भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११५ ❖ स्रोतोऽञ्जनं=कृष्णासुर्मा इति लोके। विशुद्धं शोधनं विनाऽपि। सिन्धुसम्भवं=सिन्धुनामा पर्वतस्तत्र सम्भवम् ॥५०-५१॥ 'स्रोतोऽञ्जन' से 'काला सुरमा' और 'विशुद्ध' से 'बिना शोधा हुआ भी' तथा 'सिन्धुसंभव' से 'सिन्धु नामक पर्वत में उत्पन्न होने वाला, यह अर्थ समझना चाहिये ॥५०-५१॥ अथाञ्जनायोग्यजनानाह- रात्रौ जागरितः श्रान्तश्छर्दितो भुक्तवांस्तथा। ज्वरातुरः शिरः स्नातो नाक्ष्णोरञ्जनमाचरेत् ।। अञ्जन लगाने के अयोग्य व्यक्ति—जो रात में जागा हुआ तथा थका हुआ और जिसे वमन हुआ हो एवं जो भोजन करके उठा हो तथा ज्वर से पीड़ित और शिर से स्नान किया हुआ हो उसे आँखों में अञ्जन नहीं लगाना चाहिये ॥५२॥ अथ नखादिकर्त्तनविधिमाह- पञ्चरात्रान्नखश्मश्रुकेशरोमाणि कर्त्तयेत्। केशश्मश्रुनखादीनां कर्त्तनं सम्प्रसाधनम् ।। पौष्टिकं धन्यमायुष्यं शौचकान्तिकरं परम् ।।५३।। नाखून कटाने और बाल बनवाने की विधि—पाँच रात्रि व्यतीत होने के बाद नख, दाढ़ी, मूछ, केश (शिर के बाल) और रोम कतरवावे (हजामत बनवावे) क्योंकि—केश, दाढ़ी, मूछ और नख आदि का कतरवाना अत्यन्त शोभाजनक, पुष्टिकारक, धन्य (धन प्राप्ति का कारण), आयु को बढ़ाने वाला, पवित्रता तथा कान्ति को उत्पन्न करनेवाला होता है ॥५३॥ ❖ सम्प्रसाधनं=शोभाजनकम् ।।५३।। 'सम्प्रसाधन' का अर्थ है 'शोभाजनक' ॥५३॥ अथ नासालोमोत्पाटने दोषमाह- उत्पाटयेत्तु लोभानि नासाया न कदाचन। तदुत्पाटनतो दृष्टेदौर्बल्यं त्वरया भवेत् ।।५४।। नाक के बाल उखाड़ने में दोष—नाक के बाल कभी नहीं उखाड़ना चाहिये, क्योंकि, उसके उखाड़ने से शीघ्र ही आँखों में दुर्बलता आ जाती है ॥५४॥ अथ केशप्रसाधनगुणानाह- केशपाशे प्रकुर्वीत प्रसाधन्या प्रसाधनम्। केशप्रसाधनं केश्यं रजोजन्तुमलापहम् ।।५५।। केशों को कङ्घी से साफ करने के गुण—प्रसाधनी (कङ्घी) द्वारा केश पाश (केशसमूह) का प्रसाधन (सफा) करे क्योंकि केशों का प्रसावन (कंघी से सफा करना केशों के लिये हितकारी तथा धूलि और जन्तु (बालों में मैल के कारण उत्पन्न ढीलों वगैरह जन्तु) तथा मल को दूर करनेवाला है ॥५५॥ अथ दर्पणालोकनगुणानाह- आदर्शालोकनं प्रोक्तं मङ्गल्यं कान्तिकारकम्। पौष्टिकं बल्यमायुष्यं पापालक्ष्मीविनाशनम् ।।५६।। दर्पण में मुख देखने के गुण—दर्पण में मुख देखना मङ्गलप्रद, कान्तिकारक, पुष्टिकारक, बलदायक, आयु बढ़ानेवाला और पाप तथा दरिद्रता को दूर करने वाला होता है ॥५६॥ अथ व्यायामगुणानाह- लाघवं कर्मसामर्थ्यं विभक्तघनगात्रता। दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ।।५७।। व्यायामाद्दृढगात्रस्य व्याधिर्नास्ति कदाचन। विरुद्धं वा विदग्धं वा भुक्तं शीघ्रं विपच्यते ।।५८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA