसें), स्नायु, मांस और हड्डी इनका जाल होता है अर्थात् इन्हीं से जालों की उत्पत्ति होती है। वे जाल प्रत्येक शिरा आदि में चार-चार हैं अत एव सब मिल कर सोलह हैं ॥२७३॥ ❖ निरन्तररन्ध्रानि१ करकलितानि समूहितानि च जालानीव जालानि । तानि मणिबन्धगुल्फसंश्रितानि२ परस्परनिबद्धानि परस्परसंश्लिष्टानि परस्परगवाक्षितानि चेति, यैर्गवाक्षितमिदं शरीरम् । निरन्तर (सघन) छिद्रसमूहों से बने हुये समूह युक्त जाल की भाँति होने से ये जाल कहलाते हैं। ये मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (पादग्रन्थि) में स्थित परस्पर बँधे हुये तथा परस्पर मिले हुये हैं अत एव गवाक्ष (जालीदार खिड़की) की भाँति छिद्रयुक्त होते हैं। जिन (जालों) से यह शरीर गवाक्षित (जालीदार खिड़की की भाँति) होता है। ❖ अयमर्थः-एकस्मिन् मणिबन्धे एकं जालं शिरायाः, अपरं स्नायोः, तृतीयं मांसस्य, चतुर्थमस्थ्नः, एवं चत्वारि जालानि । एतेनेतरमणिबन्धो गुल्फौ च व्याख्यातौ । गवाक्षितं विरचितनिरन्तरजालाका- रन्ध्रनिकरपरिकलितमित्यर्थः ।। २७३।। स्पष्ट अभिप्राय यह है कि—एक मणिबन्ध में एक जाल शिराओं का, दूसरा स्नायुओं का, तीसरा मांस का, चौथा हड्डियों का, इस प्रकार चार जाल हैं। इसी प्रकार दूसरे मणिबन्ध तथा दोनों गुल्फों (पैर की एड़ी) में चार २ जाल कहे हुये हैं तथा इन जालों से यह शरीर गवाक्षित अर्थात्—सघन बुने हुये जाल के आकार की भाँति छिद्रसमूहों से व्याप्त रहता है ॥२७३॥ अथ कूर्चाः- कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि । ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ्रे सर्वेऽपि षट् स्मृताः । कूर्चा अपि शिरास्नायुमांसास्थिप्रभवाः३ स्मृताः ।।२७४।। कूर्चों के लक्षण और संख्या—दोनों हाथों में दो, दोनों पैरों में दो, ग्रीवा में एक और मेढ्र में एक, इस प्रकार सब मिलकर छै कूर्च हैं, कूर्च शिरा, स्नायु, मांस तथा अस्थियों से ही बने होते हैं। कूर्च (कूँचा) के समान आकृति होने से ये कूर्च कहलाते हैं ॥२७४॥ १. ‘रन्ध्राणि करे’ति पा. । २. ‘संसृते’ति पाठान्तरं सार्वत्रिकं सुश्रुतासम्मतम् । ३. ‘प्रभव’ इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA