भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे व्याख्यान यह है कि पुरुषों के रोमराजी-दाढ़ी, मूँछ आदि-हैं और स्त्रियों के रोमराजी-स्तन, दुग्ध, आर्तव (रज) आदि-हैं ॥१९५॥ ननु अन्नरसो वृद्धस्य धातुवृद्धिं कथं न करोतीत्याह- वार्द्धके वर्द्धमानेन वायुना रसशोषणात् । न तथा धातुवृद्धिः स्यात्ततस्तत्रानिलं जयेत् ।।१९६।। वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास—वृद्धा अवस्था में वृद्धि को प्राप्त हुये वायु के द्वारा रस के सूख जाने से युवावस्था की भाँति धातु की वृद्धि नहीं होती इसलिये उस अवस्था में वायु को जीतना चाहिये अर्थात्—जिस प्रकार के आहार-विहार करने से वायु वृद्धि को न प्राप्त होकर शान्त रहे वही करें ।।१९६।। शुक्लं सौम्यं सितं स्निग्धं बलपुष्टिकंर स्मृतम् । गर्भबीजं वपुःसारो जीवस्याश्रय उत्तमः ।।१९७।। शुक्र के स्वरूप—शुक्र सौम्य (सोमात्मक), श्वेतवर्ण, स्निग्ध, बल और पुष्टि करनेवाला, गर्भ का बीज, शरीर का सार पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय है ।।१९७।। जीवस्याश्रय उत्तम इत्यत१ आह- जीवो वसति सर्वस्मिन्देहे तत्र विशेषतः । वीर्ये रक्ते मले यस्मिन् क्षीणे याति क्षयं क्षणात् ।।१९८।। जीव का आश्रय—यद्यपि जीव सम्पूर्ण शरीर में रहता है तथापि सम्पूर्ण शरीर की अपेक्षा विशेष रूप से वीर्य रक्त तथा मल में ही रहता है । क्योंकि इनमें से चाहे जिस किसी के नाश हो जाने पर तत्काल ही जीव का भी नाश हो जाता है ।।१९८।। अथ गर्भसञ्जननशुक्रस्य लक्षणमाह- स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभञ्च तत् ।।१९९।। गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण—गर्भ को उत्पन्न करनेवाला शुक्र-स्फटिक मणि के तुल्य निर्मल, द्रव, स्निग्ध, मधुर और शहद के समान गन्धवाला होता है, कोई-कोई गर्भोत्पादक शुक्र को तैल तथा शहद के सदृश वर्ण का मानते हैं ।।१९९।। अथ शुक्रस्य स्थानमाह- यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चेक्षौ२ रसो यथा । एवं हि सकले काये शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ।।२००।। शुक्र के स्थान—जिस प्रकार से दूध में घी, इक्षु (ऊख) में रस छिपा रहता है उसी भाँति प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर के अन्दर शुक्र भी छिपा रहता है ।।२००।। ❖ अत्र सर्पिर्दृष्टान्तो बहुशुक्रेऽल्पमथनेन सर्पिःशुक्रयोर्लाभात् । इक्षुरसदृष्टान्तस्तु स्वल्पशुक्रे पुंसि अतिपीडनेनेक्षुरसशुक्रयोर्लाभात् ।।२००।। यहाँ पर घृत का दृष्टान्त जिसके शरीर में अधिक शुक्र है उसके विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जैसे थोड़ा मथने से ही दुग्ध से घृत निकल आता है वैसे ही थोड़े मैथुन करने से अधिक शुक्रवाले पुरुष का भी शुक्र शरीर से बाहर निकल जाता है और जो इक्षु-रस का दृष्टान्त है उसे अल्प शुक्रवाले पुरुष के विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार ईख को अत्यन्त पेरने से उससे रस निकलता है; उसी प्रकार अधिक मैथुन करने से अल्प शुक्रवाले पुरुष का शुक्र निकलता है ।।२००।। १. 'इत्याहे'ति पाठान्तरम् । २. 'चेक्षो'रिति पाठान्तरम् ।