भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६३ अथ शुक्रस्य क्षरणमार्गमाह- द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः । मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं¹ पुरुषस्य प्रवर्त्तते ।।२०१।। शुक्र के निकलने के मार्ग—बस्ति द्वार के नीचे भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की तरफ मूत्रवाही शिरा के मार्ग से पुरुष का शुक्र प्रवृत्त होता है अर्थात् निकलता है ।।२०१।। ❖ वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘सप्तमी शुक्रधरा द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्त्तयती'ति सप्तमी कला ।।२०१।। इसी विषय में 'वृद्ध वाग्भट' भी कहते हैं कि—बस्तिद्वार के नीचे के भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की ओर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहनेवाली, शुक्रधरा (शुक्र को धारण करनेवाली) जो सातवीं कला मूत्र के मार्ग का आश्रय लेकर स्थित है, वही शुक्र को प्रवृत्त कराती है अर्थात् उसी से शुक्र का क्षरण होता है ।।२०१।। अथ शुक्रक्षरणकारणमाह- कृत्स्नदेहस्थितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा । स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्त्तते ।।२०२।। शुक्र के क्षरण होने में कारण—प्रसन्न मन होकर स्त्री के साथ मैथुन रूप व्यायाम करते हुए पुरुष के हर्ष के वश होने से; सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त शुक्र का क्षरण होता है; अर्थात् मैथुन के समय चित्त की प्रसन्नता तथा हर्ष होना यही शुक्रक्षरण के कारण हैं ।।२०२।। ❖ स्त्रीषु व्यायच्छतः=स्त्रीसुरतरूपं व्यायामं कुर्वतः ।।२०२।। 'स्त्रीषु व्यायच्छतः' इसका स्त्रीके साथ मैथुनरूप व्यायाम को करते हुए पुरुष के यह अर्थ हैं ।।२०२।। अन्यञ्च- शुक्रं कामेन कामिन्या दर्शनात् स्पर्शनादपि । शब्दसंश्रवणाद् ध्यानात् संयोगाश्च प्रवर्त्तते ।।२०३।। कामभाव से स्त्रियों के देखने, स्पर्श करने, शब्द सुनने, ध्यान करने तथा संयोग से शुक्र प्रवृत्त (स्खलित) होतां है ।।२०३।। अथार्त्तवस्य स्वरूपमाह- स्त्रीणां रस एव मासेनार्त्तवं भवतीत्युक्त्वा पुनराह सुश्रुत² एव- रसादेव रजः स्त्रीणां मासि मासि त्र्यहं स्रवेत् । तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ।।२०४।। मासेनोपचितं काले धमनीभ्यस्तदार्त्तवम् । ईषद्विवर्णं कृष्णाञ्च वायुर्योनिमुखं³ नयेत् ।।२०५।। आर्तव के स्वरूप—रस से ही स्त्रियों के रज उत्पन्न होकर प्रतिमास में तीन दिन तक निकलता रहता है और वह रज बारह वर्ष की अवस्था के बाद निकलता है और पचास वर्ष की अवस्था के बाद बन्द हो जाता है तथा प्रतिदिन एक मास तक थोड़ा-थोड़ा करके सञ्चित होता रहता है बाद एक मास के स्राव का समय होने पर वायु उसे धमनियों के द्वारा योनि के मुख की तरफ ले आता है और उस समय वह देखने में कुछ विवर्ण तथा काले रङ्ग का मालूम पड़ता है ।।२०४-२०५।। गर्भग्रहणयोग्यस्यार्त्तवस्य लक्षणमाह- शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् । तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ।।२०६।। १. 'पथे' इति पाठान्तरम् । २. 'शुक्रत' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'योनेरि'ति पाठान्तरम् ।