भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११३ मेधा (धारणा शक्ति), चम्पक की दातौन से दृढ़ बुद्धि (स्थिर बुद्धि), सिरस की दातौन से कीर्ति, सौभाग्य, आयु तथा आरोग्य, चिरचिटा (चिचिड़ा) की दातौन से धैर्य तथा मेधा, विजयसार की दातौन से प्रज्ञा शक्ति (समझने की शक्ति), अनार, अर्जुन तथा कटुज (कुरैया) की दातौन से सुन्दर आकृति तथा चमेली, तगर और मदार की दातौन करने से दुःस्वप्न का नाश होता है ॥२७-३४॥ गुर्वाकस्तालहिन्तालौ केतकश्च बृहत्तृणः। खर्जूरं नारिकेलं च सप्तैते तृणराजकाः ॥३५॥ तृणराजसमुत्पन्नं यः कुर्याद्दन्तधावनम्। नरश्चाण्डालयोनिः स्याद्यावद्गङ्गां न पश्यति ॥३६॥ सुपारी, ताल, हिंताल, केतकी, बाँस, खजूर और नारियल के वृक्ष 'तृणराज' कहलाते हैं। इन तृणराज संज्ञक वृक्षों की जो दातौन करता है, वह जब तक गंगा का दर्शन नहीं करता तब तक चाण्डालों की भाँति अस्पृश्य (अछूत) बना रहता है ॥३५-३६॥ न खादेद्गलताल्वोष्ठजिह्वादन्तगदेषु तत्। मुखस्य पाके शोथे च श्वासकासवमीषु च ॥३७॥ गला, तालु, ओठ, जिह्वा और दाँत सम्बन्धी रोग होने पर और मुख के पकने तथा शोथ होने पर तथा श्वास, कास एवं वमन होने पर काठ की दातौन नहीं करनी चाहिये ॥३७॥ दुर्बलोऽजीर्णभुक्तश्च हिक्कामूर्च्छामदान्वितः। शिरोरुजार्त्तस्तृषितः श्रान्तः पानक्लमान्वितः ॥३८॥ अर्दितः कर्णशूली च नेत्ररोगी नवज्वरी। वर्जयेद्दन्तकाष्ठं तु हृदामययुतोऽपि च ॥३९॥ जो दुर्बल हो तथा भोजन किया हुआ अन्न जिसका परिपक्व न हुआ हो और हिचकी, मूर्च्छा, और मद रोग (मद पीने से उत्पन्न रोग) से युक्त हो, शिर की पीड़ा से दुःखी, प्यासा, परिश्रम करने से थका हुआ और मद्यपान करने से क्लान्त हुआ हो तथा जो वायु सम्बन्धी अर्दित रोग से युक्त हो और कर्णशूल, नेत्रसम्बन्धी रोग, नवीन ज्वर तथा हृद्रोग से युक्त हो वह काष्ठ की दातौन करना छोड़ दे ॥३८-३९॥ अजीर्णभुक्तः-न जीर्णं भुक्तं यस्य सः ॥३८-३९॥ 'अजीर्णभुक्तः' से 'जिसका भोजन किया हुआ अन्न न पचा हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥३८-३९॥ अथ जिह्वानिर्लेखनमाह- जिह्वानिर्लेखनं हैमं राजतं ताम्रजं तथा। पाटितं मृदु तत्काष्ठं मृदुपत्रमयं तथा ॥४०॥ दशाङ्गुलं मृदु स्निग्धं तेन जिह्वां लिखेत्सुखम्। तज्जिह्वामलवैरस्यदुर्गन्ध्यजडताहरम् ॥४१॥ जीभ सफा करने की विधि-सोना, चाँदी अथवा ताँबे की बनी जीभी से जीभ सफा करना चाहिये। अथवा १० अङ्गुल परिमित दाँत साफ करने के लिये काठ की जिस दातौन को काम में लिया हो, उसी को चीर कर उसके द्वारा जीभ छीले किंवा दश अंगुल परिमित स्निग्ध (चिक्कन) और कोमल पल्लवों से बनी हुई जो जीभी हो उससे सुखपूर्वक जीभ छीले किन्तु इतना न छीले कि रक्त निकल आवे और दुःख मालूम पड़े, इस प्रकार से जीभ छीलने से जीभ का मल, विरसता, दुर्गन्ध एवं जड़ता दूर होती है ॥४०-४१॥ ❖ तत्काष्ठं दन्तशोधनयोग्यं काष्ठम् ॥४०-४१॥ 'तत्काष्ठम्' अर्थात् दाँत साफ करने के योग्य जो काठ की दातौन काम में ली हो, उसीको (ले) ॥४०-४१॥ अथ मुखगण्डूषमाह- गण्डूषमपि कुर्वीत शीतेन पयसा मुहुः। कफतृष्णामलहरं मुखान्तःशुद्धिकारकम् ॥४२॥ सुखोष्णोदकगण्डूषः कफारुचिमलोपहः। दन्तजाड्यहरश्चापि मुखलाघवकारकः ॥४३॥ ११ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA