भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बस्तिमर्म—नाभि, पीठ, कटि, गुदा, वंक्षण (ऊरुसन्धि) और लिङ्ग इन सब के मध्य में बस्ति है । बस्ति का चमड़ा पतला होता है तथा इसका एक द्वार होता है और मुख नीचे की ओर रहता है ॥४१॥ ❖ स्नायुमर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् । स्नायुसम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण का होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है । ❖ नाभिमर्म-नाभिः प्रसिद्धा, शिरामर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् ।।२३०।। नाभिमर्म—यह नाभि नाम से प्रसिद्ध है । शिरासम्बन्धी यह मर्म चार अङ्गुल प्रमाण में होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है ॥२३०॥ कालान्तरहराणि मर्माण्याह- वक्षोमर्माणि सीमन्ततलक्षिप्रेन्द्रबस्तयः । बृहत्यौ पार्श्वयोः सन्धी कटीकतरुणे च ये । नितम्बाविति चैतानि कालान्तरहराणि तु ।।२३१।। कालान्तर (देर) में प्राणहरण करने वाले मर्म—वक्षो मर्म आठ, सीमन्त पाँच, तल चार, क्षिप्र, इन्द्रबस्ति चार, बृहती दो, पसलियों की सन्धि दो, कटीकतरुण दो, नितम्ब दो, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने पर कालान्तर में प्राणनाश होता है ॥२३१॥ ❖ वक्षोमर्माणि- (स्तनमूलं१ स्तनरोहितापलापापस्तम्बाः । तत्र स्तनमूले-) स्तनयोरधस्ताद् द्व्यङ्गुलं यावत् स्तनमूले नाम द्वे शिरामर्मणी, तत्र कफपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके । वक्षोमर्म—स्तनमूल दो, स्तनरोहित दो, अपलाप दो, और अपस्तम्भ नामक दो मर्म, इस प्रकार ये आठ वक्षोमर्म हैं, उनमें से दोनों स्तनों के नीचे दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनमूल नामक दो मर्म हैं, वे शिरा सम्बन्धी मर्म हैं, वहाँ चोट लगने पर कफ से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से वे कालान्तर में प्राणनाशक होता है । ❖ स्तनरोहिते-स्तनयोरुपरि द्व्यङ्गुलं यावत् । द्वे मांसमर्मणी रक्तपूरितकोष्ठतया कालान्तरमारके२ । स्तनरोहित मर्म—दोनों स्तनों के ऊपर दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनरोहित नामक ये मांस सम्बन्धी २ मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में प्राण के हरण करनेवाले होते हैं। ❖ अपलापौ-अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वयोरुपरि द्वे३ शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले रक्तेन पूयताङ्गतेन कालान्तरमारके । अपलाप मर्म—दोनों ओर के अंसकूटों (कन्धे के ऊपर की उभरी हुई हड्डी) के नीचे एवं दोनों ओर पंसुलियों के ऊपर आधा अंगुल परिमित अपलाप नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर वहाँ के रक्त पूय (पीब) हो जाने से ये कालान्तर में मारक होते हैं । ❖ अपस्तम्भौ-उरस उभयतो' नाड्यौ वातवहे शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च कालान्तरमारके । अपस्तम्भ मर्म—वक्षःस्थल के दोनों पार्श्व (बगल) में वायु को वहन करनेवाली दोनों नाड़ियों में आधे अंगुल १. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'मारकावि'ति पा. । ३. 'द्वावि'ति पा. ।