भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कलाओं के स्वरूप—स्नायुओं से ढके हुये, जरायुओं से व्याप्त तथा कफ से वेष्टित धात्वाशयों के जो भाग हैं उन्हीं को कलाभाग समझना चाहिये। धात्वाशयों के मध्य में धातुओं का जो क्लेद (गीला) भाग है वह देह की ऊष्मा गर्मी से जब अत्यन्त परिपक्व हो जाता है तब उसे ही पण्डित लोग 'कला' कहते हैं ॥२१९-२२०॥ ताः सप्त- आद्या मांसधरा प्रोक्ता द्वितीया रक्तधारिणी । मेदोधरा तृतीया तु चतुर्थी श्लेष्मधारिणी ॥२२१॥ पञ्चमी तु मलं धत्ते षष्ठी पित्तधरा मता । रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः ॥२२२॥ वे कलायें संख्या में सात हैं, जैसे—(१) मांसधरा, (२) रक्तधारिणी (रक्तधरा), (३) मेदोधरा, (४) श्लेष्मधारिणी (श्लेमधरा), (५) मल को धारण करनेवाली मलधरा, (६) पित्तधरा और (७) शुक्रधरा ॥२२१-२२२॥ अथ मर्माण्याह- सन्निपातः शिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवः । मर्माणि तेषु तिष्ठन्ति प्राणाः खलु विशेषतः ॥२२३॥ मर्मस्थल के लक्षण—शिरा, स्नायु, सन्धि, मांस और अस्थि इन सबों में से जो जहाँ जहाँ परस्पर संयुक्त होते हैं वे ही मर्मस्थल कहलाते हैं, अर्थात् एक शिरा के साथ दूसरी शिराके, एक स्नायु के, एक सन्धि के साथ दूसरे सन्धि के, एक मांस के साथ दूसरे मांस के और एक अस्थि के साथ दूसरे अस्थि के संयोगस्थल को मर्मस्थल कहते हैं। इन्हीं मर्मस्थलों में विशेष करके प्राण रहते हैं ॥२२३॥ तेषां सङ्ख्याः स्थानं चाह- सप्तोत्तरशतं सन्ति देहे मर्माणि देहिनाम् । तान्येकादश मांसे स्युरष्टावस्थिषु सन्ति हि ॥२२४॥ सन्धीनां विंशतिस्तानि स्नायूनां सप्तविंशतिः । चत्वारिंशत्तथैकञ्च शिरामर्माणि तत्र तु ॥२२५॥ द्वाविंशतिः सक्थियुगे तावत्येव १भुजद्वये । द्वादशोरसि कुक्षौ च पृष्ठदेशे चतुर्दश ॥२२६॥ ग्रीवायामूर्ध्वभागे तु सप्तत्रिंशन्मतानि हि । मर्माणि तानि सन्तीह पञ्चधा च भवन्ति हि ॥२२७॥ मर्मों की संख्या तथा स्थान—मनुष्यों के शरीर में १०७ मर्मस्थल हैं। तथा—मांस में ११, अस्थि में आठ, सन्धियों में बीस, स्नायुओं में २७, शिराओं में ४१, दोनों पैरों में २२, दोनों बाहुओं में २२, वक्षः स्थल में नव, कुक्षि में तीन, पीठ में १४ और ग्रीवा तथा ऊर्ध्वभाग में ३७ मर्म हैं तथा वे मर्म पाँच प्रकार के होते हैं ॥२२४-२२७॥ तान्याह- सद्यःप्राणहराणि स्युर्मर्माण्येकोनविंशतिः । मर्मदेशास्त्रयस्त्रिंशत् स्युः कालान्तरमारकाः ॥२२८॥ चत्वारिंशच्च चत्वारि वैकल्यं जनयन्ति हि । मर्माष्टकं रुजाकारि विशल्यघ्नं त्रिकं मतम् ॥२२९॥ मर्मों के कार्य—१०७ मर्मों में से १९ मर्मस्थल तत्काल प्राण के हरण करनेवाले, ३३ कालान्तर में मारनेवाले, ४४ विकलता करनेवाले, आठ पीड़ा करनेवाले तथा तीन विशल्यघ्न मर्मस्थल हैं (जिस मर्मस्थल से बाण आदि निकाल लेने पर मृत्यु हो जाती है किन्तु मर्मस्थल में शल्य जितने क्षण रहता है उतने क्षण मृत्यु नहीं होती, उसे 'विशल्यघ्न' मर्मस्थल कहते हैं) इस प्रकार सद्यःप्राणहर एक, कालान्तरमारक दो, वैकल्यकर तीन, रुजाकर चार और विशल्यघ्न पाँच, ये पाँच प्रकार के मर्मस्थल हुये ॥२२८-२२९॥ तत्र सद्योमारकाणि मर्माण्याह- शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्खौ कण्ठशिरा गुदम् । हृदयं बस्तिनाभी च सद्यो घ्नन्ति हतानि चेत् ॥२३०॥


१. 'तावन्त्येव'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्।