भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६७ उनमें से सद्यःप्राण हरण करनेवाले मर्मस्थल—शृङ्गाटक के .चार, अधिपति के एक, शङ्ख के दो, कण्ठ की शिरा के आठ, गुदा के एक, हृदय के एक, बस्ति के एक, और नाभि के एक, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने से शीघ्र प्राण नाश हो जाता है ॥२३०॥ ❖ शृङ्गाटकानि-घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वासन्तर्पकाणां शिरामुखानां शिरसो मध्ये संयोगस्थानम् तानि चत्वारि शिरामर्माणि चतुरङ्गुलप्रमाणानि हतानि घ्नन्ति=सद्योमारकाणि भवन्ति । शृङ्गाटक मर्म—मस्तक के मध्य में जिन चार स्थानों में नाक, कर्ण, नेत्र और जिह्वा का सन्तर्पण करनेवाली शिराओं का मुख एकत्र मिलता है, उन्हीं चारों स्थानों को शृङ्गाटक मर्म कहते हैं । ये शिरासम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण के चार हैं । चोट लगने पर ये सद्यः प्राणों के हरण करनेवाले होते हैं । ❖ अधिपतिः-मस्तकस्याभ्यन्तरे १शिरासन्धिसन्निपात उपरिष्टाद्रोमावर्त्तः, स-एकः, सन्धिमर्मेद- मर्द्धाङ्गुलप्रमाणं सद्योमारकम् । अधिपति मर्म—मस्तक के भीतर शिरा सम्बन्धी सन्धियों का जो संयोग स्थान है उसके ऊपर बाहर रोमावर्त्त (भौरी) है, उसी को अधिपति मर्म कहते हैं । यह सन्धिसम्बन्धी मर्म एक है, इसका प्रमाण आधा अङ्गुल है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राण का हरण करनेवाला होता है । ❖ शङ्खः-भ्रुवोरन्तोपरि कर्णललाटयोर्मध्ये२ तौ द्वौ, अस्थिमर्मणी सार्द्धाङ्गुले सद्योमारके । दोनों भौहों प्रान्तभाग के ऊपर कर्ण और लला