भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६९ परिमित अपस्तम्भ नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर बात से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कास और श्वास उत्पन्न करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ सीमन्ताः-शिरसि पञ्च सन्धयः सन्धिमर्माणि चतुरङ्गुलानि, उन्मादभयचित्तविनाशैः कालान्तरमारकाणि२ । सीमन्त मर्म—मस्तक में जो पाँच सन्धियाँ हैं वे ही सीमन्तनामक मर्म है ये सन्धिसम्बन्धी पाँच मर्म चार अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर उन्माद (पागलपन), भय और चित्त का विनाश, इन सब उपद्रवों के द्वारा ये कालान्तर से प्राणनाशक होते हैं। ❖ तलानि-मध्याङ्गुलिमनुक्रम्य हस्तस्य मध्यन्तलमेवमपरस्य हस्तस्य, पादयोश्चैवं३ चत्वारि तलानि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि रुजाभिः कालान्तरमारकाणि । तलमर्म—दोनों हाथ पैर के बीचवाली अङ्गुली के सीध से लेकर हथेली तथा तलुओं के मध्य में दो अङ्गुल परिमित जो स्थान हैं वे ही तल नामक मर्म हैं, दोनों हथेलियों में दो और दोनों पैर के तलुओं में दो, इस प्रकार सब चार तल मर्म हैं। ये सब मांस सम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर पीड़ा पहुँचने से ये कालान्तर में प्राणनाशक हो जाते हैं। ❖ क्षिप्राणि-अङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्यं क्षिप्रम्। तच्च४ हस्तयोर्द्वे पादयोर्द्वे चैवं चत्वारि स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलान्याक्षेपेकण कालान्तरमारकाणि । क्षिप्रमर्म—अङ्गुष्ठ और तर्जनी अङ्गुली के मध्य में क्षिप्रनामक मर्म हैं, वे दोनों हाथों में दो और दोनों पैरों में दो होने से कुल मिल कर चार क्षिप्र मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म हैं, तथा आधे अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर आक्षेपक नामक वायु सम्बन्धी रोग के द्वारा ये कालान्तर में मारक होते हैं। ❖ इन्द्रबस्तयः-प्रकोष्ठयोर्मध्ये द्वौ जङ्घयोर्मध्ये द्वौ । एवं चत्वारि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि शोणितक्षयेण कालान्तरमारकाणि५ । इन्द्रबस्ति मर्म—दोनों प्रकोष्ठों (कलाई से ऊपर केहुनी के नीचे के भागों) के मध्य में दो और दोनों जङ्घाओं (जानु से नीचे और एड़ी से ऊपर के भागों) के मध्य में दो, सब मिल कर चार और दो अङ्गुल परिमित मांससम्बन्धी इन्द्रबस्ति मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ बृहत्यौ-स्तनमूलादुभयतः पृष्ठवंशं यावत् । शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले६ शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तरुपद्रवैः कालान्तरमारके७ । बृहती मर्म—दोनों स्तनों के मूल भाग से लेकर पृष्ठवंश (पीठ की डण्डे के समान हड्डी) तक जो स्थान हैं, उनमें आधे अङ्गुल परिमित बृहती नामक शिरासम्बन्धी दो मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर अत्यन्त रक्त निकलने से जो उपद्रव होते हैं उनके द्वारा ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ पार्श्वसन्धी-जघनपार्श्वयोः सन्धी८ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले९ शोणितपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके१० । पार्श्वसन्धि मर्म—जघन और दोनों पार्श्वभाग (काँख के नीचे का हिस्सा कमरतक) की जो दो सन्धियाँ हैं उन्हीं १. 'उभयोरि'ति पा.। २. 'मारका' इति पा.। ३. 'चैवमि'ति पा.। ४. 'तानि चे'ति पा.। ५. 'मारका' इति पा.। ६. 'अर्द्धाङ्गुलावृत्ते' इति पा.। ७. 'मारकाणी'ति पा.। ८. 'सन्धी प्रती'ति पा.। ९. 'अर्द्धाङ्गुला'विति पा.। १०. 'मारका' विति पा.।