भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६५ अथोपधातूनाह- वनितानां प्रसूतानां धमनीभ्यां स्तनौ गतात् । रसादेव हि जायेत स्तन्यं स्तनयुगाशयम् ।।२१०।। शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्त्तिता । मेदस्तस्ताप्यमानस्य१ स्नेहो वा कथिता वसा ।।२११।। उपधातु का लक्षण—प्रसूता स्त्रियों के दोनों स्तनों में दो धमनियों के द्वारा प्राप्त हुये रस से ही दूध होता है और उसके आशय दोनों स्तन हैं अर्थात् वह दूध दोनों स्तनों में रहता है । और शुद्ध मांस का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है । अथवा तपाये जाते हुये मेद का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है ।।२१०-२११।। शार्ङ्गधरे तु- स्तन्यं रजो वसा स्वेदो दन्ताः केशास्तथैव च । ओजश्च सप्तधातूनां क्रमात् सप्तोपधातवः ।।२१२।। 'शार्ङ्गधर' में दूध, रज, वसा, पसीना, दाँत, केश और ओज, ये रसादिक सात धातुओं के क्रम से सात उपधातु हैं ।।२१२।। उरोरक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमाशयस्तु तदधस्तल्लिङ्गं चरकोऽवदत् ।।२१३।। आशय के लक्षण—वक्षःस्थल ही रक्ताशय है, उसके नीचे श्लेष्माशय (कफाशय) और उसके नीचे आमाशय है, ऐसा चरकने कहा है ।।२१३।। तद्यथा—❖ 'नाभिस्तनान्तरं जन्तोराहुरामाशयं बुधाः' इति ।।२१३।। 'नाभि और स्तन के बीच के भाग को पण्डितों ने आमाशय बतलाया है' ।।२१३।। आमाशयादधः पक्वाशायादूर्ध्वन्तु या कला । ग्रहणी नामिका सैव कथितः पाचकाशयः ।।२१४।। ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेर्मध्यभागे व्यवस्थितः । तस्योपरि तिलं ज्ञेयं तदधः पवनाशयः ।।२१५।। पक्वाशयस्तु तदधः स एव तु मलाशयः । तदधः कथितो बस्तिः स हि मूत्राशयो मतः ।।२१६।। आमाशय के नीचे तथा पक्वाशय के ऊपर जो 'कला' है उसी का नाम 'ग्रहणी' है और वह 'पाचकाशय' कहलाता है । नाभि के मध्य में ऊपर की ओर 'अग्न्याशय' है और उसके ऊपर तिल (पाचकाग्नि) और नीचे 'पवनाशय' है । पुनः उसके नीचे पक्वाशय जो 'मलाशय' नाम से भी प्रसिद्ध है और उसके नीचे 'बस्ति' है जो 'मूत्राशय' कहलाता है ।।२१४-२१६।। आशयानुक्रमस्तु वाग्भटेनोक्तः स यथा- कफाऽऽमपित्तवातामाशया मलमूत्रयोः । पुरुषेभ्योऽधिकाश्चान्ये नारीणामाशयास्त्रयः ।।२१७।। धरा गर्भाशयः प्रोक्तः पित्तपक्वाशयान्तरे । स्तनौ प्रवृद्धौ तावेव बुधैःस्तन्याशयौ मतौ ।।२१८।। वाग्भटोक्त आशयों का क्रम—कफाशय, आमाशय, पित्ताशय, पवनाशय, मलाशय और मूत्राशय ये पुरुषों के क्रम से आशय हैं । स्त्रियों के इससे भिन्न अन्य तीन आशय अधिक होते हैं, जैसे-पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में 'धरा' है जिसे पण्डितों ने गर्भाशय और स्तनों के वृद्ध होने पर उन्हीं को 'स्तन्याशय' कहा है ।।२१७-२१८।। अथ कलास्वरूपमाह- स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्तांश्च जरायुणा । श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान्विदुः ।।२१९।। धात्वाशयान्तरे धातोर्यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति । देहोष्मणाऽभिपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते ।।२२०।। १. 'स्रवमाणस्ये'ति पाठान्तरम् । ८ भाव.I