भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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११४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कुल्ला करने की विधि—दाँत साफ करने और जीभी करने के बाद शीतल जल से बारंबार गण्डूष (कुल्ला) भी करे, इससे कफ, प्यास और मुख का मल दूर होता है तथा मुख के भीतर की शुद्धि होती है। थोड़े गरम जल से कुल्ला करने से कफ, अरुचि, मुख का मल तथा दाँतों की जड़ता दूर होती है एवं मुख हल्का होता है ॥४२-४३॥ विषमूूर्च्छामदार्त्तानां शोषिणां रक्तपित्तिनाम्। कुपिताक्षमलक्षीणरूक्षाणां स न शस्यते ॥४४॥ जो विष, मूर्च्छा और मद से पीड़ित हों तथा शोष और रक्त पित्त रोग से युक्त हों एवं जिनकी आँखें कुपित हों अर्थात् उठ आई हों, मल क्षीण हो गया हो तथा जो रूखे शरीरवाले हों ऐसे लोगों को थोड़े गरम जल से कुल्ला करना हितकर नहीं होता है ॥४४॥ ❖ सः=सुखोष्णोदकगण्डूषः ॥४४॥ ‘सः’ अर्थात् ‘थोड़े गरम जल से कुल्ला करना’ ॥४४॥ मुखप्रक्षालनं शीतपयसा रक्तपित्तजित्। मुखस्य पिडिकाशोषनीलिकाव्यङ्गनाशनम् ॥४५॥ कुर्याद्वाऽपि कदुष्णेन पयसाऽऽस्यविशोधनम्। कफवातहरं स्निग्धं मुखशोषविनाशनम् ॥४६॥ शीतल जल से मुख प्रक्षालन करने से रक्तपित्त, मुख की पिडकायें (मुहासे), शोष, नीलिका और व्यङ्ग (झाईं) ये सब रोग नष्ट होते हैं और थोड़े गरम जल से मुख प्रक्षालन करने से मुख की शुद्धि, कफ और वात का नाश, स्निग्धता, और मुख का शोष नष्ट होता है ॥४५-४६॥ कटुतैलादि नस्यार्थे नित्याभ्यासेन योजयेत्। प्रातः श्लेष्मपि मध्याह्ने पित्ते सायं समीरणे ॥४७॥ सुगन्धवदनाः स्निग्धनिःस्वना विमलेन्द्रियाः। निर्बलीपलितव्यङ्गा भवेयुर्नस्यशीलिनः ॥४८॥ नस्य लेने की विधि—प्रतिदिन अभ्यास करके सर्षप (कडुये) तेल आदि का नस्य कफ की अधिकता हो तो प्रातःकाल, पित्त की अधिकता हो तो दोपहर और वात की अधिकता हो तो सायंकाल में लेवे। जो लोग नित्य नस्य लेनेवाले होते हैं, उनका मुख सुगन्धित, स्वर (आवाज) स्निग्ध और इन्द्रियाँ विमल होती हैं और उन्हें असमय में वली (शरीर में सिकुड़न पड़ना), पलित, (बिना समय बालों का सफेद होना) और व्यङ्ग (झाईं) ये सब नहीं होते हैं ॥४७-४८॥ अथाञ्जनविधिमाह- सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्। लोचने भवतस्तेन मनोज्ञे सूक्ष्मदर्शने ॥४९॥ अञ्जन लगाने की विधि—सौवीर (सफेद सुरमा) का नित्य अञ्जन करना आँखों के लिये हितकर होता है, इसका सेवन करने से आँखें सुन्दर तथा सूक्ष्म वस्तुओं को भी देखने वाली होती हैं॥ सौवीरं=श्वेतसुरमा इति लोके प्रसिद्धम् ॥४९॥ ‘सौवीर’ से ‘लोक में प्रसिद्ध सफेद सुरमा’ का ग्रहण होता है ॥४९॥ स्रोतोऽञ्जनं मतं श्रेष्ठं विशुद्धं सिन्धुसम्भवम्। दृष्टेः कण्डूमलहरं दाहक्लेदरुजापहम् ॥५०॥ अक्ष्णो रूपावहं चैव सहते मारुतातपौ। नेत्रे रोगा न जायन्ते तस्मादञ्जनमाचरेत् ॥५१॥ सिन्धु नामक पर्वत में उत्पन्न होने वाले बिना शुद्ध किये हुये भी स्रोतोऽञ्जन (कालासुरमा) श्रेष्ठ है क्योंकि—वह आँखों की खुजली, मल (कीचड़), दाह, क्लेद (नेत्रों से पानी बहना) और पीड़ा इन सबों को दूर करता है तथा नेत्रों को सुन्दर बनाता है और वायु तथा धूप के सहन करने में समर्थ भी करता है। उससे नेत्र सम्बन्धी कोई रोग उत्पन्न नहीं होते हैं अतएव इसका अञ्जन करना चाहिये ॥५०-५१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA